क्या सेशन कोर्ट जाए बिना सीधे हाई कोर्ट में अग्रिम ज़मानत के लिए अर्ज़ी दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा
Shahadat
9 Oct 2026 10:16 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर फ़ैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें गिरफ़्तारी से पहले ज़मानत (Pre-Arrest Bail) दी गई, जबकि याचिकाकर्ताओं ने पहले सेशन कोर्ट में अर्ज़ी नहीं दी थी। हालांकि, कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा को पक्का कर दिया, लेकिन उसने एक बड़ा सवाल उठाया कि क्या हाईकोर्ट को सीधे अग्रिम ज़मानत की अर्जियों पर विचार करना चाहिए, जबकि मामले की सुनवाई पहले सेशन कोर्ट में नहीं हुई हो।
यह मामला हाल ही में मोहम्मद रसाल सी बनाम केरल राज्य मामले में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपारेश कुमार सिंह की बेंच ने सुरक्षित रखा।
इससे पहले जब मामले की सुनवाई हुई तो कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा ऐसी अर्जियों पर सीधे विचार करने के तरीके को सही नहीं माना था।
जस्टिस नाथ और जस्टिस मेहता की बेंच ने अलग-अलग फ़ैसलों को देखते हुए मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेजा था।
इसमें कहा गया कि पार्टियों को सीधे हाई कोर्ट जाने के लिए बढ़ावा देने से "अराजक स्थिति" पैदा होगी क्योंकि हाई कोर्ट में ऐसी अर्जियों की बाढ़ आ जाएगी।
इसके अलावा, बेंच ने तर्क दिया कि सेशन कोर्ट एक फ़िल्टर प्रक्रिया के तौर पर काम करता है क्योंकि ज़्यादातर अग्रिम ज़मानत की अर्जियों का फ़ैसला उसी स्तर पर हो जाता है, जिससे हाईकोर्ट पर बोझ कम होता है। कोर्ट ने कहा कि यह सच है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 (CrPC की धारा 438) के तहत ट्रायल कोर्ट और सेशन कोर्ट के पास एक जैसी अधिकार-क्षेत्र (Concurrent Jurisdiction) है, लेकिन पदानुक्रम (Hierarchy) के अनुसार व्यक्ति को पहले सेशन कोर्ट में जाना चाहिए।
अदालत ने कहा,
"हमें यह भी लगता है कि अगर हाईकोर्ट में सीधे गिरफ़्तारी से पहले ज़मानत की अर्जियों पर विचार करने के तरीके को बढ़ावा दिया जाता है। संबंधित पार्टियों को पहले संबंधित सेशन कोर्ट में जाने के लिए नहीं कहा जाता है तो हाईकोर्ट में गिरफ़्तारी से पहले ज़मानत की अर्जियों की बाढ़ आ जाएगी, जिससे अराजक स्थिति पैदा होगी। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि अगर पार्टियों को गिरफ़्तारी से पहले ज़मानत का उपाय पाने के लिए संबंधित सेशन कोर्ट में जाना ज़रूरी हो तो इस बात की बहुत संभावना है कि बड़ी संख्या में अर्जियां उसी स्तर पर मंज़ूर हो जाएंगी, जिससे हाई कोर्ट तक मामला पहुंचने से पहले ही एक फ़िल्टर प्रक्रिया के तौर पर काम होगा।"
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड तक पहुंच और अधिकार-क्षेत्र की आसानी के लिहाज़ से सेशंस कोर्ट जाना ज़्यादा सुविधाजनक है और इससे मामलों का तेज़ी से निपटारा भी होता है। हालांकि, बेंच ने यह भी कहा कि असाधारण स्थितियों में हाई कोर्ट का रुख किया जा सकता है।
Case Title : MOHAMMED RASAL.C & ANR. VERSUS STATE OF KERALA & ANR.

