लोधी-काल के स्मारक बने गौशाला और कूड़ा फेंकने की जगह: सुप्रीम कोर्ट ने ASI को लगाई फटकार, कहा- एजेंसी ने अपनी साख खोई
Shahadat
8 Oct 2026 11:33 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (7 अक्टूबर) को दिल्ली में हेरिटेज साइट्स (धरोहर स्थलों) के संरक्षण में गंभीर कमियां पाए जाने के बाद दिल्ली नगर निगम (MCD) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकारियों के खिलाफ कड़े आदेश जारी किए।
कोर्ट यह देखकर हैरान रह गया कि लोधी-काल के एक स्मारक का इस्तेमाल अब गौशाला के तौर पर किया जा रहा था, और 13वीं सदी की एक इमारत पर निजी कब्ज़ा हो गया।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने ASI के महानिदेशक (जो कोर्ट के पिछले आदेश के बाद वहां मौजूद थे) से कहा कि ASI की साफ लापरवाही के कारण कोई भी हेरिटेज साइट देखने लायक नहीं बची है। बेंच ने यह भी कहा कि MCD अब दिल्ली में किसी भी हेरिटेज साइट का रखरखाव करने में सक्षम नहीं है।
बता दें, यह मामला दिल्ली में हेरिटेज साइट्स के संरक्षण से जुड़ा है। कोर्ट ने शुरू में लोधी-काल के शेख अली 'गुमटी' के संरक्षण का आदेश दिया और बाद में इस मामले के लिए सीनियर एडवोकेट और कोर्ट कमिश्नर गोपाल शंकरनारायणन की मदद से कार्यवाही का दायरा बढ़ाकर ऐसे सभी स्मारकों को इसमें शामिल कर लिया।
इससे पहले, कोर्ट कमिश्नर ने कोर्ट का ध्यान 'हिंदुस्तान टाइम्स' और 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की उन रिपोर्टों की ओर दिलाया था जिनमें कई स्मारकों की खराब हालत का ज़िक्र था; ये स्मारक ASI और MCD की घोर लापरवाही के कारण कूड़ा फेंकने की जगह बन गए। बेंच ने पाया था कि दोनों अधिकारियों ने हलफनामे में झूठ बोला था, क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि इन स्मारकों का रखरखाव ठीक से किया जा रहा है।
13वीं सदी का लाल महल
शंकरनारायणन ने बताया कि निज़ामुद्दीन में स्थित 13वीं सदी के ऐतिहासिक महल 'लाल महल' का ज़िक्र इब्न बतूता की विद्वतापूर्ण रचनाओं में भी मिलता है। उन्होंने कहा कि यह ASI और MCD दोनों की ओर से "सबसे बड़ी" लापरवाही का उदाहरण है, क्योंकि इस स्मारक को न केवल आंशिक रूप से तोड़ा गया, बल्कि निजी बिल्डरों ने इस पर कब्ज़ा भी कर लिया।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि ASI ने इस स्मारक को संरक्षित (प्रोटेक्टेड) घोषित क्यों नहीं किया। उन्होंने बेंच को बताया कि वे अपनी टीम के साथ स्मारक का निरीक्षण करने गए, लेकिन उन्हें यह कहते हुए रोक दिया गया कि यह निजी संपत्ति है। इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने MCD और ASI अधिकारियों से पूछा कि स्मारक की स्थिति क्या है - क्या यह निजी है या सार्वजनिक?
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा:
"हां, मिस्टर संजय [MCD वकील], आपके रिकॉर्ड के अनुसार उस इलाके की स्थिति क्या है?"
