केंद्र को राज्यों को अधीनस्थ नहीं समझना चाहिए, किसी राज्य के नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना
Shahadat
4 April 2026 4:50 PM IST

सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने शनिवार को इस बात पर ज़ोर दिया कि केंद्र-राज्य संबंध संवैधानिक शासन पर आधारित होने चाहिए और यह इस बात पर निर्भर नहीं कर सकता कि सत्ता में कौन-सी राजनीतिक पार्टी है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी राज्य के नागरिकों के साथ विकास या शासन के मामलों में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में "अधिकारों से परे संवैधानिकता: संरचना क्यों मायने रखती है?" विषय पर आयोजित पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा,
"केंद्र को राज्यों को अधीनस्थ नहीं, बल्कि समान सहयोगी के रूप में देखना चाहिए।"
उन्होंने कहा,
"राज्य सरकारें केंद्र सरकार के अधीनस्थ नहीं हैं, सिवाय उन मामलों के जो संविधान में निर्धारित हैं। इसलिए उन्हें वह सम्मान और व्यवहार मिलना चाहिए जो उनका हक है, भले ही सत्ता में कोई भी राजनीतिक पार्टी हो। केंद्र-राज्य संबंधों के मामले में पार्टियों के बीच के मतभेदों या अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं को एक तरफ रख देना चाहिए, क्योंकि यह संवैधानिक शासन के दायरे में आता है। यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि केंद्र में कौन-सी पार्टी शासन कर रही है और राज्य स्तर पर कौन सी पार्टी। नागरिकों को दोनों सरकारों द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं और उपायों का लाभ मिलना चाहिए।"
राज्यों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता
उन्होंने टिप्पणी की कि किसी राज्य के नागरिकों के साथ विकास या शासन के मामलों में भेदभाव नहीं किया जा सकता। जब किसी राज्य के नागरिकों के लिए विकास कार्यक्रमों की बात आती है तो राज्यों के मामले में 'चुनिंदा' (Pick and Choose) रवैया नहीं अपनाया जा सकता। इसलिए एक उचित दृष्टिकोण के रूप में समानता को अपनाया जाना चाहिए।
आगे कहा गया,
"भारत के संविधान को संरचना में संघीय और भावना में एकात्मक कहा जाता है। इसलिए किसी राज्य के नागरिकों के साथ विकास या शासन के मामलों में भेदभाव नहीं किया जा सकता। जब किसी राज्य के नागरिकों के लिए विकास कार्यक्रमों की बात आती है तो राज्यों के मामले में 'चुनिंदा' रवैया नहीं अपनाया जा सकता। एक निष्पक्ष दृष्टिकोण के रूप में समानता को अपनाया जाना चाहिए।"
संविधान में सत्ता के ऊर्ध्वाधर विभाजन (Vertical Division of Authority) पर प्रकाश डालते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कोई भी एक केंद्र राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार नहीं जमा सकता। उन्होंने समझाया कि संघीय ढांचा केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का वितरण करता है ताकि शासन में संतुलन, जवाबदेही और संवेदनशीलता सुनिश्चित की जा सके।
केंद्र और राज्यों के बीच या राज्यों के आपस में टकराव देश के लिए अच्छा नहीं
जस्टिस नागरत्ना ने आगाह किया:
"इस प्रकार, केंद्र और राज्यों के बीच या राज्यों के आपस में टकराव बढ़ना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। इससे शासन के संवैधानिक स्वरूप को ठेस पहुंचती है, जिससे हमेशा बचना चाहिए; क्योंकि देश की ताकत संवैधानिक बुनियाद और सिद्धांतों पर टिकी होती है। एक परिपक्व संघ को विरोधी बनकर तुरंत अदालतों का रुख नहीं करना चाहिए। इसके बजाय उसे बातचीत, मोलभाव और मध्यस्थता का रास्ता अपनाना चाहिए। जब राज्य एक-दूसरे के खिलाफ, या केंद्र के खिलाफ मुकदमे दायर करना शुरू कर देते हैं तो यह उनकी ताकत नहीं, बल्कि सहकारी संघवाद के कमजोर होने को दर्शाता है। सीमा विवाद या जल-बंटवारे जैसे मुद्दे इतने जटिल, संवेदनशील और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं कि उन्हें केवल अदालतों में विरोधी मुकदमों के जरिए हल नहीं किया जा सकता।"
संविधान किसी एक संस्था पर ही पूरा भरोसा नहीं करता
जस्टिस नागरत्ना ने आगे इस बात पर भी बात की कि संविधान किसी एक संस्था पर—चाहे वह विधायिका हो, कार्यपालिका हो या न्यायपालिका—ही पूरा भरोसा नहीं करता। इसके बजाय, यह एक ऐसी व्यवस्था पर निर्भर करता है, जिसमें हर संस्था दूसरी संस्थाओं पर अंकुश रखती है। बदले में शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के तहत वे संस्थाएँ इस पर भी अंकुश रखती हैं।
