क्या वक्फ़ संस्थाएं वक्फ़ ट्रिब्यूनल में कोर्ट फीस से छूट का दावा कर सकती हैं? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
Shahadat
7 Aug 2026 1:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में यह सवाल उठाया गया कि क्या राज्य वक्फ़ ट्रिब्यूनल के सामने होने वाली कार्यवाही में वक्फ़ संस्थाओं को कोर्ट फीस के भुगतान से छूट दी जा सकती है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा ए. अहमदी (याचिकाकर्ता की ओर से) की संक्षिप्त सुनवाई के बाद गुजरात राज्य वक्फ़ ट्रिब्यूनल को नोटिस जारी किया।
अहमदी ने कोर्ट को गुजरात कोर्ट-फीस एक्ट, 2004 के बारे में बताया और तर्क दिया कि इस एक्ट के तहत बने ट्रिब्यूनल के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां नहीं हैं।
जस्टिस मिश्रा ने जनरल क्लॉज़ेज़ एक्ट का ज़िक्र करते हुए कहा कि अगर ट्रिब्यूनल के पास शपथ दिलाने और सबूत लेने की शक्ति है तो वह कोर्ट जैसा ही काम करता है। उन्होंने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता इस याचिका के नतीजे के आधार पर कोर्ट फीस जमा करे।
इस पर अहमदी ने कहा कि वक्फ़ में रहने वाला किरायेदार सिर्फ़ 150 रुपये दे रहा है, और कहा: "यह कोर्ट फीस की बहुत बड़ी रकम है।"
कोर्ट ने कहा कि वह नोटिस जारी करेगा, लेकिन यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें अंतरिम राहत दी जा सके।
जस्टिस मिश्रा ने कहा,
"यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें हम अंतरिम राहत दे सकें।"
संक्षेप में मामला
याचिकाकर्ता ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कोर्ट फीस न देने के कारण वक्फ़ मुकदमों को खारिज करने का फैसला सही ठहराया गया। हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसले का हवाला दिया था कि वक्फ़ संस्थाओं को राज्य वक्फ़ ट्रिब्यूनल के सामने कोर्ट फीस देने से छूट नहीं है।
इससे पहले, यह मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच के सामने था, जिसने सवाल उठाया कि वक्फ़ संस्थाओं को कोर्ट फीस देने से कैसे छूट दी जा सकती है।
17 दिसंबर, 2025 को हाईकोर्ट ने वक्फ़ संस्थाओं द्वारा दायर कई याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इन याचिकाओं में ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को चुनौती दी गई, जिनमें अपर्याप्त कोर्ट फीस के कारण वक्फ़ संपत्तियों से जुड़े विवादों की कार्यवाही खारिज की गई थी। कोर्ट ने कहा कि वक्फ़ एक्ट की धारा 83 के तहत गुजरात राज्य वक्फ़ ट्रिब्यूनल में शुरू की गई कार्यवाही के लिए कोर्ट फीस के भुगतान से वक्फ़ संस्थाओं को कोई सामान्य छूट या माफ़ी नहीं मिलती है। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया कि धारा 83 के तहत कार्यवाही के लिए कोर्ट फीस नहीं देनी होगी, क्योंकि यह कार्यवाही "प्लेन्ट" या "सूट" के बजाय "एप्लीकेशन" के ज़रिए शुरू होती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्यवाही में वक्फ संपत्तियों से जुड़े अधिकारों का फैसला होता है, जिसमें मकान मालिक और किराएदार के बीच के विवाद भी शामिल हैं। साथ ही यह कार्यवाही सिविल सूट की तरह ही होती है, जिसमें लिखित बयान, मुद्दों का निर्धारण, सबूत और अंतिम फैसला शामिल होता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता गुजरात में ऐसी कार्यवाही के लिए कोर्ट फीस से छूट देने वाले किसी भी नोटिफिकेशन, सर्कुलर या कानूनी प्रावधान का ज़िक्र करने में नाकाम रहे। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के उस फैसले को भी सही ठहराया, जिसमें CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत कार्यवाही खारिज की गई थी, क्योंकि वादी कमियों को ठीक करने का मौका मिलने के बावजूद ज़रूरी कोर्ट फीस जमा करने में नाकाम रहे थे।
इसके बाद, 20 जनवरी 2026 को गुजरात हाईकोर्ट ने याचिकाओं का एक और बैच खारिज किया। इन याचिकाओं में ट्रिब्यूनल के उन आदेशों को चुनौती दी गई, जिनमें अपर्याप्त कोर्ट फीस के कारण सूट खारिज कर दिए गए। कोर्ट ने कहा कि दिसंबर 2025 के फैसले में बताई गई बातें इन याचिकाओं पर भी लागू होंगी और उन्हें खारिज कर दिया।
Case Details: AHMEDABAD SUNNI MUSLIM WAQF COMMITTEE Vs GUJARAT STATE WAQF TRIBUNAL|SLP(C) No. 18353/2026 Diary No. 24045 / 2026


