'बैंक बहुत कम कीमत पर ARC को लोन बेचते हैं': सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों, उधार लेने वालों और एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARC) के बीच मिलीभगत पर चिंता जताई
Shahadat
19 Jun 2026 7:07 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि किस तरह पब्लिक सेक्टर के बैंकों के लोन एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARC) को सौंपे जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि ARC के कामकाज और उस बड़े सिस्टम की जांच करने की ज़रूरत है, जिसके ज़रिए बड़े लोन का निपटारा उनकी असल कीमत के बहुत छोटे हिस्से पर कर दिया जाता है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम (बैंकों के समूह) द्वारा एक कंपनी को दिए गए लोन के निपटारे में गड़बड़ी का आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार से एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश देने की मांग की, जिसमें RBI, SEBI, SFIO, ED और CBI के अधिकारी शामिल हों, ताकि ARC द्वारा किए गए कथित कॉर्पोरेट और बैंकिंग फ्रॉड की जांच हो सके।
CJI कांत ने कहा,
"सच कहूं तो, इन ARC के कामकाज और गतिविधियों की जांच करने की बहुत ज़रूरत है। ARC बनाने के फैसले पर शायद फिर से विचार करने की ज़रूरत है, खासकर जनता के पैसे के मामले में। हमें सिर्फ़ जनता के पैसे की चिंता है। अगर वे प्राइवेट लेंडर (निजी ऋणदाता) हैं तो हम उन लेन-देन में नहीं पड़ना चाहते। लेकिन जहां टैक्सपेयर्स का पैसा, जनता का पैसा - जो लोगों की भलाई के लिए खर्च होना चाहिए था - अगर वह प्राइवेट हाथों में चला गया, उसका गलत इस्तेमाल हुआ, उसे हड़प लिया गया और आखिर में फायदा उन्हीं का हुआ तो हमें इसी बात की चिंता है। ARC भी बैंकों के साथ मिलीभगत करके काम करते हैं। उधार लेने वालों ARC और बैंकों के बीच बहुत गहरी मिलीभगत है।"
चीफ जस्टिस ने कहा कि बैंक एक "बहुत चालाकी भरा तरीका" अपना रहे हैं, जिसमें वे लोन की देनदारियों को ARC को भारी छूट पर बेच देते हैं और उधार लेने वालों को बकाया रकम का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा चुकाकर मामला निपटाने की इजाज़त दे देते हैं।
CJI ने कहा,
"यह इन बैंकों द्वारा ARC को लोन की देनदारियां बहुत कम कीमत पर बेचने का सबसे चालाकी भरा तरीका है। आप सिर्फ़ 10%, 15% लेते हैं और फिर उन्हें सेटलमेंट करने देते हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि एसेट्स क्या हैं। आखिर में ARC वाले भी इससे पैसा कमाते हैं। लेकिन असली फायदा उधार लेने वाले को होता है, जो आखिर में 15%, 20% चुकाकर इससे निकल जाता है, बस इतना ही।"
कोर्ट ने आगे कहा कि हालांकि वह बैंकों के कमर्शियल फैसलों (व्यावसायिक समझ) की जांच करने में अपनी सीमाओं को जानता है, लेकिन वह जनता के पैसे से जुड़े आरोपों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
CJI ने कहा,
"हम बैंकों के कमर्शियल फैसलों की जांच करने में अपनी सीमाओं को जानते हैं, लेकिन अगर कमर्शियल समझ का मतलब यह है कि आप टैक्सपेयर्स का पैसा, जनता का पैसा इकट्ठा करते हैं और उसे लापरवाही से लोन के तौर पर दे देते हैं। फिर उसे वसूलने की कोई कोशिश नहीं करते, या जो सिक्योरिटी आप लेते हैं उसकी कीमत बहुत कम होती है। आखिर में आप कहते हैं कि वसूलने के लिए कुछ नहीं बचा है तो इस तरह का व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।"
कोर्ट ने यह भी देखा कि "उधार लेने वालों, ARC और बैंकर के बीच गहरी मिलीभगत" लगती है और ARC के कामकाज और गतिविधियों की जांच करने की बहुत ज़रूरत है। कोर्ट ने कहा कि ARC को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे से जुड़े मुद्दों पर फिर से विचार करने की ज़रूरत हो सकती है, खासकर तब जब जनता का पैसा शामिल हो।
एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे के ज़रिए दायर याचिका में JKM इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड से जुड़े कथित बड़े बैंकिंग फ्रॉड की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED), सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) जैसी एजेंसियों से कराने की मांग की गई।
याचिका के अनुसार, नोएडा स्थित इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी JKM इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व वाले सात बैंकों के समूह से लोन लिया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि कुल 1,537 करोड़ रुपये से ज़्यादा के लोन को आखिर में ARC ट्रांज़ैक्शन के ज़रिए 73.50 करोड़ रुपये में सेटल कर दिया गया, जिससे जनता के पैसे का 95% से ज़्यादा नुकसान हुआ।
