कॉलेजियम सिस्टम सरकार द्वारा जजों की नियुक्ति करने की तरह काम करता है: जस्टिस रेखा शर्मा
Shahadat
28 Oct 2026 10:33 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रेखा शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की आलोचना करते हुए कहा कि यह उस पुरानी व्यवस्था से बेहतर नहीं है, जिसमें सरकार जजों की नियुक्ति करती थी। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम भी जजों की नियुक्ति अपनी "मनमर्जी" से ही करता है।
जस्टिस शर्मा 'कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स' (CJAR) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में 'भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की जवाबदेही' विषय पर बोल रही थीं।
उन्होंने बताया कि पहले जजों की नियुक्ति सरकार करती थी, जिसे बाद में बदलकर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सिस्टम लाया गया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि यह महसूस किया जाने लगा था कि नियुक्तियां राजनीतिक विचारधाराओं, पक्षपात और भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) के आधार पर हो रही थीं। लेकिन, यह नया समाधान तो बीमारी से भी बदतर साबित हुआ।
उन्होंने कहा,
"मैं बहुत स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगी कि कॉलेजियम सिस्टम लगभग पूरी तरह से विफल हो चुका है। आइए थोड़ा इतिहास पर नज़र डालते हैं। कॉलेजियम सिस्टम 1993 और 1998 में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों के ज़रिए अस्तित्व में आया। उससे पहले, संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति सरकार करती थी। तब यह माना जाता था कि इसमें भाई-भतीजावाद और पक्षपात होता है और सरकार अपने ही लोगों को नियुक्त करती है, जिनकी राजनीतिक विचारधारा सत्ताधारी सरकार से मेल खाती है।"
उन्होंने आगे कहा:
"जजों की नियुक्ति का अधिकार सरकार से ले लिया गया और सुप्रीम कोर्ट ने खुद जज चुनने की ज़िम्मेदारी ले ली। लेकिन, सच कहूं तो यह समाधान तो उस बीमारी से भी ज़्यादा खराब निकला। मेरे पास कई उदाहरण हैं... असल बात तो यह है कि अब भाई-भतीजावाद और पक्षपात कहीं ज़्यादा बढ़ गया; यह अब और भी खुलकर सामने आता है, ज़्यादा राजनीतिक हो गया और पूरी तरह से 'रिश्तेदारों' पर केंद्रित हो गया।"
उन्होंने हाल के दो उदाहरण दिए: कॉलेजियम द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के जज के रूप में एडवोकेट एल. विक्टोरिया गौरी की सिफारिश करना, और पूर्व CJI बी.आर. गवई के भतीजे को बॉम्बे हाईकोर्ट का जज बनाना। जस्टिस गौरी के मामले पर जस्टिस शर्मा ने सवाल उठाया कि क्या कॉलेजियम उनके नाम को मंजूरी देने के लिए बाध्य था, जबकि बाद में यह पता चला कि भारतीय जनता पार्टी के साथ उनकी कुछ राजनीतिक संबद्धता थी और उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए टिप्पणियां की थीं?
उन्होंने कहा:
"मद्रास हाईकोर्ट में जज हैं। उनकी नियुक्ति से पहले, ऐसी खबरें थीं कि वे बीजेपी महिला मोर्चा से जुड़ी हुई थीं। उन पर मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां करने का भी आरोप था। यह तो समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति के मूल स्थान या पृष्ठभूमि के आधार पर उसका नाम सुझाया जाए, लेकिन क्या कॉलेजियम उनके नाम को मंजूरी देने के लिए बाध्य था?"
