क्या किसी दूसरी पार्टी से दोबारा चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा देने वाले उम्मीदवार से चुनावी खर्च वसूला जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

  • क्या किसी दूसरी पार्टी से दोबारा चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा देने वाले उम्मीदवार से चुनावी खर्च वसूला जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका उस स्थिति से जुड़ी है, जहां कोई उम्मीदवार किसी एक राजनीतिक दल से चुनाव जीतने के बाद इस्तीफा दे देता है, ताकि वह दूसरी पार्टी से दोबारा चुनाव लड़ सके। ऐसे उम्मीदवार से चुनावी खर्च की वसूली के मुद्दे पर यह याचिका दायर की गई है।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग (ECI), तमिलनाडु के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), तमिलनाडु के उन विधायकों (जिन्होंने अपने पदों से इस्तीफा दिया और उपचुनाव में दोबारा चुनाव लड़ने की कोशिश की), और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा।

    याचिकाकर्ता एक वकील हैं। उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उनकी रिट याचिका खारिज की थी। याचिकाकर्ता ने ECI और तमिलनाडु के CEO से 'चुनाव खर्च सुरक्षा' (Election Expenditure Security) तंत्र बनाने की मांग की थी। साथ ही उन्होंने यह भी मांग की थी कि जो विधायक बिना किसी ठोस कारण के अपनी मर्जी से इस्तीफा देते हैं, उन्हें संसदीय या विधानसभा चुनावों से 5 साल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए।

    हाईकोर्ट में दायर रिट याचिका में दावा किया गया कि तमिलनाडु में 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद AIADMK के 6 निर्वाचित सदस्यों ने चुनाव परिणाम घोषित होने के कुछ ही समय बाद अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। इन सदस्यों में एस. जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी. सत्यभामा, डॉ. एसक्की सुब्बैया, सी. विजय भास्कर और एम.आर. विजयभास्कर शामिल थे। याचिका में कहा गया कि ये इस्तीफे पूरी तरह से उनकी अपनी मर्जी से दिए गए, इसके पीछे कोई मजबूरी नहीं थी। इन इस्तीफों के कारण संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में उपचुनाव कराने पड़े, जिसका खर्च सरकारी खजाने (जनता के पैसे) से उठाया गया।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी व्यक्ति की निजी या राजनीतिक पसंद के कारण कोई सीट खाली होती है, तो उसके लिए जनता को दो बार पैसे क्यों चुकाने पड़ें?

    याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तावित 'चुनाव खर्च सुरक्षा' तंत्र के तहत इस्तीफा देने वाले और उपचुनाव में दोबारा चुनाव लड़ने के इच्छुक विधायक को पहले से एक निश्चित राशि जमा करनी होगी (यह राशि उपचुनाव में होने वाले खर्च के बराबर होगी)। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि वह किसी कार्यकारी या विधायी विकल्प को न्यायिक आदेश में नहीं बदल सकता।

    अपनी मांगों को खारिज किए जाने से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने यह याचिका दायर की, जिसमें अन्य बातों के अलावा निम्नलिखित मुद्दे उठाए गए हैं:

    (i) क्या नामांकन के चरण में किसी ऐसे उम्मीदवार से मांगी जाने वाली सुरक्षा राशि (जो खुद इस्तीफा देकर उपचुनाव की स्थिति पैदा करता है)—जो चुनाव जीतने पर वापस मिल जाती है और हारने पर जब्त कर ली जाती है—'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 34 और 158 के तहत जमा की जाने वाली राशि जैसी ही एक नियामक शर्त है? और क्या यह संविधान के अनुच्छेद 191 के अर्थ में कोई 'अयोग्यता' नहीं है?

    (ii) क्या 'पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन' (जन विश्वास का सिद्धांत) जनता द्वारा दिए गए चुनावी जनादेश और उसे हासिल करने में खर्च किए गए सार्वजनिक धन पर भी लागू होता है?

    याचिका दायर करते समय याचिकाकर्ता ने कुछ अंतरिम राहतों की भी मांग की। उन्होंने मदुरांतकम और धारापुरम विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनावों में आगे की सभी कार्यवाही पर रोक लगाने की प्रार्थना की, जिसमें 6 अक्टूबर को होने वाला मतदान भी शामिल है। इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने इन उपचुनावों (जो 9 अक्टूबर को होने हैं) में वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा पर रोक लगाने की मांग की। साथ ही यह भी प्रार्थना की गई कि चुनाव परिणाम इस मामले के अंतिम फैसले के अधीन रखे जाएं।

    याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी संख्या 2 (ECI) और 3 (CEO, TN) को यह निर्देश देने की भी मांग की कि वे तिरुचिरापल्ली ईस्ट, करूर, विरलीमलई, पेरुंदुरई, अंबासमुद्रम, मदुरांतकम और धारापुरम विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनावों में हुए (या होने वाले) वास्तविक/अनुमानित खर्च का विवरण रिकॉर्ड पर रखें।

    Case Title : K SUTHAN Versus THE UNION OF INDIA AND ORS.

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