IBC कार्यवाही में ADAG कंपनियों के खिलाफ 2983 करोड़ रुपये के दावे 26 करोड़ रुपये में निपटाए गए: ED रिपोर्ट से सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन
Shahadat
23 March 2026 5:12 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए कहा कि अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) की कुछ कंपनियों पर बकाया 2983 करोड़ रुपये के कर्ज को दिवाला कार्यवाही (Insolvency Proceedings) में मात्र 26 करोड़ रुपये में निपटा दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ये सभी अधिग्रहण 8 नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों द्वारा "प्रोजेक्ट हेल्प" के माध्यम से संभव हो पाए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) की कंपनियों द्वारा कथित तौर पर 40,000 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण घोटाले की जांच की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इससे पहले, इस मामले की जांच में एजेंसियों की ओर से हुई "अस्पष्ट देरी" पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने ED और CBI को मामले की जांच तेजी से करने का निर्देश दिया था।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि ED अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित कर दी गई और जांच जारी है।
पीठ ने जब इस मामले में निष्पक्ष, तटस्थ और समयबद्ध जांच के महत्व पर जोर दिया तो SG ने कहा कि इसे 4 सप्ताह के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।
एसजी के अलावा, सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी (अनिल अंबानी की ओर से) और एडवोकेट प्रशांत भूषण (याचिकाकर्ता EAS सरमा की ओर से) भी सुनवाई में उपस्थित हुए।
सुनवाई के दौरान, पीठ ने ED के हलफनामे का संज्ञान लेते हुए कहा कि एक SIT का गठन किया गया, जिसमें ED के एक एडिशनल डायरेक्टर, 2 सब डायरेक्टर और 4 असिस्टेंट डायरेक्टर/जांच अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा, कुछ फोरेंसिक विश्लेषकों और बैंक ऑफ बड़ौदा के 2 कर्मचारियों को भी SIT के हिस्से के रूप में शामिल किया गया। 8 मामलों में जांच शुरू हो चुकी है।
यह भी पाया गया कि लगभग 2983 करोड़ रुपये के दावों को कुल 26 करोड़ रुपये के निपटारे के बदले समाप्त कर दिया गया।
आदेश में कहा गया,
"यह बताया गया कि 8 मामलों में जांच/पूछताछ शुरू हो गई है और कुछ दस्तावेज़ ज़ब्त किए गए। हमारे लिए उन दस्तावेज़ों की प्रकृति का ज़िक्र करना ज़रूरी नहीं है, जिनके बारे में कहा गया कि उन्हें ज़ब्त किया गया। इसमें 'प्रोजेक्ट हेल्प' का ज़िक्र है, जिससे कथित तौर पर यह पता चला है कि कैसे दिवालियापन की याचिकाएं जान-बूझकर ऐसे कर्ज़दाताओं के ज़रिए शुरू की गईं, जिनका कंपनी से कोई लेना-देना नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक, IBC अधिग्रहणों के ज़रिए की गई सारी फंडिंग 8 NBFCs के एक समूह के ज़रिए जुटाई गई। एक उदाहरण के तौर पर यह बताया गया कि लगभग 2983 करोड़ रुपये के दावों को महज़ 26 करोड़ रुपये के कुल निपटारे के बदले खत्म कर दिया गया।"
पिछली सुनवाई में भूषण ने अदालत को बताया था कि रिलायंस कम्युनिकेशंस को उसके भाई की कंपनी को बकाया रकम के महज़ 1% दाम पर बेच दिया गया। इस संदर्भ में, CJI ने टिप्पणी की कि IBC का बेतहाशा दुरुपयोग किया जा रहा है; कंपनी की संपत्तियों का जान-बूझकर कम मूल्यांकन किया जाता है और फिर उन्हें प्रॉक्सी पार्टियों को बेच दिया जाता है।
