BCI को अपने केस के बारे में मीडिया से बात करने वाले वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए: जस्टिस अभय ओक

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    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से उन वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा, जो चल रहे केस में अपनी दलीलों के बारे में मीडिया से बात करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करना खुद का प्रचार करने जैसा हो सकता है और यह BCI के नियमों के तहत विज्ञापन और काम मांगने पर लगी रोक के दायरे में आ सकता है।

    'सेंटर फॉर डिस्कोर्स ऑन क्रिमिनल एंड कॉन्स्टिट्यूशनल ज्यूरिस्प्रूडेंस' द्वारा आयोजित "आपराधिक मुकदमों में नैतिकता, मीडिया द्वारा ट्रायल और बयानों की स्वीकार्यता पर चर्चा" कार्यक्रम में बोलते हुए, जस्टिस ओका ने सवाल किया कि संवेदनशील सुनवाई के बाद वकील मीडिया के पास क्यों जाते हैं और कोर्ट में दी गई दलीलों पर चर्चा क्यों करते हैं।

    उन्होंने पूछा,

    "क्या चल रहे केस में दी गई दलीलों के बारे में मीडिया से बात करना वाकई सही है?"

    जस्टिस ओक ने कहा कि उन्होंने वकीलों को दिन के आखिर में पॉडकास्ट करते हुए भी देखा, जिसमें वे कोर्ट में दी गई दलीलों और जजों द्वारा पूछे गए सवालों पर चर्चा करते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ वकील तो यहां तक ​​कह देते हैं कि जजों द्वारा पूछे गए सवालों से संकेत मिलता है कि उनके क्लाइंट के जीतने की संभावना है।

    उन्होंने कहा,

    "वकीलों का कर्तव्य है कि वे अपनी पूरी क्षमता से बहस करें और कोर्ट के अधिकारियों के तौर पर कोर्ट की मदद करें।"

    BCI के नियम 5 का जिक्र करते हुए, जो वकीलों द्वारा विज्ञापन और काम मांगने पर रोक लगाता है, जस्टिस ओक ने कहा कि नियम के अनुसार कोई वकील काम नहीं मांग सकता या किसी भी तरह से विज्ञापन नहीं कर सकता। साथ ही यह नियम इंटरव्यू के जरिए प्रचार करने, अखबारों में कमेंट्स देने या उन्हें प्रेरित करने और केस से जुड़ी तस्वीरें छपवाने पर भी रोक लगाता है।

    उन्होंने कहा कि यह प्रावधान तब लागू हो सकता है, जब चल रहे केस में पेश होने वाला कोई वकील मीडिया को इंटरव्यू दे, अपनी तस्वीर छपवाने की कोशिश करे या केस के बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा करे।

    उन्होंने कहा,

    "जब चल रहे केस में कोई वकील मीडिया को इंटरव्यू देता है और चाहता है कि उसकी तस्वीर मीडिया में छपे - चाहे प्रिंट मीडिया में न हो, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हो - तो मेरा मानना ​​है कि यह नियम लागू होगा। आप काम मांग रहे हैं, आप अपनी स्किल्स का विज्ञापन कर रहे हैं।"

    उन्होंने कहा कि अब बार काउंसिल के लिए कार्रवाई करने का समय आ गया। साथ ही हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा कि यह विश्वास करना मुश्किल है कि BCI ऐसा कोई कदम उठाएगी।

    जस्टिस ओक ने कहा,

    "लेकिन उनके पास ही कानूनी अधिकार है और उनसे कार्रवाई की उम्मीद की जाती है।"

    जस्टिस ओक ने ये बातें मीडिया ट्रायल और चल रही अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग के बड़े मुद्दे पर चर्चा के दौरान कहीं।

    उन्होंने कहा कि वे खुली अदालती सुनवाई में पक्का यकीन रखते हैं और मानते हैं कि मीडिया और नागरिकों को यह जानने का हक है कि अदालतों में क्या हो रहा है। उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग का भी समर्थन किया।

    हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि लाइव-स्ट्रीमिंग वाली कार्यवाही पर मीडिया की चर्चा गलत धारणा बना सकती है, खासकर तब जब अदालती सवालों को जजों की अंतिम राय मान लिया जाए।

