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AIBE नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, नामांकन के बाद परीक्षा की आवश्यकता का नियम तय करने की बीसीआई की अथॉरिटी पर सवाल

LiveLaw News Network
18 Jan 2021 6:34 AM GMT
AIBE नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, नामांकन के बाद परीक्षा की आवश्यकता का नियम तय करने की बीसीआई की अथॉरिटी पर सवाल
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एक नए नामांकित अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा घोषित ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन रूल्स, 2010 को चुनौती दी गई है। उल्लेखनीय है कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन रूल्स में कहा गया है कि एक वकील को नामांकन के बाद प्रैक्टिस करने के लिए ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (एआईबीई) पास करना होगा।

पार्थसारथी महेश सराफ, जिसने 2019 में नामांकन किया था, की ओर से दायर याचिका में वकालत की प्रै‌क्टिस के लिए नामांकन के बाद परीक्षा की आवश्यकता का नियम तय करने की बीसीआई की अथॉरिटी पर सवाल उठाता है। याचिकाकर्ता ने 24 जनवरी और 13 मार्च को होने वाली एआईबीई, 2021 की परीक्षाओं के लिए बीसीआई की ओर से जारी 21 दिसंबर, 2020 की अधिसूचना को भी चुनौती दी है।

याचिकाकर्ता ने प्रश्न उठाया है कि क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास प्रै‌क्टिस करने की अर्हता के रूप में प्री-एनरॉलमेंट या पोस्ट-एनरॉलमेंट एग्जामिनेशन की शर्त रखने की शक्ति है, क्योंकि यह मुद्दा 18 मार्च, 2016 को तीन जजों की बेंच द्वारा संविधान पीठ को भेजा जा चुका है। (SLP) (c) 22337/2008)। संदर्भ अभी भी लंबित है।

एडवोकेट वीके बीजू के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि मामले में वी सुधीर बनाम बीसीआई और एक अन्य 1999 (3) एससीसी 176 में सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ट्रेनिंग रूल्स, 1995 को खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि बीसीआई अधीनस्थ नियमों के जर‌िए अधिवक्ताओं पर अतिरिक्त शर्तें नहीं लगा सकता है। यह अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन है।

इं‌डियन काउंसिल ऑफ लीगल एड एंड एडवाइस बनाम बीसीआई 1995 SCC (1) 732 में सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले में यह माना गया था कि बीसीआई अधिवक्ता अधिनियम, 1961, धारा 49 (1) (एजी) के तहत उम्र के आधार पर अधिवक्ताओं को ‌डिबार करने का कोई नियम नहीं बना सकता है, और ऐसा नियम नियम बनाने की शक्ति से परे है और इसलिए... यह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध भी है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि एआईबीई नियम, 2010 उपरोक्त आदेशों के खिलाफ है।

याचिका में यह भी कहा है कि अधिवक्ता अधिनियम के 1973 के संशोधन के अनुसार, अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24 की उपधारा (1) के क्लॉज (d) - जो प्रशिक्षण के बाद राज्य बार काउंसिल द्वारा आयोजित एक परीक्षा में उत्तीर्ण करने का प्रावधान करता था, को हटा दिया गया था। इस तरह के संशोधन के बाद, बीसीआई के पास नामांकन और प्रै‌क्टिस के लिए अतिरिक्त शर्तें रखने की वैधानिक शक्ति का अभाव है।

उल्लेखनीय रूप से, याचिकाकर्ता अधिवक्ता अधिनियम के 1973 के संशोधन को भी चुनौती दी है, जिसमें तहत धारा 24 (1) (d) को हटा दिया गया है।

याचिका में कहा गया है कि ज्यादातर कॉमनवेल्‍थ देशों, जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, हांगकांग, मलेशिया, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और यूनाइटेड किंगडम में बार में प्रवेश के लिए बार एग्जाम एक पूर्व शर्त है।

यह भी कहा गया है कि भारत में एमबीबीएस, सीए, सीएस, बीएएमएस, बीएचएमएस जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से संबंधित कानून / अधिनियम, संबंधित व्यावसायिक संस्थानों / परिषदों में नामांकन से पहले अनिवार्य प्रशिक्षण और परीक्षा का निर्धारण करते हैं। इस पृष्ठभूमि में, 1973 में अधिवक्ता अधिनियम से ऐसी शर्त को हटाने को "मनमाना और अनुचित" मानते हुए चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा 2009 में गठित उच्चाधिकार समिति की रिपोर्टों ने कानूनी पेशे के मानकों में सुधार करने के लिए नामांकन से पहले एक परीक्षा और प्रशिक्षण की सिफारिश की है। हालांकि, इस तरह की सिफारिशों को नजरअंदाज करते हुए, और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लंघन करते हुए, बीसीआई ने नामांकन के बाद परीक्षा शुरू की है।

याचिका में निम्नलिखित मुख्य तर्क दिए गए हैं-

a. 1973 के संशोधन के बाद सेक्‍शन 24 के सबसेक्शन (1) के क्लॉज (d) को छोड़ दिया गया क्योंकि यह अनिवार्य प्रशिक्षण और परीक्षा की शर्त रखने वाला एकमात्र प्रावधान था।

b. उपरोक्त खंड को हटाने के बाद, बीसीआई किसी भी परीक्षा को निर्धारित करने का कोई नियम नहीं बना सकता है क्योंकि यह अधिवक्ता अधिनियम में एक उपयुक्त संशोधन के बिना अधीनस्थ कानून के माध्यम से नहीं किया जा सकता है, जैसा कि सुधीर मामले (सुप्रा) में आयोजित किया गया था।

c.उच्चतम न्यायालय के निर्देशों और दोनों उच्च शक्ति समितियों की सिफारिशों पर विचार करने के लिए बीसीआई बाध्य है।

d. इंडियन काउंस‌िल ऑफ लीगल एड (सुप्रा) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के मद्देनजर यह भी संभव नहीं है।

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