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बार काउंसिल के फैसलों की आलोचना कदाचार के बराबर: बीसीआई ने 'वकीलों के लिए व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानकों में सुधार' के लिए नियमों में संशोधन किया

LiveLaw News Network
27 Jun 2021 12:46 AM GMT
बार काउंसिल के फैसलों की आलोचना कदाचार के बराबर: बीसीआई ने वकीलों के लिए व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानकों में सुधार के लिए नियमों में संशोधन किया
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने नियमों में संशोधन किया है, जिसके तहत सदस्यों द्वारा बार काउंसिल के फैसलों की 'आलोचना' और 'हमले' को कदाचार बना दिया गया है, और बार काउंसिल से अयोग्यता या निलंबन या सदस्यता समाप्त करने का आधार बना दिया गया है।

संशोधित नियम को शुक्रवार (25 जून 2021) को राजपत्र में अधिसूचित किया गया। नियमों में कहा गया है कि एक वकील दैनिक जीवन में एक जेंटलमैन/जेंटललेडी के रूप में आचरण करेगा और वह कोई भी गैर कानूनी कृत्य नहीं करेगा। वह प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया में कोई भी ऐसा बयान नहीं देगा, जो किसी भी कोर्ट या जज या न्यायपालिका के किसी भी सदस्य के खिलाफ या राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया

के खिलाफ अभद्र या लज्जाजनक, अपमानजनक या प्रेरित, दुर्भावनापूर्ण या शरारती है; और न ही न ही कोई एडवोकेट स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के किसी भी संकल्प या आदेश के किसी भी जानबूझकर किए गए उल्लंघन, अवहेलना या अवज्ञा में शामिल नहीं होगा और ऐसा कोई भी कार्य/आचरण कदाचार के रूप में माना जाएगा और ऐसे एडवोकेट के खिलाफ एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 या 36 के तहत कार्यवाही की जा सकती है।

काउंसिल का कहना है कि संशोधन वकीलों के कदाचार संबंध‌ित मुद्दों को संबोधित करने और पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों में सुधार करने के लिए किए गए हैं।

महत्वपूर्ण संशोधन

एडवोकेट दैनिक जीवन में स्वयं को एक जेंटलमैन/जेंटलमैन महिला के रूप में आचरण करेगा

एक एडवोकेट दैनिक जीवन में जेंटलमैन / जेंटल लेडी के रूप में आचरण करेगा और वह कोई भी गैरकानूनी कार्य नहीं करेगा, वह प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया में कोई बयान नहीं देगा, जो कि किसी भी कोर्ट या जज या न्यायपालिका के किसी सदस्य के खिलाफ, या स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के खिलाफ अभद्र या लज्जाजनक, अपमानजनक या प्रेरित, दुर्भावनापूर्ण या शरारती है और न ही कोई वकील स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के किसी भी संकल्प या आदेश के किसी भी जानबूझकर किए गए उल्लंघन, अवहेलना या अवज्ञा में संलग्न नहीं होगा या और इस प्रकार के किसी भी कार्य/आचरण को कदाचार माना जाएगा और ऐसे वकील एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 या 36 के तहत कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होंगे।

बार काउंसिल के सदस्यों के लिए आचार संहिता और अयोग्यता

(i) किसी भी राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के किसी भी सदस्य को संबंधित राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के किसी भी संकल्प या आदेश के खिलाफ प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया में कुछ भी प्रकाशित करने या कोई बयान या प्रेस-विज्ञप्ति जारी करने या काउंसिल ऑफ इंडिया या बार काउंसिल या उसके पदाधिकारियों या सदस्यों के खिलाफ किसी भी प्रकार के अपमानजनक या न‌िंदापूर्ण भाषा/टिप्पणी/शब्द कहने/उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

(ii) किसी भी राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के निर्णय की बार काउंसिल के किसी भी सदस्य द्वारा सार्वजनिक स्तर पर आलोचना या हमला नहीं किया जाएगा।

(iii) कोई भी एडवोकेट या किसी भी राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया का कोई सदस्य राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया की गरिमा या अधिकार को कम नहीं करेगा।

उल्लंघन कदाचार के बराबर, जिसके परिणामस्वरूप अयोग्यता, निलंबन या निष्कासन हो सकता है

"इस आचार संहिता के उपर्युक्त खंड (i) से (iii) का उल्लंघन एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 के तहत अन्य कदाचार के बराबर हो सकता है, और / या धारा-V और / या VA का उल्लंघन का परिणाम निलंबन या बार काउंसिल से ऐसे सदस्य की सदस्यता का समापन होगा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ऐसे वकीलों (जैसा कि ऊपर-अनुभाग-V में उल्लेख किया गया है) या बार काउंसिल के किसी भी सदस्य को किसी भी बार एसोसिएशन या बार काउंसिल के चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर सकती है। यह कदाचार की गंभीरता के अनुसार किसी भी अवधि तक हो सकता है। राज्य बार काउंसिल अपने किसी भी सदस्य के कदाचार या इन नियमों के उल्लंघन के मामलों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया को संदर्भित कर सकता है।"

नियमों में स्पष्ट किय गया है कि अच्छे विश्वास के साथ की गई स्वस्थ और प्रामाणिक आलोचनाओं को "कदाचार" नहीं माना जाएगा।

अयोग्यता घोषित करने की प्रक्रिया

-किसी भी एडवोकेट या बार काउंसिल के सदस्य को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने के लिए, बार काउंसिल ऑफ इंडिया को पूर्व मुख्य न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली "3 सदस्य समिति" द्वारा जांच करने की आवश्यकता होगी। समिति का गठन बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा किया जाएगा और इसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया का कोई भी सदस्य या किसी राज्य बार काउंसिल का सदस्य या पदाधिकारी या बार में रहा कम से कम 25 साल अनुभवी कोई भी वकील शामिल हो सकता है।

-बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा किसी भी मामले के ऐसे संदर्भ के बाद, समिति संबंधित वकील(ओं) / सदस्य (ओं) को नोटिस जारी करेगी और उन्हें सुनवाई का अवसर देगी। बार काउंसिल ऑफ इंडिया समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद अपना निर्णय लेगी।

-बार काउंसिल ऑफ इंडिया और/या उसके द्वारा गठित समिति/समितियों के समक्ष अयोग्यता की कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के मानदंडों का अनुपालन करेगी और इसे धारा 49(1)(ए) या 49(1 )(एबी) के तहत पारित आदेश माना जाएगा।

अधिसूचना पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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