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"यह धारणा कि गृहण‌ियां "काम" नहीं करतीं या वे घर में आर्थिक योगदान नहीं देती, समस्यापूर्ण विचार", मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा

LiveLaw News Network
6 Jan 2021 4:30 AM GMT
यह धारणा कि गृहण‌ियां काम नहीं करतीं या वे घर में आर्थिक योगदान नहीं देती, समस्यापूर्ण विचार, मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा
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"यह धारणा कि गृहण‌ियां "काम" नहीं करती हैं या वे घर में आर्थिक योगदान नहीं देती हैं, समस्यापूर्ण विचार है। कई वर्षों से ऐसी समझ कायम है और इसे दूर किया जाना चाहिए।" जस्टिस एनवी रमना ने मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति के दावे के एक मामले में फैसला देते हुए यह टिप्पणी की।

अदालत सड़क दुर्घटना में मारे गए मृतक दंपति के वारिसों की ओर से दायर मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति दावे की एक अपील का निस्तारण कर रही थी। मामले में एक मृतक गृहणी थी। इस मामले में, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने दावेदारों को दोनों मृतकों के एवज में कुल 40.71 लाख रुपए की राशि प्रदान की थी। बीमा कंपनी की ओर से दायर अपील को आंशिक रूप से अनुमति देते हुए, हाईकोर्ट ने भविष्य की संभावनाओं के जोड़ के फैसले को पलट दिया था।

पीठ ने दावेदारों की अपील को अनुमति देते हुए मुआवजा 11.30 लाख रुपए बढ़ाकर 33.20 लाख रुपए कर दिया। हाईकोर्ट ने 22 लाख रुपए मुआवजा दिया था। जस्टिस सूर्यकांत के फैसले के साथ सहमति व्यक्त करते हुए जज ने अपनी अलग राय दी।

अपनी राय में, जज ने कहा कि ऐसी दो अलग-अलग श्रेणियां होती हैं, जिनमें न्यायालय पीड़ित की आय का निर्धारण करती है। मामलों की पहली श्रेणी उन लोगों से संबंधित होती है, जिनमें पीड़ित नौकरी कर रहा होता है, लेकिन दावेदार अदालत के समक्ष उसकी वास्तविक आय साबित करने में सक्षम नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में, अदालत रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर पीड़ित की आय का अनुमान लगाती है, जैसे कि पीड़ित और उसके परिवार का जीवन स्तर, जिस क्षेत्र में पीड़ित कार्यरत था, उसमें किसी अन्य व्यक्ति की सामान्य कमाई, पीड़ित की योग्यता, और अन्य विचार,।

जज ने कहा, दूसरी श्रेणी के मामले उन स्थितियों से संबंधित है, जिनमें अदालत को ऐसे पीड़ित व्यक्ति की आय का निर्धारण करने के लिए बुलाया जाता है, जो कमाता नहीं होता है, जैसे कि बच्चा, छात्र या गृहिणी।

इस संदर्भ में, जज ने कहा कि भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 159.85 मिलियन महिलाओं ने "घरेलू काम" को अपना मुख्य काम बताया है, जबकि पुरुषों की श्रेणी में यह संख्या 5.79 मिलियन थी।

जज ने कहा,

"घरेलू कार्यों में समर्पित समय और प्रयास की मात्रा, जिन्हें पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक करती हैं, चौंकाती नहीं है, जब आप घर के कामों पर विचार करते हैं। गृहणी अक्सर भोजन तैयार करती है, किराने का सामान और घर की अन्य जरूरतों की खरीदारी करती है, घर और आसपास की सफाई और प्रबंधन करती है, सजावट, मरम्मत और रखरखाव का काम करती है, बच्चों की जरूरतों और घर के वृद्ध सदस्य की देखभाल करती है, बजट का प्रबंधन करती है और बहुत से काम करती है। ग्रामीण परिवारों में, वे अक्सर खेत में बुवाई, कटाई और रोपाई जैसे कामों में सहायता करती हैं, इसके अलावा मवेशियों की देखभाल करती हैं।"

"इसलिए, एक गृहिणी की काल्पनिक आय को निर्धारित करने का मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उन तमाम महिलाओं के कार्यों को मान्यता देता है, जो इस गतिविधि में लगी हुई हैं, चाहे विकल्प के रूप में या सामाजिक/सांस्कृतिक मानदंडों के परिणामस्वरूप। यह बड़े पैमाने पर समाज को संकेत देता कि कानून और न्यायालय गृहणियों के श्रम, सेवाओं और बलिदानों के मूल्य में विश्वास करता है। यह इस विचार की स्वीकृति है कि ये गतिविधियां परिवार की आर्थिक स्थिति में वास्तविक रूप से योगदान करती हैं और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान करती हैं, इस तथ्य के बावजूद इन्हें पारंपरिक रूप से आर्थिक विश्लेषण से बाहर रखा गया है। यह बदलते दृष्टिकोण, मानसिकता और हमारे अंतरराष्ट्रीय कानून दायित्वों का प्रतीक है। और, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सामाजिक समानता की संवैधानिक दृष्टि की ओर एक कदम है और सभी व्यक्तियों को जीवन की गरिमा सुनिश्चित करता है।"

इन अवलोकनों के साथ जज ने गृहणियों के लिए काल्प‌निक आय की गणना और इस संबंध में भविष्य की संभावनाओं के अनुदान पर अपनी राय दी, जो इस प्रकार है-

-मुआवजे का अनुदान, एक गृहिणी के संबंध में, धन संबंधी आधार पर, कानून का एक तय प्रस्ताव है।

-घरेलू कार्यों की लैंगिक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए...गृहिणी की काल्पनिक आय का निर्धारण महत्वपूर्ण है।

-मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर, एक गृहिणी की काल्पनिक आय को तय करने के लिए न्यायालय द्वारा विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जा सकता है।

केस: कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड CIVIL APPEAL NOS.1920 0f 2021]

कोरम: जस्टिस एनवी रमना, एस। अब्दुल नज़ीर और सूर्यकांत

Citation: LL 2021 SC 2

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