पुलिस स्टेशन में CCTV | सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव को पेश होने का निर्देश दिया, पूछा - 'केरल मॉडल' का पालन क्यों नहीं हो सकता?
Shahadat
6 April 2026 5:22 PM IST

पुलिस थानों में चालू CCTV कैमरों की कमी से जुड़े स्वतः संज्ञान (suo motu) मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई की तारीख पर केंद्रीय गृह सचिव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों। उनका काम राज्यों भर में CCTV लगाने की प्रभावी निगरानी के लिए निर्देश जारी करने में कोर्ट की सहायता करना होगा। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अन्य राज्य 'लाइव मॉनिटरिंग' के "केरल मॉडल" को क्यों नहीं अपना रहे हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।
शुरुआत में मामले में एमिक्स क्यूरी (न्याय मित्र) सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने खंडपीठ को सूचित किया कि हालांकि अधिकांश राज्यों ने CCTV कैमरे लगाने की शर्त का पालन किया, फिर भी निगरानी के लिए डैशबोर्ड सिस्टम स्थापित करने का काफी काम अभी बाकी है। उन्होंने बताया कि इस मामले में मध्य प्रदेश, राजस्थान और केरल राज्य "बेहद अच्छा" काम कर रहे हैं।
दवे ने आगे बताया कि केरल ने अब तक का सबसे कुशल सिस्टम विकसित किया, जिससे पुलिस अधिकारी सीधे अपने फोन के माध्यम से लॉग इन करके पुलिस थानों की 'रियल टाइम' (सीधी) निगरानी कर सकते हैं; उन्होंने इसे "लाइव मॉनिटरिंग" व्यवस्था बताया।
हालांकि, दवे ने कुछ राज्यों में कमियों की ओर भी इशारा किया और कहा कि झारखंड में "CCTV लगाने के लिए अभी तक कोई काम नहीं किया गया..."
सुनवाई के दौरान, जस्टिस मेहता ने हाल की उन रिपोर्टों का ज़िक्र किया, जिनमें बताया गया कि पाकिस्तान से जुड़ा एक जासूसी नेटवर्क भारतीय राज्यों में डेटा इकट्ठा करने के लिए CCTV कैमरों का इस्तेमाल कर रहा है।
उन्होंने टिप्पणी की:
"भारत सरकार ने खुद निर्देश दिए कि पड़ोसी देश द्वारा लगाए गए सभी कैमरों को हटा दिया जाए, क्योंकि वे डेटा इकट्ठा करके उसे वहां भेज रहे हैं।"
उन्होंने आगे कहा:
"मुझे अभी-अभी एक खबर मिली है, जिसमें सरकार उन सभी कैमरों को हटाने पर विचार कर रही है। ऐसे में राज्यों को ये कैमरे लगाने के लिए बजट कहां से मिलेगा?"
जस्टिस मेहता ने निगरानी के बुनियादी ढांचे को बदलने से जुड़े व्यापक वित्तीय और लॉजिस्टिक (साजो-सामान संबंधी) प्रभावों को लेकर भी चिंता व्यक्त की और कहा:
"जब सुरक्षा का कोई मुद्दा उठता है तो ये कैमरे केवल पुलिस थानों तक ही सीमित नहीं होते, बल्कि अन्य रणनीतिक स्थानों पर भी लगे होते हैं। ऐसे में जब आप इन्हें बदलने की प्रक्रिया शुरू करेंगे तो यह सभी कैमरों पर लागू होगी; और आपको इतनी बड़ी संख्या में कैमरे कहां से मिलेंगे?"
अदालत के सवालों का जवाब देते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ठाकरे ने बताया कि इस मामले पर केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई खास निर्देश जारी नहीं किए गए। दवे ने आगे कहा कि जहां केरल, राजस्थान और मध्य प्रदेश ने पहले ही डैशबोर्ड सिस्टम शुरू कर दिए, वहीं उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्य इन्हें शुरू करने की प्रक्रिया में हैं।
इसके बाद जस्टिस नाथ ने बेहतरीन तरीकों को एक समान रूप से न अपनाने पर सवाल उठाते हुए कहा:
"अगर आप कहते हैं कि केरल का सिस्टम सबसे अच्छा है तो दूसरे राज्य उसे क्यों नहीं अपना सकते?"
उन्होंने आगे मिलकर काम करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा:
"राज्यों को वैसे भी 40% या 60% हिस्सा देना ही है, केंद्र सरकार पैसा दे रही है, वे केरल मॉडल को अपना सकते हैं; उनसे कहिए कि वे इस पर चर्चा करें... कृपया इसे गंभीरता से लें, मिस्टर ठाकरे, वरना हम आदेश जारी कर देंगे। फिर आप उसे वापस लेने की अर्ज़ी लेकर हमारे पास आएंगे।"
नियमों के पालन की धीमी गति पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए बेंच ने अगली सुनवाई में केंद्रीय गृह सचिव को खुद पेश होने का निर्देश दिया और कहा:
"आप कल अपने गृह सचिव को साथ लेकर आएं... शायद वे आपकी बात नहीं सुन रहे हैं!"
इसके बाद अदालत ने निम्नलिखित निर्देश जारी किया:
"मिस्टर दवे (अदालत के सलाहकार), केंद्र सरकार की ओर से मिस्टर ठाकरे, और अन्य वकीलों की दलीलें सुनने के बाद इस मामले की सुनवाई कल फिर से होगी। भारत सरकार के गृह सचिव इस अदालत के सामने पेश रहें ताकि इस अदालत की निगरानी में चल रही योजना को लागू करने में उनसे उचित मदद ली जा सके।"
Case Details :
(1) IN RE LACK OF FUNCTIONAL CCTVS IN POLICE STATIONS Versus, SMW(C) No. 7/2025
(2) PARAMVIR SINGH SAINI Versus BALJIT SINGH, SLP (Crl) No.3543/2020 (and connected cases)

