Begin typing your search above and press return to search.
ताजा खबरें

सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले : एमिकस क्यूरी ने ईडी, सीबीआई और एनआईए मामलों के लिए निगरानी समिति के गठन की मांग की

LiveLaw News Network
4 Feb 2022 7:35 AM GMT
सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले : एमिकस क्यूरी ने ईडी, सीबीआई और एनआईए मामलों के लिए निगरानी समिति के गठन की मांग की
x

एमिकस क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि दो वर्षों में सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या 4122 से बढ़कर 4984 हो गई है, जो दर्शाता है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अधिक से अधिक व्यक्ति संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों पर कब्जा कर रहे हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया, जिन्हें सांसद/विधायकों के खिलाफ मामलों के शीघ्र निपटान और विशेष अदालतों के गठन के मामले में अदालत की सहायता के लिए एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया गया है, ने अदालत के समक्ष एक रिपोर्ट के माध्यम से प्रस्तुतियां दी हैं। वर्तमान रिपोर्ट उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों की श्रृंखला में 16वीं कड़ी है।

यह कहते हुए कि 4984 ऐसे मामले लंबित हैं, जिनमें से 1899 मामले 5 साल से अधिक पुराने हैं, जैसा कि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, एमिकस क्यूरी ने लंबित आपराधिक मामलों का निस्तारण करने के लिए त्वरित और फौरी कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

रिपोर्ट में कहा गया है,

"4984 मामले लंबित हैं, जिनमें से 1899 मामले 5 साल से अधिक पुराने हैं। यह ध्यान दिया जा सकता है कि दिसंबर 2018 तक लंबित मामलों की कुल संख्या 4110 थी, और अक्टूबर 2020 तक 4859 थी। 04.12.2018 के बाद 2775 मामलों के निपटान के बाद भी सांसदों/विधायकों के खिलाफ मामले 4122 से बढ़कर 4984 हो गए हैं।"

एमिकस क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया है कि केंद्र सरकार ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की त्वरित जांच और मामलों की सुनवाई और न्यायालयों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के संबंध में न्यायालय के आदेश के संदर्भ में कोई जवाब दाखिल नहीं किया है।

एमिकस के अनुसार, यह आवश्यक है कि सभी न्यायालय जो सांसदों/विधायकों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई कर रहे हैं, इंटरनेट सुविधा के माध्यम से अदालती कार्यवाही के संचालन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे से लैस हों।

एमिकस ने केंद्र सरकार को वर्चुअल मोड के माध्यम से अदालतों के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए धन उपलब्ध कराने के लिए निर्देश देने की मांग की है, यानी वीडियो कॉन्फ्रेंस सुविधाओं की उपलब्धता को सुविधाजनक बनाकर।

हाईकोर्ट को इस संबंध में आवश्यक धनराशि के संबंध में भारत सरकार के कानून सचिव को एक प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा प्रस्ताव के दो सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा इस प्रकार जारी की गई धनराशि राज्य सरकार के साथ साझाकरण पैटर्न के अनुसार अंतिम समायोजन के अधीन होगी।

एमिकस ने प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो और राष्ट्रीय जांच एजेंसी के समक्ष लंबित मामलों की जांच की निगरानी के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश या हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति के गठन के लिए निर्देश देने की मांग की है।

एमिकस द्वारा मांगे गए अन्य निर्देश निम्नलिखित हैं:

• सांसदों/विधायकों के खिलाफ मामलों से निपटने वाले न्यायालय इन मामलों की विशेष रूप से सुनवाई करेंगे। अन्य मामलों की सुनवाई ऐसे मामलों की सुनवाई पूरी होने के बाद ही की जाएगी।

• धारा 309 सीआरपीसी के संदर्भ में ट्रायल दिन-प्रतिदिन के आधार पर आयोजित किया जाएगा। हाईकोर्ट और/अथवा प्रत्येक जिले के प्रमुख सत्र न्यायाधीशों द्वारा दो सप्ताह के भीतर कार्य का आवश्यक आवंटन किया जाएगा।

• अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों ही मामले की सुनवाई में सहयोग करेंगे और कोई स्थगन नहीं दिया जाएगा। यदि लोक अभियोजक और/या अभियोजन त्वरित सुनवाई में सहयोग करने में विफल रहता है, तो मामले की रिपोर्ट राज्य के मुख्य सचिव को की जाएगी जो आवश्यक उपचारात्मक उपाय करेंगे। यदि आरोपी मुकदमे में देरी करता है, तो उसकी जमानत रद्द कर दी जाएगी।

•ट्रायल कोर्ट प्रत्येक ऐसे मामले पर संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष एक रिपोर्ट भेजेगा जहां सुनवाई पांच वर्ष से अधिक समय से लंबित है, देरी के कारणों के बारे में और उपचारात्मक उपायों का सुझाव देगा। हाईकोर्ट दिनांक 16.09.2020 के आदेश के पैरा 18 के अनुसार पंजीकृत स्वत: संज्ञान से दायर याचिकाओं में न्यायिक पक्ष पर इन रिपोर्टों पर विचार करेगा और ट्रायल के ठहराव को दूर करने के लिए उचित आदेश पारित करेगा।

सुप्रीम कोर्ट वर्तमान मामले के माध्यम से सांसदों/विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के त्वरित निपटान की निगरानी कर रहा है और उसने समय-समय पर निम्नलिखित अंतरिम आदेश पारित किए हैं :

