UAPA ज़मानत पर सुप्रीम कोर्ट के विरोधाभासी फ़ैसलों को लेकर बड़ी बेंच के पास मामला भेजने की मांग करेगी दिल्ली पुलिस

Shahadat

19 May 2026 8:15 PM IST

  • UAPA ज़मानत पर सुप्रीम कोर्ट के विरोधाभासी फ़ैसलों को लेकर बड़ी बेंच के पास मामला भेजने की मांग करेगी दिल्ली पुलिस

    दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को मौखिक रूप से बताया कि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ज़मानत देने के मुद्दे पर एक बड़ी बेंच द्वारा विचार किए जाने की ज़रूरत हो सकती है, क्योंकि इस मामले में लागू होने वाले कानूनी मानकों पर अलग-अलग बेंचों के फ़ैसले आपस में विरोधाभासी लग रहे हैं।

    एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच के सामने यह बात रखी। यह बेंच दिल्ली दंगों की बड़ी साज़िश के आरोपी तस्लीम अहमद और 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' के सदस्य खालिद सैफ़ी की ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा ज़मानत देने से इनकार किए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी थी।

    राजू ने मांग की कि इस मामले पर कल सुनवाई की जाए ताकि यह तय किया जा सके कि इसे बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। उन्होंने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के सोमवार को दिए गए फ़ैसले 'सैयद इफ़्तिखार अंद्राबी बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी' की जांच करने के लिए समय चाहिए।

    उस फ़ैसले में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा था कि UAPA मामलों में भी ज़मानत देना ही सामान्य नियम है। उन्होंने उन पिछले फ़ैसलों पर भी अपनी आपत्तियां ज़ाहिर कीं, जिनमें इस आतंकवाद-रोधी कानून के तहत ज़मानत देने के मामले में ज़्यादा संकीर्ण (सख्त) नज़रिया अपनाया गया।

    यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों की बड़ी साज़िश के मामले में पांच आरोपियों को ज़मानत दे दी थी, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद तस्लीम अहमद और खालिद सैफ़ी सहित बाकी आरोपियों ने भी इसी तरह की राहत पाने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    'सैयद इफ़्तिखार अंद्राबी' मामले में जस्टिस भुइयां ने विशेष रूप से 'खालिद' और 'गुरविंदर सिंह' मामलों में दिए गए फ़ैसलों की वैधता पर सवाल उठाए। ये दोनों फ़ैसले जस्टिस अरविंद कुमार ने ही लिखे थे। फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई कि खालिद और इमाम को ज़मानत देने से इनकार करते समय शायद तीन जजों की बेंच के उस फ़ैसले को नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जो 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम के.ए. नजीब' मामले में दिया गया। उस फ़ैसले में कहा गया कि लंबे समय तक जेल में बंद रहना और मुकदमे के जल्दी खत्म होने की संभावना कम होना - ये ऐसे आधार हैं, जिनके चलते UAPA मामलों में भी ज़मानत दी जा सकती है।

    जस्टिस भुइयां ने कहा,

    "कम जजों वाली बेंच द्वारा दिया गया फ़ैसला, ज़्यादा जजों वाली बेंच द्वारा तय किए गए कानून का पालन करने के लिए बाध्य होता है। न्यायिक अनुशासन की मांग है कि ऐसे बाध्यकारी नज़ीर (precedent) का या तो पालन किया जाए, या फिर अगर कोई संदेह हो, तो मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया जाए। एक छोटी बेंच, बड़ी बेंच के फ़ैसले के मूल सिद्धांत (ratio) को कमज़ोर नहीं कर सकती, उसे दरकिनार नहीं कर सकती और न ही उसकी अनदेखी कर सकती है।"

    सोमवार को जस्टिस कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने ASG राजू ने कहा कि उन्होंने अभी तक अंद्राबी फ़ैसले को पूरी तरह से नहीं पढ़ा और अपनी दलीलें देने से पहले वे ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि चूंकि अब दो-जजों वाली बेंचों के बीच अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं, इसलिए इस मामले को सुलझाने के लिए एक बड़ी बेंच की ज़रूरत पड़ सकती है।

