अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कथित बैंक धोखाधड़ी की जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI, ED से स्टेटस रिपोर्ट तलब की

Praveen Mishra

23 Jan 2026 2:02 PM IST

  • अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कथित बैंक धोखाधड़ी की जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI, ED से स्टेटस रिपोर्ट तलब की

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कंपनियों और उनके प्रमोटर अनिल अंबानी द्वारा कथित बैंक धोखाधड़ी के मामलों में चल रही जांच को लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) से स्टेटस रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने निर्देश दिया कि ये रिपोर्टें सीलबंद लिफाफे में दाखिल की जाएँ।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ पूर्व केंद्रीय सचिव ई.ए.एस. सरमा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

    याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने दलील दी कि अनिल अंबानी समूह की कंपनियों का 1.50 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज राइट-ऑफ किया गया है और शेल कंपनियों के माध्यम से बड़े पैमाने पर धन की हेराफेरी की गई। उन्होंने इसे देश का सबसे बड़ा बैंक लोन घोटाला बताया।

    भूषण ने यह भी कहा कि अनिल धीरूभाई अंबानी समूह और अनिल अंबानी अदालत में पेश नहीं हुए हैं, जबकि उन्हें 18 नवंबर को नोटिस जारी किया गया था। उन्होंने कहा, “इस मामले को मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया है। ऐसा नहीं है कि उन्हें जानकारी नहीं है।”

    खंडपीठ ने नोट किया कि नोटिस तामील होने के बावजूद संबंधित प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुए हैं। हालांकि, न्याय के हित में अदालत ने उन्हें अंतिम अवसर देते हुए नया नोटिस जारी किया और बॉम्बे हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस की सेवा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

    प्रशांत भूषण ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि ED और CBI से स्टेटस रिपोर्ट मंगाई जाए। उन्होंने कहा कि अब तक जांच में किसी भी सार्वजनिक सेवक (बैंक अधिकारी) को आरोपी नहीं बनाया गया है।

    इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह याचिकाकर्ता की मांग का विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि यह FIR भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा कराए गए फॉरेंसिक ऑडिट के आधार पर दर्ज की गई थी। उन्होंने कहा कि ऑडिट में धन के अन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल (साइफनिंग) के तथ्य सामने आए थे, जिसके आधार पर SBI ने CBI में शिकायत दर्ज कराई।

    याचिका में कहा गया है कि CBI और ED द्वारा की जा रही वर्तमान जांच संकीर्ण, अधूरी और अपूर्ण है तथा इसमें जानबूझकर बैंक अधिकारियों और अन्य सार्वजनिक सेवकों की भूमिका को बाहर रखा गया है, जबकि उनके खिलाफ ठोस सामग्री मौजूद है। याचिकाकर्ता का कहना है कि एक समन्वित, पारदर्शी और व्यापक जांच सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक निगरानी आवश्यक है।

    याचिका के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसकी समूह कंपनियों को वर्ष 2013 से 2017 के बीच SBI के नेतृत्व वाले बैंक कंसोर्टियम से 31,580 करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त हुआ। अक्टूबर 2020 में प्रस्तुत फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में कथित तौर पर हजारों करोड़ रुपये के डायवर्जन, शेल कंपनियों, सर्कुलर ट्रांजैक्शन और फर्जी परिसंपत्ति खरीद का खुलासा हुआ। इसके बावजूद SBI ने अगस्त 2025 में, लगभग पाँच वर्ष बाद, औपचारिक शिकायत दर्ज की, जिसे याचिकाकर्ता ने संदिग्ध बताया।

    इसके बाद CBI ने षड्यंत्र, धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों में FIR दर्ज की, जिसमें 2,929 करोड़ रुपये के नुकसान का उल्लेख है। हालांकि, याचिका में कहा गया है कि FIR कथित अनियमितताओं के केवल एक छोटे हिस्से को कवर करती है और कई गंभीर अपराधों को नजरअंदाज किया गया है।

    याचिका में यह भी दावा किया गया है कि नेटिजन इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड और कुंज बिहारी डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों के माध्यम से धन की हेराफेरी की गई, जो अपने पंजीकृत पतों पर अस्तित्वहीन पाई गईं।

    अदालत के समक्ष रखी गई विभिन्न फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्टों में रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस इंफ्राटेल, रिलायंस टेलीकॉम और रिलायंस कैपिटल सहित कई कंपनियों में सार्वजनिक धन की बड़े पैमाने पर साइफनिंग, लेयरिंग और कंपनियों अधिनियम, FEMA, SEBI और RBI दिशानिर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ऋण स्वीकृति, निगरानी और अनियमितताओं को नजरअंदाज करने में शामिल बैंक अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 'लोक सेवक' हैं और उनकी भूमिका की जांच किए बिना जांच अधूरी है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

    याचिका में कोबरापोस्ट की एक हालिया जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें दावा किया गया है कि अनिल अंबानी समूह की कंपनियों ने लगभग 41,921 करोड़ रुपये की हेराफेरी की, जिसमें देश के भीतर लिए गए ऋण और मॉरीशस, साइप्रस व ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स के जरिए भारत लाया गया विदेशी धन शामिल है।

    इसके अतिरिक्त, 2022 में रिलायंस कैपिटल के फॉरेंसिक ऑडिट और ग्रांट थॉर्नटन की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें हजारों करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन और ऋणदाताओं के हितों को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों का विवरण है।

    याचिका में कहा गया है कि 35 से अधिक परिसरों पर छापे के बावजूद अब तक न तो कोई गिरफ्तारी हुई है और न ही बड़ी संपत्तियां जब्त की गई हैं। ऐसे में, मामले की गंभीरता और सार्वजनिक धन की भारी राशि को देखते हुए, न्यायालय-निगरानी में जांच आवश्यक है।

    याचिका में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेषज्ञ समिति के गठन की भी मांग की गई है, जो भविष्य में इस प्रकार के वित्तीय घोटालों को रोकने के लिए संरचनात्मक सुधारों की सिफारिश कर सके।

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