यह याचिका 2018 में अर्न्स्ट एंड यंग द्वारा किए गए फोरेंसिक ऑडिट पर आधारित है, जिसमें कथित तौर पर शेल कंपनियों, बंद हो चुकी कंपनियों, फ़र्ज़ी इनवॉइस और बिना बताए गए बैंक खातों के ज़रिए 902 करोड़ रुपये से ज़्यादा के पैसे को दूसरी जगह भेजने (डायवर्ज़न) का पता चला था।
याचिकाकर्ता के वकील एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि JKM का मामला तो "बर्फ़ के पहाड़ का सिरा" (समस्या का छोटा सा हिस्सा) भर है और आरोप लगाया कि बैंकों, ARC और उधार लेने वालों के बीच एक बड़ी मिलीभगत है। उन्होंने दावा किया कि कंपनियां लोन लेती हैं, बाद में दिवालिया हो जाती हैं और फिर ARC मैकेनिज़्म के ज़रिए बहुत कम कीमत पर सेटलमेंट कर लेती हैं।
एक प्रतिवादी की ओर से कैविएट पर पेश हुईं सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने याचिका का विरोध किया और तर्क दिया कि यह मामला उनके क्लाइंट और उनके भाई के बीच हुए विवाद से जुड़ा है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अलग-अलग मंचों पर पहले ही कई कार्यवाही की जा चुकी हैं, जिनमें आपराधिक कार्यवाही, रिट याचिकाएं और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के समक्ष कार्यवाही शामिल हैं।
जब कोर्ट ने बकाया लोन और असाइनमेंट प्रक्रिया के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि असाइनमेंट बैंक और ARC के बीच का लेन-देन था, और इसमें कर्ज लेने वाली कंपनी JKM इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई भूमिका नहीं थी।
CJI ने स्पष्ट किया कि कोर्ट का सरोकार पारिवारिक विवाद से नहीं, बल्कि जनता के पैसे से जुड़े आरोपों से है।
उन्होंने कहा,
"मैडम, हमारी एकमात्र चिंता यह है कि पारिवारिक विवाद तो है ही। यह व्यक्तिगत रंजिश का मामला हो सकता है। हो सकता है कि एक भाई दूसरे को परेशान करने के लिए याचिकाएं दायर कर रहा हो और दूसरा भी वैसा ही कर रहा हो। यह सिलसिला चलता रहता है। हमें उससे कोई लेना-देना नहीं है। हमारी एकमात्र चिंता 1537 करोड़ रुपये के लोन की है। आप एक हलफनामा (affidavit) दाखिल करें।"
CJI कांत ने टिप्पणी की कि हो सकता है कि यह कानूनी लड़ाई परिवार के सदस्यों के बीच विवाद के कारण शुरू हुई हो। फिर भी उन्होंने कहा कि अगर जनता के पैसे से जुड़े धोखाधड़ी का मामला कोर्ट के संज्ञान में लाया गया तो कोर्ट इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा,
"साफ-साफ कहें तो हमें भी कुछ शक है कि इन याचिकाकर्ताओं को आपके भाई ने ही खड़ा किया है। हम इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकते। लेकिन अगर धोखाधड़ी का मामला कोर्ट के संज्ञान में आया है और हम आंखें मूंद लेते हैं, तो यह सिलसिला जारी रहेगा।"
दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने विवाद से जुड़े निजी पक्षों को नोटिस जारी किया और जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिका में आरोप लगाया गया कि JKM इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने 2012 और 2015 के बीच SBI के नेतृत्व वाले सात बैंकों के कंसोर्टियम से लोन लिया था। इसमें दावा किया गया है कि 23 मई 2018 को सौंपी गई अर्न्स्ट एंड यंग (Ernst & Young) की फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में शेल कंपनियों, बंद हो चुकी कंपनियों (struck-off companies), अस्तित्वहीन वेंडरों और अन्य संदिग्ध संस्थाओं (red-flagged entities) के माध्यम से 902 करोड़ रुपये से अधिक की राशि को दूसरी जगह भेजने (diversion) का पता चला था।
याचिका में आरोप लगाया गया कि इन निष्कर्षों के बावजूद, खाते को धोखाधड़ी वाला खाता (fraud account) घोषित नहीं किया गया और बाद में लोन को प्रूडेंट ARC (Prudent ARC) को सौंप दिया गया। याचिका के अनुसार, SBI ने लगभग 480 करोड़ रुपये के बकाया कर्ज़ के बदले 2020 में यह कर्ज़ Prudent ARC को सौंप दिया। याचिका में यह भी कहा गया कि सितंबर 2025 में, Prudent ARC ने लगभग 1,537 करोड़ रुपये का कर्ज़ पोर्टफोलियो Phoenix ARC को सौंप दिया और Phoenix ARC ने 31 अक्टूबर 2025 को 73.50 करोड़ रुपये का सेटलमेंट किया।
याचिका में Economic Offences Wing, नई दिल्ली और गौतम बुद्ध नगर में दर्ज FIR का भी ज़िक्र है। इसमें आरोप लगाया गया कि ED, RBI और Ministry of Corporate Affairs से शिकायतें और अपील करने के बावजूद, कोई ठोस या समन्वित कार्रवाई नहीं की गई।
Case Title – Prateeksha & Ors. v. Union of India & Ors.