उन्होंने आगे कहा:
"एक और मामला है, जिसमें भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) के भतीजे को बॉम्बे हाईकोर्ट में नियुक्त किया गया। जब इस पर चर्चा या सवाल उठे तो हमें बताया गया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कॉलेजियम की विचार-विमर्श प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया था। क्या इतना काफी था? उनका खुद को अलग करना ही कॉलेजियम के बाकी सदस्यों के लिए एक संकेत था कि इस नाम को हटा दिया जाना चाहिए। चलिए, इसे भी छोड़िए। क्या उस नाम की सिफारिश तब तक नहीं रोकी जा सकती थी, जब तक कि CJI अपना पद न छोड़ दें? हमें ऐसा लगता है कि कॉलेजियम अपनी मर्जी से जजों की नियुक्ति और तबादले करता है।"
उन्होंने जस्टिस अकील कुरैशी को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत न करने के लिए भी कॉलेजियम की आलोचना की, क्योंकि सरकार इसके खिलाफ थी।
जस्टिस शर्मा ने कहा,
"आपने जस्टिस अकील कुरैशी का नाम सुना होगा। कॉलेजियम 2 साल तक गतिरोध में फंसा रहा, क्योंकि उस समय की सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नहीं चाहती थी। कॉलेजियम के एक सदस्य, जस्टिस नरीमन ने इस पर कड़ा रुख अपनाया, क्योंकि वरिष्ठता सूची में जस्टिस अकील कुरैशी सबसे ऊपर थे। जस्टिस नरीमन के रिटायर होने के 7 दिनों के भीतर ही कॉलेजियम ने 9 नामों की सिफारिश की, जिसमें से जस्टिस अकील कुरैशी का नाम हटा दिया गया।"
उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के विवादित बयानों का जिक्र करते हुए जजों के आचरण के लिए उनकी जवाबदेही (Judicial Accountability) पर भी बात की।
जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की कि कॉलेजियम ने ही उन्हें बिना किसी कार्रवाई के बच निकलने दिया, जबकि उस जज ने एक समुदाय के खिलाफ विवादित टिप्पणियां की थीं।
उन्होंने कहा,
"हाल ही में, इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित सेमिनार में मुसलमानों के खिलाफ कुछ भड़काऊ टिप्पणियां कीं। वह भी खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के परिसर में। कॉलेजियम ने उन्हें बुलाया, और माना जाता है कि वह अपनी टिप्पणियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को राजी हो गए। लेकिन जब वह इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे तो न केवल वह अपने वादे से मुकर गए, बल्कि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर यह भी कहा कि ऐसी टिप्पणियां करके उन्होंने न्यायिक मर्यादा के किसी भी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं किया। वह जज साहब रिटायर हो गए और अपनी जहरीली टिप्पणियों के लिए उन पर कोई आंच नहीं आई।"
जस्टिस यादव के मामले के विपरीत जस्टिस शर्मा ने बताया कि जस्टिस श्रीधरन का बार-बार तबादला किया गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने एक मंत्री के खिलाफ 'सुओ मोटो' (स्वतः संज्ञान लेते हुए) FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। उस मंत्री ने कर्नल सोफिया को एक आतंकवादी की बहन कहा था।
जस्टिस शर्मा ने इस संबंध में कहा,
"इसके विपरीत, जस्टिस श्रीधरन को देखिए। उन्होंने मध्य प्रदेश के एक मंत्री के खिलाफ 'सुओ मोटो' कार्रवाई की, जिसने कर्नल सोफिया को आतंकवादी की बहन कहा था, और उस मंत्री के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद कॉलेजियम ने पहले उनका तबादला छत्तीसगढ़ कर दिया, और फिर सरकार के कहने पर उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया।"
जस्टिस शर्मा ने सवाल उठाया कि ऐसी घटनाओं के लिए कॉलेजियम को दोषी ठहराया जाना चाहिए या सरकार को।
जस्टिस शर्मा ने कहा,
"कॉलेजियम सिस्टम भी ठीक उसी तरह काम कर रहा है, जिस तरह सरकार नियुक्तियां करती है। मुझे इन दोनों में कोई फर्क नहीं दिखता।"
जस्टिस शर्मा ने कुछ अन्य मुद्दों पर भी संक्षेप में बात की, जैसे कि अदालतें बार-बार 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' (bail is the rule, jail an exception) के सिद्धांत को बनाए रखने में विफल रही हैं। उन्होंने कहा कि एक के बाद एक कई जज इस सिद्धांत का पालन कराने में नाकाम रहे हैं।
"'जमानत नियम है, जेल नहीं' - लेकिन कई जज इस सिद्धांत को पूरी तरह से दरकिनार कर रहे हैं। उन लोगों से पूछिए जो पिछले छह सालों से जेल में सड़ रहे हैं। जब हम रोस्टर सिस्टम की बात करते हैं - चाहे वह सुप्रीम कोर्ट हो या हाईकोर्ट - तो आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए एक तय अदालत होनी चाहिए। जमानत और 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) से जुड़े मामलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, बाकी सब इंतजार कर सकते हैं।"
जस्टिस शर्मा ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि यह निराशाजनक है कि मतदाता सूची से करोड़ों लोगों के नाम हटा दिए जाने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट कोई भी "अर्थपूर्ण आदेश" पारित करने में विफल रहा है।
पूर्व जज ने अंत में कहा,
"मतदाता सूची से 13 करोड़ लोगों के नाम हटा दिए गए। यह मामला कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, लेकिन अभी तक एक भी अर्थपूर्ण आदेश नहीं आया। इसका नतीजा क्या हुआ? युवा छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समाज के लोग सड़कों पर उतर आए हैं और शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे हैं। उनके साथ क्या हुआ? उन्हें पीटा गया, पुलिस वैन में ठूंस दिया गया। और यह सब ठीक सुप्रीम कोर्ट की नाक के नीचे हो रहा है, जिसे संविधान के तहत आम नागरिकों के ऐसे अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।"

