BREAKING| भोजशाला को मंदिर घोषित करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपीलों पर सुनवाई के करेगा सुप्रीम कोर्ट, नमाज की इजाज़त देने से इनकार

Shahadat

14 July 2026 3:24 PM IST

  • BREAKING| भोजशाला को मंदिर घोषित करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपीलों पर सुनवाई के करेगा सुप्रीम कोर्ट, नमाज की इजाज़त देने से इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया जिनमें मध्य प्रदेश के धार में ऐतिहासिक भोजशाला-कमल मौला कॉम्प्लेक्स को देवी सरस्वती का मंदिर घोषित करने और वहां नमाज़ पढ़ने पर रोक लगाने वाले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई।

    हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ताओं की उस अंतरिम आदेश की मांग को ठुकरा दिया, जिसमें पुरानी स्थिति (status quo ante) बहाल करने को कहा गया। इस पुरानी व्यवस्था के तहत, मुसलमानों को तय दिनों पर हिंदू पूजा के साथ-साथ शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त थी।

    CJI ने टिप्पणी की,

    "हमें ऐसा कोई आदेश नहीं देना चाहिए जिससे तनाव पैदा हो।"

    हालांकि, बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह विवादित जगह के पास ही मुस्लिम पक्ष के लिए शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज़ पढ़ने के लिए एक अलग खुली जगह उपलब्ध कराए। बेंच ने साफ़ किया कि यह व्यवस्था अस्थायी (ad-hoc) है और मामले के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेगी, साथ ही इससे दोनों पक्षों के दावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

    इसके अलावा, मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी की दलील मानते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना स्मारक में कोई संरचनात्मक बदलाव न करे।

    बेंच ने संकेत दिया कि वह अंतिम सुनवाई के लिए इस मामले को तीन हफ़्ते बाद सूचीबद्ध करेगी।

    कोर्टरूम में बातचीत

    जैसे ही मामला सुनवाई के लिए आया, CJI सूर्य कांत ने याचिकाओं पर नोटिस जारी करने और उन्हें अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या तथ्यों से जुड़े विवादों को रिट याचिका के ज़रिए सुलझाया जा सकता था। उन्होंने तर्क दिया कि लगभग 800 साल से चली आ रही स्थिति को बदल दिया गया। मामले के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने की CJI की इच्छा का स्वागत करते हुए अहमदी ने कहा कि 2003 से चली आ रही पुरानी व्यवस्था - जिसके तहत तय दिनों पर उस जगह पर हिंदू और मुस्लिम पूजा जारी रख सकते थे - को इस बीच जारी रहने दिया जाना चाहिए।

    अहमदी ने कहा,

    "अब हमें पूरी तरह से बाहर कर दिया गया।"

    मुस्लिम याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि उस जगह पर कम से कम 700 सालों से नमाज़ पढ़ी जा रही है। उन्होंने कहा कि यह जगह "साम्प्रदायिक सद्भाव का बेहतरीन उदाहरण" है क्योंकि यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों को पूजा-इबादत करने की इजाज़त थी। सिंघवी ने धार्मिक स्थलों से जुड़े पुराने विवादों को फिर से खोलने पर चिंता जताई।

    सिंघवी ने कहा,

    "भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं... जो चीज़ सालों से चली आ रही है, उसे जारी रहने देना चाहिए।"

    मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद के दो महीनों में कई घटनाक्रम हुए हैं। उन्होंने पुरानी स्थिति (status quo ante) बहाल करने पर आपत्ति जताई।

    SG ने कहा,

    "अगर आप दो महीने बाद आकर पुरानी स्थिति बहाल करने की मांग करते हैं तो प्रशासनिक दिक्कतें पैदा होंगी।"

    अहमदी ने कहा कि हाई कोर्ट के फ़ैसले के तुरंत बाद ही याचिका दायर कर दी गई। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता के नाते हाई कोर्ट को फ़ैसले के अमल पर रोक लगा देनी चाहिए थी, ताकि पक्षों को सुप्रीम कोर्ट जाने का मौका मिल सके।

    मुस्लिम याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि 1995 से ही दोनों पक्षों के बीच इस प्रॉपर्टी को मिली-जुली धार्मिक जगह के तौर पर इस्तेमाल करने का समझौता था, और 2003 के ASI आदेश में दोनों पक्षों को तय तारीखों पर अपनी-अपनी रस्में निभाने की इजाज़त दी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि मालिकाना हक के विवाद पर रिट याचिका कैसे स्वीकार की जा सकती है। उन्होंने पूछा कि जब समुदायों के बीच आपसी समझ है तो लगभग बीस साल बाद दायर रिट याचिका में उस संतुलन को बिगाड़ने की क्या ज़रूरत है।

    अरोड़ा ने कहा,

    "अगर पीढ़ियों से वहाँ 12वीं सदी की एक मस्जिद है और कम-से-कम 800 सालों से वहां पूजा-इबादत हो रही है तो उसे क्यों छेड़ा जाए? 800 साल बाद किसी एक समुदाय की पूजा-इबादत रोकना बहुत कठोर कदम होगा।"

