Delhi Protest | सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 163 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया, धारा 172 को चुनौती पर नोटिस जारी किया
Shahadat
17 Oct 2026 9:49 AM IST

हाल ही में दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (15 अक्टूबर) को कहा कि वह BNSS, 2023 की धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) की संवैधानिक वैधता की जांच नहीं करेगा। इस धारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेटों (Executive Magistrates) को निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही 'बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य' (1961) मामले में CrPC की धारा 144 की वैधता को बरकरार रख चुका है। बता दें कि BNSS की धारा 163, CrPC की धारा 144 के ही समान प्रावधान है।
हालांकि, कोर्ट ने BNSS की धारा 172 (जो CrPC में नहीं थी) को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। इस धारा के तहत पुलिस अधिकारियों को उन लोगों को हिरासत में लेने या वहां से हटाने का अधिकार है, जो उनके निर्देशों का विरोध करते हैं, मानने से इनकार करते हैं या उनकी अनदेखी करते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा,
"BNSS की धारा 163 की वैधता को लेकर मौखिक दलीलें दी गईं। लेकिन, चूंकि 'बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य' (1961) मामले में CrPC की धारा 144 (जो इसके समान ही प्रावधान है) की वैधता को पहले ही बरकरार रखा जा चुका है, इसलिए हम इस पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं। इसलिए केवल BNSS की धारा 172 की संवैधानिकता के सीमित मुद्दे पर नोटिस जारी किया जाता है, जिसका जवाब 19.11.2026 तक देना होगा।"
BNSS की धारा 172(1) के तहत लोगों के लिए यह अनिवार्य है कि वे पुलिस अधिकारी द्वारा अपने कर्तव्यों के पालन के दौरान दिए गए कानूनी निर्देशों का पालन करें। यह प्रावधान अध्याय XII के अंतर्गत आता है, जो पुलिस द्वारा की जाने वाली निवारक कार्रवाई (Preventive Action) से संबंधित है। धारा 172(2) पुलिस अधिकारी को यह अधिकार देती है कि वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को हिरासत में ले ले या वहां से हटा दे, जो किसी निर्देश का विरोध करता है, उसे मानने से इनकार करता है, या उसकी अनदेखी करता है। ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर सकता है, या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर उसे रिहा कर सकता है।
याचिका में तर्क दिया गया कि यह प्रावधान पुलिस अधिकारी के अपने निजी आकलन के आधार पर किसी को हिरासत में लेने की छूट देता है। इसके लिए किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की उचित आशंका, लिखित कारण या न्यायिक जांच के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता नहीं बताई गई।
इस रिट याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई कि धारा 172, संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करती है। ये अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता, मौलिक स्वतंत्रता, और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देते हैं।
यह मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को हुए उस विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है, जो मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ और मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर किया गया था। याचिका में कहा गया है कि छात्रों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं सहित हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया या उन्हें विरोध स्थल तक पहुंचने से रोका गया। इनमें से कुछ लोगों को तो प्रदर्शन स्थल से काफी दूर ही रोक लिया गया, जबकि कुछ को ट्रेनों से उतार दिया गया।
अदालत दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इनमें प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और वकीलों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों के आरोप, सार्वजनिक परिवहन पर लगी पाबंदियों को लेकर अवमानना का मामला और 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं शामिल हैं।
अदालत ने BNSS की धारा 163 के तहत जारी आदेशों की वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई 19 नवंबर तक के लिए टाल दी। साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह नई दिल्ली में धारा 163 के तहत जारी किए गए आदेशों (जिसमें 23 अगस्त 2026 का आदेश भी शामिल है) को रिकॉर्ड पर रखे।
इसके अलावा, सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि वे विरोध प्रदर्शनों से जुड़े CCTV फुटेज और अन्य डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखें। जिन निजी पक्षों के पास ऐसी सामग्री मौजूद है, उन्हें भी इसे अदालत के समक्ष पेश करने की अनुमति दी गई।
Case Title : Samriddhi Das v. Union of India and Ors.