उदाहरण के लिए, संसद की शक्ति असीमित नहीं है। यह अनुच्छेद 13 के तहत कुछ ठोस सीमाओं के अधीन है; यह अनुच्छेद उन कानूनों को अमान्य कर देता है जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। यह अनुच्छेद 245 और 246 के तहत विधायी शक्तियों के संघीय बंटवारे से उत्पन्न होने वाली संरचनात्मक सीमाओं के भी अधीन है। साथ ही सातवीं अनुसूची में दी गई तीन सूचियों में शामिल विषयों के भी अधीन है। अंत में, यह अनुच्छेद 32 और 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के भी अधीन है।
इसी तरह कार्यपालिका को सवालों, सार्थक बहसों, प्रस्तावों और यहां तक कि अविश्वास प्रस्ताव की संभावना के ज़रिए विधायिका के प्रति जवाबदेह बनाया जाता है। कार्यपालिका के काम भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि न्यायिक शक्तियों की भी अपनी सीमाएँ होती हैं। न्यायिक शक्तियां संविधान के दायरे में ही काम करती हैं। अदालत संविधान से बाहर किसी अधिकार का दावा नहीं करती। इसके अलावा, संसद संशोधन करके न्यायिक फ़ैसलों को बदल सकती है। आख़िर में, न्यायिक अधिकार अपने आप लागू नहीं होते। उनका अधिकार अंततः कार्यपालिका के पालन पर निर्भर करता है।
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा,
"इस क्षैतिज व्यवस्था का नतीजा हमेशा कार्यकुशलता नहीं, बल्कि कभी-कभी टकराव होता है। इसे अनियंत्रित और अवांछित परिणामों को रोकने के लिए बनाया गया। यह सुनिश्चित करता है कि फ़ैसले जल्दबाज़ी में या बहुमत के हाथों में शक्ति के जमावड़े से न लिए जाएं। भारतीय संविधान, भले ही शक्तियों के कठोर बँटवारे को न अपनाता हो, फिर भी इस ढांचागत समझ को दर्शाता है। जो शक्ति बिना रोक-टोक आगे बढ़ती है, वह तेज़ी से बढ़ती है; जिस शक्ति को जवाब देना होता है, सफ़ाई देनी होती है और अपना बचाव करना होता है, वह धीरे चलती है, लेकिन ज़्यादा सावधानी से चलती है। यह धीमी गति कोई कमी नहीं है। यह एक सुरक्षा कवच है।"
शक्तियों के संवैधानिक बंटवारे पर
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि ढांचागत सुरक्षा उपायों के बिना संविधान में वह जोखिम बना रहता है जिसे जेम्स मैडिसन ने मशहूर तौर पर केवल "कागज़ी गारंटी" कहा था—यानी ऐसे वादे जो कागज़ पर लिखे तो होते हैं, लेकिन शक्ति के संगठन द्वारा समर्थित नहीं होते। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यवस्था का असली संविधान केवल उन अधिकारों में नहीं होता जिनकी वह घोषणा करता है, बल्कि इस बात में होता है कि वह शक्ति या अधिकार को कैसे बांटता है, सीमित करता है और अनुशासित करता है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हमारा संवैधानिक इतिहास—इस बात का पता लगाने के मामले में कि क्या संविधान की शक्तियों की कोई आंतरिक सीमा है—शंकर प्रसाद (1951) और सज्जन सिंह (1965) के मामलों से शुरू हुआ।
दोनों फ़ैसलों में संसद की संशोधन शक्ति को प्रभावी रूप से पूर्ण माना गया। उन्होंने कहा कि इन फ़ैसलों के भीतर भी, संदेह उभरने लगे थे।
उन्होंने कहा,
"यह एक ढांचागत अंतर्ज्ञान था: कि संवैधानिक डिज़ाइन के भीतर ही कुछ सीमाएँ होनी चाहिए।"
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि इसी के चलते गोलकनाथ (1967) फ़ैसला आया, जिसने संशोधन शक्ति पर सीमाएं लगाने का पहला निर्णायक प्रयास किया। लेकिन संसद की प्रतिक्रिया तेज़ थी और उन्होंने 24वाँ संशोधन लाकर अनुच्छेद 13 में संशोधन किया, जिसमें कहा गया कि यह "अनुच्छेद 368 के तहत किए गए इस संविधान के किसी भी संशोधन पर लागू नहीं होगा"। इसके जवाब में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में 'मूल संरचना सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया गया।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा,
"इसके बजाय, इसने एक संरचनात्मक सिद्धांत प्रस्तुत किया: संविधान में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संशोधन इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि उसकी मूल संरचना ही नष्ट हो जाए। यही मूल संरचना सिद्धांत का सार है। मूल संरचना अधिकारों का सिद्धांत नहीं, बल्कि संरचना का सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत कोई भी सत्ता—जिसमें संसद भी शामिल है—इस व्यवस्था को इस प्रकार पुनर्गठित नहीं कर सकती कि उसकी अपनी सीमाओं की शर्तें ही समाप्त हो जाएं।"
इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू (CNLU के कुलाधिपति) और कुलपति फैज़ान मुस्तफ़ा भी उपस्थित रहे।

