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ब्रेक‌िंगः SC कॉलेजियम ने दिल्ली HC से जस्टिस मुरलीधर और बॉम्बे HC से जस्टिस रंजीत मोरे के ट्रांसफर की सिफारिश की

LiveLaw News Network
19 Feb 2020 6:22 AM GMT
ब्रेक‌िंगः SC कॉलेजियम ने दिल्ली HC से जस्टिस मुरलीधर और बॉम्बे HC से जस्टिस रंजीत मोरे के ट्रांसफर की सिफारिश की

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मुरलीधर को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की सिफारिश की है।

कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस रंजीत मोरे को मेघालय हाईकोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के जज जस्टिस रवि विजयकुमार मलीमठ को उत्तराखंड हाईकोर्ट ट्रांसफर करने की भी सिफारिश की है।

न्यायमूर्ति मुरलीधर वर्तमान में दिल्ली उच्च न्यायालय के तीसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं, जबकि जस्टिस मोरे दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति धर्माधिकारी के इस्तीफे के बाद बॉम्बे उच्च न्यायालय के तीसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं।

जस्टिस मोरे को 8 सितंबर, 2006 को बॉम्बे उच्च न्यायालय के एक अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था।

वहीं दिल्ली उच्च न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार, न्यायमूर्ति मुरलीधर ने वर्ष 1984 में चेन्नई में वकालत शुरू की थी। तीन साल बाद, 1987 में, वह सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली उच्च न्यायालय आ गए। वह सुप्रीम कोर्ट कानूनी सेवा समिति के वकील के रूप में सक्रिय थे और बाद में दो कार्यकालों के लिए इसके सदस्य भी रहे।

उन्हें जनहित के कई मामलों में और दोषियों को मृत्युदंड देने वाले मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया था।

उनके निशुल्क कार्य में भोपाल गैस आपदा के पीड़ितों और नर्मदा पर बांधों से विस्थापित लोगों के मामले शामिल थे। उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और भारत के चुनाव आयोग के लिए भी परामर्श दिया और विधि आयोग के अंशकालिक सदस्य रहे।

मई 2006 में, उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्ष 2003 में, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी से सम्मानित किया गया।

दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, न्यायमूर्ति मुरलीधर ने न्यायाधीशों को "लॉर्डशिप" के रूप में संबोधित करने से छुटकारा पाया।

वह कई महत्वपूर्ण बेंचों में रहे हैं, जिसमें 2010 की पूर्ण पीठ भी शामिल है जिसने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा

अपनी संपत्ति को आरटीआई में घोषित करने के पक्ष में फैसला सुनाया।

वह हाईकोर्ट की उस पीठ का एक हिस्सा था जिसने 2009 में नाज फाउंडेशन मामले में समलैंगिकता को वैध बनाया था।

उन्होंने उस पीठ का भी नेतृत्व किया जिसने हाशिमपुरा नरसंहार मामले में उत्तर प्रदेश प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC) के सदस्यों और 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को दोषी ठहराया था।

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