सीनियर वकील एसडी संजय ने जवाब दिया कि वह इलाका निजी है और MCD के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इस पर जज ने उस निजी ज़मीन का होल्डिंग नंबर मांगा। जब वकील जवाब नहीं दे पाए, तो बेंच ने उनकी प्रतिक्रिया की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जिन तीन अधिकारियों ने यह जाने बिना हलफनामा दायर किया कि इलाका MCD के अंतर्गत आता है या नहीं, उन्हें अज्ञानता के कारण तुरंत सस्पेंड कर दिया जाना चाहिए।
जज ने कहा,
"आप बहुत लापरवाह हैं... हमें उन अधिकारियों के नाम बताएं जिन्होंने आपको निर्देश दिए हैं! हम उन्हें आज ही कोर्ट की ओर से सस्पेंड कर देंगे। यह अविश्वसनीय और चौंकाने वाला है।"
ASI ने घूमने लायक कोई हेरिटेज साइट नहीं बनाई
शंकरनारायणन ने एक और उपेक्षित स्मारक - लोदी-युग के ज़मरूदपुर मकबरों - के बारे में भी बात की। उन्होंने बताया कि अब वहां एक गौशाला है और उसका इस्तेमाल कचरा फेंकने की जगह के तौर पर किया जा रहा है।
इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने ASI के महानिदेशक को बुलाया और स्पष्टीकरण मांगा।
उन्होंने MCD से भी सवाल किया:
"आपकी हिम्मत कैसे हुई इसे गौशाला के तौर पर इस्तेमाल करने की?... मुझे नहीं लगता कि MCD स्मारकों का रखरखाव करने में सक्षम है। एक मामला तो दुर्घटना हो सकता है, लेकिन जब आप कई स्मारकों को देखते हैं, तो पाते हैं कि उनके फर्श पर 14-16 इंच तक कचरा जमा हो गया है। जब उन्हें 20 साल से जमा कचरा साफ करना पड़ता है, तो इसमें समय लगता है। सच कहूं तो, निरीक्षण के बाद मुझे नहीं लगता कि उनमें यह क्षमता है।"
उन्होंने ASI से कहा:
"वे बस फंड इकट्ठा करना चाहते हैं, वे वहां सिर्फ़ अपने गार्ड तैनात रखते हैं, वहां कोई हलचल नहीं होती। दिल्ली में ASI की साइट्स पर कोई नहीं जाएगा। ASI ने अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी है... वे कुछ नहीं करते, बस ग्रांट लेते हैं और सैकड़ों लोगों को सैलरी देते हैं..."
हालांकि बेंच अधिकारियों के खिलाफ़ कड़े आदेश देना चाहती थी, लेकिन उसने उन्हें नया हलफ़नामा दाखिल करने का एक आखिरी मौका दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया:
"कोर्ट कमिश्नर की ओर से एक रिपोर्ट दाखिल की गई। हमने इसे देखा है और पाया है कि अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच तालमेल की भारी कमी है। हमें यह भी लगता है कि विभागों के अधिकारियों ने मामले की गंभीरता और जिस तरह से उन्हें काम करना चाहिए, उसे नहीं समझा है... हमें उनके काम करने के तरीके में ऐसी कोई बात नहीं दिखी जिससे लगे कि वे कोर्ट में कही गई बातों और ज़मीनी स्तर पर लागू की जा रही चीज़ों को लेकर गंभीर हैं।
स्टेटस रिपोर्ट, मालिकाना हक, सेटलमेंट और मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी नहीं मिल रही है। जिन अधिकारियों को कानून के मुताबिक जानकारी होनी चाहिए और जिनके पास रिकॉर्ड होने चाहिए, उन्हें ही इन विवरणों के बारे में कुछ पता नहीं है। अब समय आ गया है कि हम कड़े आदेश देकर सख्त कार्रवाई करें। हालांकि, वकीलों के अनुरोध पर और आखिरी बार रियायत देते हुए कोर्ट अभी कोई सख्त आदेश नहीं दे रहा है। हमें लगता है कि केंद्र सरकार के अधिकारियों को दूसरे अधिकारियों के साथ इस मामले में तालमेल बिठाने की ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए।
हमें लगता है कि कार्यवाही की प्रकृति को देखते हुए, भारत सरकार के इतिहास और संस्कृति विभाग के सचिव को भी इस मामले में पक्षकार बनाया जाना चाहिए। अगली सुनवाई की तारीख पर संस्कृति मंत्रालय के सचिव, MCD और NDMC के कमिश्नर, NCT दिल्ली के पुरातत्व विभाग के सचिव, ASI के DG, DDA के वाइस चेयरमैन और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) के DG कोर्ट में मौजूद रहेंगे। 16 अक्टूबर को दोपहर 1 बजे जब मामले की सुनवाई होगी, तब DTTSC भी मौजूद रहेगा। कोई अन्य काम रद्द माना जाएगा और इस कोर्ट में किसी प्रतिनिधि या नॉमिनी को नहीं भेजा जाएगा।
जहां तक दिल्ली गोल्फ क्लब की बात है, हम उनके हलफनामे से खुश नहीं हैं। इसमें प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी जानी चाहिए थी। नियमों के संदर्भ में एक नया हलफनामा दाखिल किया जाएगा।"
Case Title : Rajeev Suri v Archaeological Survey of India

