'APTEL पूरी तरह से भटक गया': सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पुराने फैसले को पलटने के लिए ट्रिब्यूनल को फटकार लगाई
Shahadat
30 Oct 2026 9:00 PM IST

शुक्रवार (30 अक्टूबर) को सुप्रीम कोर्ट ने 'अपिलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी' (APTEL) की कड़ी आलोचना की। ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसले का उल्लंघन करते हुए अपने ही पुराने आदेश की समीक्षा (Review) की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने "न्यायिक अनुशासन का घोर उल्लंघन" किया है और संविधान के अनुच्छेद 141 को तोड़ा है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने ट्रिब्यूनल का समीक्षा आदेश रद्द किया।
खंडपीठ ने कहा,
"हमें यह कहना पड़ रहा है कि ट्रिब्यूनल पूरी तरह से भटक गया; हम इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल के लिए माफी चाहते हैं, लेकिन अपनी नाराजगी जताने के लिए हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है। ट्रिब्यूनल ने ऐसे मामले में समीक्षा की अनुमति दी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही फैसला सुना चुका था..."
ट्रिब्यूनल का यह समीक्षा आदेश, 2019 के मूल फैसले के खिलाफ था, जिसमें 'दामोदर वैली कॉरपोरेशन' (DVC) को बिजली टैरिफ के जरिए अपने 'सिंकिंग फंड' (Sinking Fund) में किए गए योगदान की वसूली करने की अनुमति दी गई थी।
कोर्ट ने समीक्षा की मांग करने वाली कंपनी 'मैथन अलॉयज लिमिटेड' पर 2 लाख रुपये और समीक्षा आदेश का समर्थन करने वाली 'स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड' (SAIL) पर 1.5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
यह विवाद 2009-2014 के लिए DVC के टैरिफ निर्धारण से जुड़ा था। 'सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन' (CERC) ने DVC को अपने 'सिंकिंग फंड' में किए गए योगदान को ऐसा खर्च मानने की अनुमति दी थी, जिसे बिजली टैरिफ के जरिए वसूला जा सकता है। यह फंड बॉन्ड चुकाने के लिए बनाया गया।
2019 में APTEL ने 'भास्कर श्राची अलॉयज लिमिटेड बनाम दामोदर वैली कॉरपोरेशन' (2018) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, इस निर्णय को सही ठहराया था। लेकिन 2024 में ट्रिब्यूनल ने 'मैथन अलॉयज' की समीक्षा याचिका स्वीकार किया (जो 5 साल से भी ज्यादा समय बाद दायर की गई)।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि बॉन्ड से जुटाई गई रकम से बनाई गई संपत्तियों पर 'डेप्रिसिएशन' (मूल्यह्रास) और 'सिंकिंग फंड' में योगदान—दोनों की अनुमति देना 'दोहरा लाभ' (Double Benefit) देने जैसा होगा। इसके बाद DVC ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
DVC की अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि APTEL ने सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी पूर्व-निर्णयों (Precedents) की अनदेखी की और न्यायिक अनुशासन के सिद्धांतों का उल्लंघन किया।
इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल के 'समीक्षा अधिकार क्षेत्र' (Review Jurisdiction) के नजरिए से देखने पर भी APTEL द्वारा की गई समीक्षा उन सिद्धांतों में से किसी के भी अंतर्गत नहीं आती, जो किसी ट्रिब्यूनल को समीक्षा की अनुमति देने के लिए लागू होते हैं। कोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड में मौजूद कोई भी गलती ऐसी होनी चाहिए, जो स्पष्ट रूप से दिखाई दे; इसके लिए किसी लंबी दलील या विस्तृत जांच की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"हम इस समीक्षा को स्पष्ट रूप से अवैध, पूरी तरह से अनुचित और न्यायिक अनुशासन के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन मानते हैं। हम इस बात पर भी जोर देना चाहते हैं कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 का गंभीर उल्लंघन है। हमारी न्यायिक प्रणाली, जिसमें अदालतों का एक पदानुक्रम (Hierarchy) है, इस बात पर टिकी है कि अपीलीय, पुनरीक्षण (Revisional) और पर्यवेक्षी (Supervisory) अधिकार क्षेत्रों के फैसलों का सम्मान किया जाए और उन्हें उचित महत्व दिया जाए। जहां तक अनुच्छेद 141 का सवाल है, यह एक संवैधानिक अनिवार्यता है जो यह सुनिश्चित करती है कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसलों का पालन किया जाए; यदि ऐसा न हो, तो पूरी व्यवस्था में अराजकता फैल जाएगी।"
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई और याचिकाकर्ता को खर्च (Costs) भी दिए जाने का आदेश दिया गया।
Case Title : Damodar Valley Corporation v. Maithan Alloys Limited & Ors.