CBI के हलफनामे से अदालत को पता चला कि 7 मामले अभी जांच के दायरे में हैं, जिनमें सरकारी अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
इस पृष्ठभूमि में पीठ ने अपने आदेश में कहा,
"यह एक ऐसा मामला है, जहां जांच एजेंसियों के सीनियर अधिकारियों को मिलकर काम करना चाहिए और अनियमितताओं/अवैधताओं, या सरकारी अधिकारियों—विशेष रूप से वित्तीय संस्थानों—की किसी भी मिलीभगत का पता लगाने के लिए ज़ोरदार प्रयास करने चाहिए, यदि उन्होंने किसी को अनुचित लाभ पहुंचाया। हालांकि हम आरोपों की मेरिट पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम सिर्फ़ इतना कहना चाहते हैं कि CBI और ED के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि वे जांच को पूरी तरह से निष्पक्ष, न्यायसंगत, पारदर्शी और स्वतंत्र तरीके से पूरा करें, और चल रही जांचों को एक तय समय-सीमा के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाएं।"
इसमें आगे यह भी दर्ज किया गया,
"माननीय एसजी ने आश्वासन दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी और जांच को 4 हफ़्तों के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।"
बेंच ने आगे सभी बैंकों और एजेंसियों को आदेश दिया कि वे ED को ज़रूरी जानकारी देकर जांच में सहयोग करें।
"सभी संबंधित एजेंसियों/वित्तीय संस्थानों/अन्य व्यक्तियों को निर्देश दिया जाता है कि वे ED को पूरा सहयोग दें और ज़रूरी जानकारी उपलब्ध कराएं। अगर कोई आनाकानी, विरोध या देरी होती है, तो ED इस कोर्ट को रिपोर्ट सौंपे।"
अंबानी की ओर से रोहतगी ने गुज़ारिश की कि बैंकों से संपर्क किया गया ताकि यह देखा जा सके कि क्या कोई हल निकल सकता है, लेकिन केस पेंडिंग होने की वजह से बैंक बातचीत करने में हिचकिचा रहे हैं।
उन्होंने कहा,
"बैंक मुझसे बातचीत करें।"
इसके जवाब में CJI ने कहा,
"हमने किसी को नहीं रोका है। और बैंक बातचीत करेंगे... वे खुशी-खुशी बातचीत में शामिल होंगे... क्योंकि यह उनके लिए नतीजों से बचने का एक और तरीका है। अगर कोई नतीजा निकलता है तो।"
एसजी मेहता ने यह भी बताया कि CBI ने लेन-देन की ऑडिट करने के लिए 3 ट्रांज़ैक्शन ऑडिटर नियुक्त किए और 15,000 करोड़ रुपये की संपत्तियां ज़ब्त कर ली गईं।
दूसरी ओर, भूषण ने दावा किया कि इस मामले में कोई खास गिरफ़्तारी नहीं हुई, जबकि SEBI की रिपोर्ट में कहा गया कि अनिल अंबानी ने एक धोखाधड़ी वाली साज़िश रची थी, जिसे RHFL के मुख्य प्रबंधकीय अधिकारियों ने चलाया ताकि पब्लिक फंड को लोन के तौर पर दिखाकर उसे हड़पा जा सके।
उन्होंने कहा,
"CBI ने अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं की।"
इस दावे का खंडन करते हुए एसजी ने कहा कि अब तक 4 गिरफ़्तारियां हुई हैं।
उन्होंने कहा,
"हम किसी को भी ऐसे ही गिरफ़्तार नहीं कर सकते। यह जांच के हिसाब से ही होना चाहिए।"
इस पर भूषण ने आरोप लगाया कि सिर्फ़ कुछ छोटे अधिकारियों को गिरफ़्तार किया गया, मुख्य व्यक्ति को नहीं। हालांकि, एसजी इससे सहमत नहीं थे।
CJI ने अपनी ओर से कहा,
"हम यह नहीं कह सकते कि किसे गिरफ़्तार किया जाना चाहिए और किसे नहीं।"
साथ ही, CJI ने जांच एजेंसियों के काम करने के तरीके पर नाराज़गी ज़ाहिर की।
CJI ने कहा,
"जिस तरह से जांच एजेंसियों ने आनाकानी दिखाई, वह मंज़ूर नहीं है। उन्हें निष्पक्ष, पारदर्शी और समय-सीमा के अंदर यह बताना चाहिए कि जांच के बाद वे किस नतीजे पर पहुँचे हैं। जांच से न सिर्फ़ कोर्ट का, बल्कि सभी संबंधित पक्षों का भी भरोसा बढ़ना चाहिए।"
Case Title: EAS Sarma v. Union of India and others | W.P.(C) No. 1217/2025