    जस्टिस ओक ने बताया कि जज वकीलों से स्पष्टीकरण मांगने, किसी खास दलील को परखने या शुरुआती राय (prima facie view) बताने के लिए सवाल पूछ सकते हैं, ताकि वकील उस पर बेहतर ढंग से अपनी बात रख सकें। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि शुरुआती राय ज़रूरी नहीं कि अदालत की अंतिम राय ही हो।

    उन्होंने ऐसे मामलों का ज़िक्र किया जहां जजों ने बहस के दौरान शुरुआती राय तो ज़ाहिर की, लेकिन आखिर में उसके उलट फैसला सुनाया।

    जस्टिस ओक ने मीडिया के खिलाफ अदालतों द्वारा 'गैग ऑर्डर' (रिपोर्टिंग पर रोक लगाने वाले आदेश) जारी करने का भी विरोध किया। विकिमीडिया फाउंडेशन बनाम एएनआई मीडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अदालतें मीडिया को यह नहीं बता सकतीं कि क्या रिपोर्ट करना है या किसी रिपोर्ट के कुछ हिस्सों को हटाने का निर्देश नहीं दे सकतीं।

    उन्होंने 'खुले न्याय' (Open Justice) के सिद्धांत का ज़िक्र किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालतें जनता की नज़र, बहस और आलोचना के लिए खुली रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालतों की रचनात्मक आलोचना का स्वागत किया जाना चाहिए।

    जस्टिस ओक ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अदालत की अवमानना ​​(Contempt) करता है तो अदालत 'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट' के तहत कार्रवाई कर सकती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यह मीडिया को किसी चीज़ की रिपोर्ट न करने या किसी खास तरीके से रिपोर्ट करने का निर्देश देने से बिल्कुल अलग बात है।

    उन्होंने कहा,

    "मीडिया पर रोक लगाने वाले आदेश (गैग ऑर्डर) जारी करना कोई समाधान नहीं है। इससे समस्या और बढ़ जाएगी।"

    उन्होंने कहा कि ऐसे आदेश संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि गैग ऑर्डर का मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि अदालत कुछ छिपाना चाहती है।

    जस्टिस ओक ने लंबित आपराधिक मामलों के दौरान जनमत बनाने में अन्य पक्षों की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने जांच के दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस करने और गवाहों के बयान, आरोपियों की पहचान और जांच किस तरह आगे बढ़ रही है, जैसी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए जांच अधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की आलोचना की।

    उन्होंने कहा कि ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने से जांच की दिशा का पता चल सकता है और इससे जांच प्रभावित हो सकती है। साथ ही सबूतों को नष्ट या उनमें हेरफेर भी किया जा सकता है।

    उन्होंने पुलिस अधिकारियों को मीडिया को यह बताने से भी आगाह किया कि हिरासत में आरोपी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। उन्होंने कहा कि मीडिया को जनता को यह समझाना चाहिए कि आम तौर पर ऐसे कबूलनामे को आरोपी के खिलाफ साबित नहीं किया जा सकता और इसे सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता।

    जस्टिस ओक ने जांच के दौरान राजनेताओं के उन बयानों की भी आलोचना की, जिनमें कहा जाता है कि आरोपी को फांसी दी जाएगी या सजा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि आरोपी दोषी है या नहीं और उसे क्या सजा दी जाएगी, यह अदालत का काम है; सजा तय करना पूरी तरह से अदालत का अधिकार क्षेत्र है।

    उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया जिनमें सरकारी वकील (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) ट्रायल शुरू होने से पहले मीडिया से बात करते हैं और बताते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री या गृह मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से इस मामले में पेश होने के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि ऐसे बयानों से न्याय प्रणाली के बारे में गलत संदेश जा सकता है।

    मीडिया ट्रायल पर जस्टिस ओक ने कहा कि हो सकता है कि असल मायने में "मीडिया ट्रायल" न हो, लेकिन पुलिस अधिकारी, राजनेता, सरकारी वकील और वकील मीडिया को जानकारी दे सकते हैं, जिससे जनमत प्रभावित होता है।

    उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि निष्पक्ष और सटीक मीडिया रिपोर्टिंग का स्वागत है। इस समय सभी पक्षों को संयम बरतने की जरूरत है।

    उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा,

    "असली समाधान सभी पक्षों को जागरूक करना और संयम बरतना है।"

    इस कार्यक्रम का वीडियो यहां देखा जा सकता है।

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