'कम से कम 18 प्रतिशत भारतीय पीड़ित': ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में याचिका

LiveLaw News Network

31 July 2021 8:00 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट

    ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी की बेहतर जांच सुनिश्चित करने और ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक विशेष जांच एजेंसी बनाने के लिए सरकार को वैधानिक नीति तैयार करने का निर्देश देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका दायर की गई है, जिसमें ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए उपाय खोजने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

    याचिका में इस संबंध में केंद्र, भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य बैंकों को भी उचित निर्देश देने की मांग की गई है।

    याचिका दो याचिकाकर्ताओं, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के निवासियों द्वारा दायर की गई है जो ऑनलाइन धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि शिकायत करने के बाद भी दिल्ली पुलिस, राजस्थान पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।

    इस बात पर प्रकाश डालते हुए कि अभी तक भारत सरकार द्वारा ऑनलाइन धोखाधड़ी पर अंकुश लगाने के लिए कोई प्रभावी कानून या एजेंसी नहीं बनाई गई है, याचिका में शीर्ष न्यायालय से दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए आर्टिकल 142 की शक्ति का उपयोग करने का आग्रह किया गया है क्योंकि देश के आम लोग ऑनलाइन ठगी की समस्या से बहुत अधिक परेशान हैं।

    यह याचिका अधिवक्ता अभिज्ञ कुशवाह ने दायर की है और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा तैयार की गई है। याचिका में सभी राज्यों की पुलिस से अधिकारी शामिल करके एक राष्ट्रीय स्तर की समन्वय एजेंसी का गठन करने के लिए निर्देश देने की भी मांग की गई है।

    इसके अलावा, प्रत्येक जिले में 24 घंटे हेल्पलाइन और कार्यालय खोलने के साथ-साथ जहां से अपराध किया जाता है,उस खाते और खाताधारक का पता लगाने के लिए आरबीआई द्वारा एक एजेंसी बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।

    याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया है कि वह बैंकों को ग्राहक सेवा केंद्र में ग्राहकों के मोबाइल फोन पर एक ओटीपी सेवा शुरू करने का निर्देश दें और ओएलएक्स को निर्देश दें कि वे उनके प्लेटफॉर्म का उपयोग करके लेनदेन करने के लिए पंजीकरण करने वाले हर व्यक्ति की आईडी सत्यापित करें। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ई-कॉमर्स पोर्टल ओएलएक्स में विज्ञापित सेकेंड हैंड मोबाइल फोन के लिए ऑनलाइन भुगतान करने के बाद उन्हें ठगा गया है।

    यह आरोप लगाते हुए कि संबंधित पुलिस स्टेशनों ने याचिकाकर्ताओं की प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया, याचिका में कहा गया है कि संज्ञेय अपराधों के मामलों में, पुलिस के लिए प्राथमिकी के रूप में शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है। इसके अलावा, यदि कोई घटना किसी विशेष पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती है, तो पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह एक शून्य संख्या की प्राथमिकी दर्ज करे और उसे संबंधित पुलिस थाने में जांच के लिए स्थानांतरित कर दे।

    'समस्या की व्यापकता' को उजागर करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया है कि इस समस्या को साहित्य और फिल्मों में भी दिखाया गया है, जिसमें हालिया फिल्में 'जामताड़ा' और 'अभिमन्यु की वापसी' शामिल हैं।

    अपने मामले के समर्थन में, याचिकाकर्ताओं ने वित्तीय सेवा प्रौद्योगिकी प्रदाता, एफआईएस द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण का हवाला भी दिया है,जिसे बिजनेस इनसाइडर इंडिया द्वारा रिपोर्ट किया गया है। इस सर्वे में दिखाया गया है कि पिछले एक साल में 18 प्रतिशत भारतीय ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं।

    पूर्व केंद्रीय आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद के एक उद्धरण का हवाला देते हुए कहा गया है कि ऑनलाइन धोखाधड़ी के माध्यम से लगभग 1.8 बिलियन रुपये का नुकसान हुआ है।

    याचिका में कहा गया है, ''...समस्या के पैमाने को देखते हुए, नियामक द्वारा प्रभावी दिशा-निर्देश और तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ग्राहकों के साथ ठगी न हो पाए।''

    केस का शीर्षकः हरिराम मोरया व अन्य बनाम भारतीय रिजर्व बैंक व अन्य

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