    हालांकि, CJI ने कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया।

    CJI ने कहा,

    "हमें ऐसा कोई आदेश नहीं देना चाहिए जिससे तनाव पैदा हो।"

    CJI ने अपील की कि "दोनों पक्षों को धैर्य रखना चाहिए" और भरोसा दिलाया कि मामले की अंतिम सुनवाई के लिए जल्द ही एक बेंच तय की जाएगी। SG ने भी CJI के नज़रिए का स्वागत किया और कहा कि प्रशासन की कोशिशों से अभी हालात शांत हैं।

    हिंदू पक्षों की ओर से सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्णकुमार ने कहा कि हाई कोर्ट के मामलों पर फ़ाइनल फ़ैसला सुनाने के बाद अब 'स्टेटस को एंटे' (पहले जैसी स्थिति) की मांग नहीं की जा सकती। जब अरोड़ा ने कहा कि उनकी याचिका तुरंत दायर की गई तो कृष्णकुमार ने जवाब दिया कि किसी अर्जेंट सुनवाई की मांग नहीं की गई थी। CJI ने भी कहा कि किसी ने भी इस मामले को अर्जेंट लिस्टिंग के लिए नहीं उठाया।

    अहमदी ने बेंच को अंतरिम आदेश के लिए मनाने की आखिरी कोशिश में कहा कि हाईकोर्ट के फ़ैसले में भी यह माना गया था कि सदियों से इसका इस्तेमाल मस्जिद के तौर पर होता रहा है और सुविधा का संतुलन 'स्टेटस को एंटे' (पहले जैसी स्थिति) के पक्ष में है।

    CJI ने कहा कि पिछली अंतरिम व्यवस्था तब लागू थी जब साइट का स्वरूप विचाराधीन (sub judice) था। लेकिन अब, इसके स्वरूप पर न्यायिक फ़ैसला हो चुका है, चाहे वह सही हो या गलत, CJI ने बताया।

    इसके बाद CJI ने राज्य से हाईकोर्ट के उस निर्देश के बारे में पूछा, जिसमें कहा गया कि अगर मुस्लिम पक्ष मांग करे तो उन्हें पूजा के लिए कोई दूसरी जगह देने पर विचार किया जाए।

    SG ने जवाब दिया,

    "सरकार इसके लिए तैयार है।"

    हालांकि, अहमदी ने कहा कि मुस्लिम पक्ष के लिए इस जगह का खास धार्मिक महत्व है और पास में कोई दूसरी जगह देना शायद काफ़ी राहत न हो।

    उन्होंने पूछा,

    "हमें धकेलकर बाहर कर दिया गया, और हमें एक 'फ़ेट अकॉम्पली' (पहले से तय स्थिति) के सामने खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। क्या यह उचित है कि एक समुदाय को, जो कई सालों से वहाँ है, बाहर निकाल दिया जाए?"

    सिंघवी ने बताया कि हाई कोर्ट के फ़ैसले के अगले दिन, यानी शनिवार को ASI ने एक सर्कुलर जारी करके उस जगह को हिंदुओं की विशेष पूजा के लिए दे दिया।

    CJI ने कहा कि पक्षों को जल्द से जल्द सुप्रीम कोर्ट आने के मामले में सतर्क रहना चाहिए था।

    CJI ने कहा,

    "कुछ मामलों में एक दिन की देरी के भी गंभीर नतीजे हो सकते हैं।"

    जस्टिस बागची ने बताया कि हाईकोर्ट के मुख्य निर्देशों पर अमल किया जा चुका है और यह तर्क कि उन्हें "बहुत जल्दबाजी" में लागू किया गया, 'स्टेटस को एंटे' का आदेश देने का आधार नहीं हो सकता।

    सिंघवी ने बताया कि कोई मूर्ति स्थापित नहीं की गई, और पूजा कार्डबोर्ड की तस्वीर के आधार पर की जाती है। अरोड़ा ने बताया कि 12वीं सदी में धार में भूकंप आने के ऐतिहासिक सबूत हैं, जिसकी वजह से सब कुछ नष्ट हो गया था, और उसके बाद मस्जिद बनाई गई।

    बेंच ने हाईकोर्ट के उस निर्देश को लागू करने पर भी चिंता जताई, जिसमें कहा गया कि सरकार को लंदन म्यूज़ियम से देवी सरस्वती की मूर्ति वापस लाने पर विचार करना चाहिए।

    Cases: QUAZI MOINUDDIN Versus HINDU FRONT FOR JUSTICE (REGD. TRUST NO. 976) AND ORS., Diary No. 32281-2026; MAULANA KAMALUDDIN WELFARE SOCIETY Versus HINDU FRONT FOR JUSTICE (REGD. TRUST NO. 976) AND ORS., SLP(C) No. 22119-22120/2026; JEBRAN ANSARI AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ORS., Diary No. 33643-2026; HAJI MUNEER AHMAD AND ANR. Versus STATE OF MADHYA PRADESH AND ORS., SLP(C) No. 23490/2026

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