(i) आदेश दिनांक 01.11.2018:

सभी हाईकोर्ट को निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के संबंध में निर्धारित प्रारूप में जानकारी प्रस्तुत करने का निर्देश।

(ii) आदेश दिनांक 04.12.2018:

पीठ ने प्रत्येक हाईकोर्ट से पूर्व और मौजूदा विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों को कई सत्र न्यायालयों और मजिस्ट्रियल न्यायालयों को सौंपने / आवंटित करने का अनुरोध किया, जैसा कि प्रत्येक हाईकोर्ट उचित, उपयुक्त और समीचीन समझ सकता है।

एमिकस क्यूरी द्वारा इंगित प्रक्रियात्मक कदम का प्रत्येक नामित न्यायालय द्वारा पालन किया जाना है, सिवाय इसके कि मौजूदा और पूर्व सांसदों/विधायकों के खिलाफ आजीवन कारावास की सजा के साथ दंडनीय अपराधों को पहली प्राथमिकता पर लिया जाएगा, इसके बाद अनुक्रमिक आदेश के तहत ऊपर बताए गएमौजूदा विधायकों और पूर्व विधायकों से जुड़े मामलों के बीच बिना कोई अंतर किए लिए जाएंगे।

(iii) आदेश दिनांक 05.03.2020:

हाईकोर्ट को सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या और सुनवाई पूरी होने में अपेक्षित समय को संशोधित प्रारूप में सूचना प्रस्तुत करने का निर्देश

(iv) आदेश दिनांक 16.09.2020:

प्रत्येक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को आवश्यक विशेष न्यायालयों की संख्या को युक्तिसंगत बनाने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने और प्रस्तुत करने का निर्देश। मुख्य न्यायाधीशों को इस बात पर विचार करने के लिए कहा गया था कि यदि ट्रायल पहले से ही तेजी से चल रहे हैं, तो क्या इसे एक अलग न्यायालय में स्थानांतरित करना आवश्यक और उचित होगा।

(v) आदेश दिनांक 04.11.2020:

निर्देश है कि इन मामलों में अनावश्यक विलंब को रोकने के लिए कोई अनावश्यक स्थगन न दिया जाए। महेंद्र चावला बनाम भारत संघ (2019) के मामले में स्वीकृत गवाह संरक्षण योजना, 2018 को केंद्र और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

ऐसे मामलों में गवाहों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए, ट्रायल कोर्ट इस संबंध में कोई विशिष्ट आवेदन किए बिना गवाहों को उक्त योजना के तहत सुरक्षा प्रदान करने पर विचार कर सकता है।

(vi) आदेश दिनांक 10.08.2021:

निर्देश है कि धारा 321 सीआरपीसी के तहत किसी मौजूदा या पूर्व सांसद/विधायक के खिलाफ हाईकोर्ट की अनुमति के बिनाकोई मुकदमा वापस नहीं लिया जाएगा।

सांसदों/विधायकों के अभियोजन में शामिल विशेष अदालतों या सीबीआई अदालतों की अध्यक्षता करने वाले न्यायिक अधिकारी अगले आदेश तक अपने पदों पर बने रहेंगे और बिना किसी व्यवधान के मुकदमे की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के बिना स्थानांतरित नहीं किए जाएंगे।

(vii) आदेश दिनांक 25.08.2021:

सीबीआई को आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने और आरोप तय करने के लिए सीबीआई अदालतों को आवश्यक सहायता प्रदान करने और मुकदमे को समाप्त करने के लिए आगे बढ़ने के निर्देश।

प्रत्येक हाईकोर्ट को लंबित मुकदमों में तेजी लाने के लिए आवश्यक कदम उठाने और पिछले आदेशों द्वारा पहले से निर्धारित समय सीमा के भीतर इसे समाप्त करने के निर्देश।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अतिरिक्त सीबीआई/विशेष न्यायालयों, जैसा भी मामला हो, की स्थापना के प्रयोजनों के लिए हाईकोर्ट को आवश्यक ढांचागत सुविधाएं प्रदान करने के लिए निर्देश।

सॉलिसिटर जनरल को ईडी और सीबीआई द्वारा जांचे गए मामलों के संबंध में एमिकस क्यूरी की प्रस्तुतियों पर और विशेष रूप से इस न्यायालय द्वारा जांच में देरी के कारणों का मूल्यांकन करने के लिए एक निगरानी समिति के गठन के संबंध में प्रतिक्रिया दर्ज करने के लिए निर्देश।

पृष्ठभूमि:

वर्तमान याचिका 2016 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी जिसमें मांग की गई थी कि दोषी व्यक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से समान रूप से प्रतिबंधित किया जाए।

याचिका में जनप्रतिनिधियों, लोक सेवकों और न्यायपालिका के सदस्यों से संबंधित आपराधिक मामलों को एक साल के भीतर तय करने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा प्रदान करने और दोषियों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से समान रूप से प्रतिबंधित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिका में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए चुनाव आयोग, विधि आयोग और राष्ट्रीय आयोग द्वारा प्रस्तावित "महत्वपूर्ण चुनावी सुधार" को लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई है;

सासंदों व विधायकों के लिए न्यूनतम योग्यता और अधिकतम आयु सीमा निर्धारित करने के निर्देश और याचिकाकर्ता को याचिका की लागत की अनुमति देने की मांग की गई है।

केस : अश्विनी कुमार उपाध्याय और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य

Next Story