रूस ले जाए गए बच्चे को वापस लाएं, यह इस अदालत की गरिमा का सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा
Shahadat
3 Nov 2026 9:14 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कड़ा रुख अपनाया कि भारत उस बच्चे को वापस लाने में नाकाम रहा है, जिसे कथित तौर पर उसकी मां सुप्रीम कोर्ट की कस्टडी से नेपाल के रास्ते रूस ले गई थी। कोर्ट ने बच्चे को वापस अपनी कस्टडी में लाने के लिए अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और सभी एडिशनल सॉलिसिटर जनरलों से मदद मांगी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच को बताया गया कि रूसी संघ और भारत के बीच हुई हालिया बातचीत के बारे में एक 'नोट वर्बेल' (आधिकारिक पत्र) सीलबंद लिफाफे में दाखिल किया गया। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई बातचीत के अनुसार, रूस में मौजूद बच्चे और भारत में मौजूद पिता के बीच वीडियो कॉल कराई जा सकती है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चा सुरक्षित हाथों में है।
रिपोर्ट देखने के बाद जस्टिस दत्ता ने कहा कि वीडियो कॉल तो कराई जा सकती है, लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि रूसी महिला ने बच्चे को ले जाकर सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को चुनौती दी है।
उन्होंने कहा:
"यह एक बड़ा मामला है, इसलिए हम अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और सभी एडिशनल सॉलिसिटर जनरलों से मदद चाहेंगे। भारत के सुप्रीम कोर्ट की कस्टडी से एक बच्चे को रूस ले जाया गया। यह कोई मामूली मामला नहीं है। जब किसी को भारत के सुप्रीम कोर्ट की कस्टडी से ले जाया जाता है तो आपको अपनी पूरी ताकत लगानी चाहिए, बच्चे को वापस लाना चाहिए और उसे सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करना चाहिए। सिर्फ वीडियो कॉल से काम नहीं चलेगा।"
जस्टिस दत्ता ने आगे कहा:
"एक रूसी माँ और एक भारतीय पिता का एक बेटा है। माँ ने बेटे की कस्टडी के लिए अनुच्छेद 32 के तहत 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की थी। हमने यहां दिल्ली में माँ और बेटे की मुलाकात करवाई। दोनों का बर्ताव कैसा रहा, इस पर कुछ न कहना ही बेहतर है, लेकिन हमने बेटे को अपनी कस्टडी में ले लिया था। माँ, कथित तौर पर रूसी वाणिज्य दूतावास के अधिकारियों की मदद से नेपाल के रास्ते रूस से निकल गई। पिछले एक साल से हम बेटे को खोजने की कोशिश कर रहे हैं; उसका कोई पता नहीं चल पा रहा है। ताज़ा रिपोर्ट से हमें ऐसा लगता है कि रूसी फेडरेशन को पता है कि माँ और बच्चा कहां हैं।
हो सकता है कि बच्चा सुरक्षित हाथों में हो, लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि बच्चा हमारी कस्टडी में था। हमारी कस्टडी से, उसकी रिट याचिका के आधार पर उसे सौंपने के आदेश दिए गए। माँ, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना ही बच्चे को अपने साथ ले गई। हम इसे यहीं नहीं छोड़ेंगे। हमें बच्चा वापस चाहिए। बच्चे को कितनी जल्दी वापस लाया जा सकता है? भारत सरकार को सर्वोच्च स्तर पर यह सुनिश्चित करना चाहिए... यह हमारी संस्था से जुड़ा मामला है, हमारी गरिमा और हमारी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। हम चाहते तो पहले ही दिन याचिका खारिज कर सकते थे, लेकिन माँ को देखकर हमें उस पर तरस आ गया था। पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमारी इस नरमी का फायदा उठाएगी।"
इस मामले की सुनवाई एक महीने के लिए टाल दी गई।
अदालत ने आदेश दिया:
"रूस के विभाग और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के बीच हुए संवाद को सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने पेश किया गया है। हम चाहते हैं कि रूस और भारत, दोनों सरकारें पैरा 3 में बताए गए निर्देशों के अनुसार कदम उठाएं। इस रिट याचिका को महीने के अंत में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। ASG भाटी मौजूद नहीं हैं, लेकिन ASG वेंकटरमन ने अदालत की चिंता और बच्चे को जल्द-से-जल्द भारत वापस लाने की तत्काल आवश्यकता के बारे में बता दिया। चूंकि याचिकाकर्ता के कथित तौर पर नेपाल के रास्ते भारत से भाग जाने की बात सामने आई है। प्रथम दृष्टया हमें यकीन है कि अदालत की अनुमति के बिना याचिकाकर्ता का यह कदम न केवल न्याय प्रक्रिया में बाधा डालता है, बल्कि इसके अन्य गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। प्राप्त हुए संवाद को अदालत के रिकॉर्ड में एक सीलबंद लिफाफे में रखा जाए।"
यह एक जटिल मामला है, जिसमें इस अदालत के विभिन्न आदेशों के अनुसार, बच्चे की संयुक्त कस्टडी (Joint Custody) उसकी रूसी मां और भारतीय पिता के पास है। हालांकि, पिछले साल यह पता चला कि रूसी मां ने कथित तौर पर पिता की कस्टडी से बच्चे का अपहरण कर लिया और नेपाल के रास्ते रूस चली गई। यह तब हुआ, जब बच्चे का भारतीय पासपोर्ट पहले ही अदालत में जमा कराया जा चुका था।
अदालत ने बच्चे को वापस लाने के प्रयास करने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इसमें रूसी दूतावास के अधिकारियों और भारतीय अधिकारियों की मिलीभगत हो सकती है, क्योंकि संभवतः याचिकाकर्ता ने फर्जी या जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल करके देश छोड़ा है।
Case Title : VIKTORIIA BASU Versus THE STATE OF WEST BENGAL AND ORS.,