    राजू की यह दलील UAPA की धारा 43D(5) के संदर्भ में आई, जो ज़मानत देने पर कड़ी पाबंदियां लगाती है। इसके तहत अदालतों को ज़मानत देने से मना करना होता है, अगर आरोप पहली नज़र में सही लगते हैं - जो कि आम फ़ौजदारी क़ानून के तहत 'निर्दोष होने की धारणा' से अलग है।

    हालांकि, ASG ने अंतरिम ज़मानत दिए जाने का विरोध नहीं किया।

    मामले की पृष्ठभूमि

    अहमद दिल्ली दंगों के आरोपियों में से एक है, जिसे FIR नंबर 59/2020 के तहत गिरफ़्तार किया गया था। उस पर गैर-क़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 13/16/17/18; भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302/307/353/186/212/395/427/435/436/452/454/109/114/147/148/124A/153A/120B; सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान से बचाने वाले अधिनियम, 1984 की धारा 3/4 और शस्त्र अधिनियम, 1959 की धारा 25/27 के तहत आरोप लगाए गए।

    उन्होंने सबसे पहले जून 2021 में ट्रायल कोर्ट में रेगुलर बेल के लिए अर्जी दी थी। उन्होंने यह अर्जी सह-आरोपी देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा के साथ समानता (Parity) के आधार पर दी थी, जिन्हें 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत दी थी। हालांकि उनकी बेल रद्द नहीं की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपी इस बेल ऑर्डर को एक मिसाल (Precedent) के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें UAPA के प्रावधानों की व्याख्या से जुड़ा मामला था, जिस पर NIA ने आपत्ति जताई।

    ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बेल देने से मना कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2023 के एक आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता समानता का दावा कर सकता है। अब यह याचिकाकर्ता पर निर्भर करता है कि वह अपना केस कैसे पेश करता है।

    अहमद ने फिर से ट्रायल कोर्ट में अर्जी दी, लेकिन 22 अप्रैल 2024 को उनकी दूसरी रेगुलर बेल की अर्जी खारिज कर दी गई। 28 अक्टूबर, 2024 को याचिकाकर्ता ने फिर से ट्रायल कोर्ट में अर्जी दी। उन्होंने यह आधार बनाया कि वह हिरासत में चार साल से ज़्यादा समय बिता चुके हैं और ट्रायल में कोई प्रगति नहीं हुई। जब यह अर्जी भी खारिज हो गई तो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि किसी आरोपी को जेल में कब तक रखा जा सकता है, जबकि 2020 के दंगों को हुए पांच साल बीत चुके हैं। वह एक और FIR नंबर 48/2020 में भी आरोपी हैं, जिसमें उन्हें पहले ही रेगुलर बेल मिल चुकी है।

    इस मौजूदा अर्जी पर 11 फरवरी को नोटिस जारी किया गया।

    सैफी की अर्जी के मुताबिक, वह पांच साल से जेल में बंद हैं और गुलफिशा और अन्य आरोपियों के साथ समानता (Parity) की मांग कर रहे हैं। गुलफिशा और अन्य आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश में जमानत दी गई थी। हालांकि, जब 18 फरवरी को इस याचिका पर नोटिस जारी किया गया तो बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि वह अन्य सह-आरोपियों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते।

    आरोप यह है कि सैफी DPSG, CAB टीम और 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' जैसे कई WhatsApp ग्रुप के सदस्य थे। साथ ही उन पर खुरेजी, करावल नगर, करदम नगर और निजामुद्दीन में विरोध प्रदर्शन के लिए कई जगहों को तैयार करने का भी आरोप है। इसके अलावा, उन पर एक भड़काऊ भाषण देने का भी आरोप है, जिसका मकसद सांप्रदायिक दंगे भड़काना था। उन पर DPSG ग्रुप में एक मैसेज भेजने का आरोप है, जिसमें उन्होंने लोगों को पुलिस द्वारा लगाए गए CCTV कैमरों को काली टेप से ढकने का निर्देश दिया था।

    Case Details: TASLEEM AHMED v STATE GOVT. OF NCT OF DELHI|Diary No. 5434-2026 and ABDUL KHALID SAIFI @ KHALID SAIFI v STATE (NCT OF DELHI)|SLP(Crl) No. 3867/2026

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