BCI चेयरमैन की 'फर्जी वकीलों' पर टिप्पणी के बाद लॉ डिग्री की जांच की मांग: सुप्रीम कोर्ट में याचिका
Shahadat
26 May 2026 10:45 AM IST

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन की हालिया टिप्पणी के बाद रिट याचिका दायर की गई। चेयरमैन ने कहा था कि 35-40 प्रतिशत वकीलों के पास फर्जी डिग्रियां हैं और वे जाली डिग्री सर्टिफिकेट के आधार पर अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे हैं।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका में भारत सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), सभी राज्य बार काउंसिलों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को निर्देश देने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि वकीलों की योग्यताओं की जांच के लिए एक पारदर्शी और एक समान व्यवस्था बनाई जाए।
यह याचिका सुश्री योगमाया एम.जी. ने दायर की, जो खुद एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं।
याचिका में कहा गया:
"बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नेतृत्व द्वारा हाल ही में दिए गए सार्वजनिक बयानों के मद्देनजर यह मुद्दा संवैधानिक रूप से बहुत गंभीर हो जाता है। इन बयानों से संकेत मिलता है कि वकीलों के तौर पर रजिस्टर्ड या प्रैक्टिस कर रहे लोगों में से एक बड़ी संख्या के पास फर्जी, जाली या ऐसी शैक्षणिक योग्यताएं हो सकती हैं, जिनकी जांच नहीं हो सकती। साथ ही एक बड़ी संख्या ने निर्धारित जांच प्रक्रियाएं पूरी नहीं की हैं।"
याचिकाकर्ता ने विभिन्न राज्यों में वकीलों की रजिस्ट्रेशन सूची से फर्जी वकीलों को हटाने से जुड़ी रिपोर्टों का भी हवाला दिया। इससे संकेत मिलता है कि यह कोई अलग-थलग मामला नहीं है, बल्कि इसका एक व्यवस्थित प्रभाव है, जो पूरे कानूनी पेशे और न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति जाली दस्तावेजों के साथ रजिस्टर्ड रहता है तो इसके परिणाम केवल पेशेवर कदाचार तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि यह सीधे तौर पर मुकद्दमे लड़ने वालों, न्यायिक संस्थाओं और कानून के शासन में जनता के विश्वास को भी प्रभावित करता है।
याचिकाकर्ता ने राज्य बार काउंसिलों में हाल ही में हुए चुनावों और 'एम. वर्धन बनाम भारत सरकार' (M. Vardhan v UOI) मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी जिक्र किया, जिसके तहत इन चुनावों की निगरानी की जा रही थी। 11 नवंबर, 2025 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लॉ डिग्री की जांच के बाद, जिन लोगों की डिग्रियां फर्जी/असली नहीं/अमान्य पाई जाती हैं, उन्हें चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
हालांकि, याचिका में बताया गया कि दो महिला वकीलों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी गई, जबकि उनकी लॉ डिग्रियों की जांच दिल्ली बार काउंसिल द्वारा अभी लंबित थी।
कहा गया,
"यह निवेदन किया जाता है कि आज की तारीख तक, BCD, R-4 की वेबसाइट पर उपलब्ध वेरिफिकेशन स्टेटस की जानकारी से पता चलता है कि 2 उम्मीदवारों—बैलेट नंबर 195 और बैलेट नंबर 220—की लॉ डिग्रियों का वेरिफिकेशन अभी भी पेंडिंग है। ये मामले नामांकन पत्रों की जांच को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं; यह जांच उम्मीदवारों की अंतिम सूची को अंतिम रूप देने से पहले प्रतिवादी संख्या 4 (BCD) द्वारा की जानी थी।"
याचिकाकर्ता ने हाल ही में हुए बार काउंसिल चुनावों, विशेष रूप से दिल्ली में हुए चुनावों को लेकर भी चिंताएं जताईं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि जिन वकीलों की डिग्रियों का वेरिफिकेशन अभी भी पेंडिंग था, उन्हें चुनाव लड़ने या वोट डालने की अनुमति दी गई। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि इस तरह के मुद्दे बार काउंसिलों के भीतर चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जांच-पड़ताल को लेकर व्यापक चिंताएं पैदा करते हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि जिन वकीलों ने पिछले दो वर्षों में—और उससे भी पहले—बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में अपना नामांकन कराया था, उन्हें मतदाताओं की अंतिम सूची में शामिल कर लिया गया, लेकिन उनके वेरिफिकेशन का स्टेटस अभी भी पेंडिंग है।
"उदाहरण के लिए बार काउंसिल ऑफ दिल्ली की वेबसाइट पर नामांकन संख्या D/18453/2025 का स्टेटस—जो BCD की वर्ष 2026 की मतदाताओं की अंतिम सूची में क्रम संख्या 98300 पर दर्ज है—खाली (blank) दिखाई दे रहा है। दूसरे शब्दों में, इस बात की कोई पुष्टि नहीं है कि उनका वेरिफिकेशन हो चुका है। नामांकन संख्या D/11281/2024 के मामले में भी यही स्थिति है; उनका नाम BCD की वर्ष 2026 की मतदाताओं की अंतिम सूची में क्रम संख्या 98293 पर दर्ज है। यह निवेदन किया जाता है कि इन मतदाताओं में से कई ऐसे हैं, जिनका वेरिफिकेशन आज की तारीख तक पेंडिंग है। यदि बाद में यह पाया जाता है कि उनकी डिग्रियां अमान्य हैं, या किसी भी कारण से उनका वेरिफिकेशन रद्द कर दिया जाता है तो एक गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाएगी: यह पहचानना बेहद मुश्किल हो जाएगा कि उनके द्वारा डाले गए वोट कौन से हैं, और उन अमान्य वोटों को कैसे अलग किया जाए। परिणामस्वरूप, कई ऐसे उम्मीदवार होंगे, जिन्हें इन अमान्य वोटों का लाभ मिलेगा। यह अपने आप में पूरी चुनावी प्रक्रिया को रद्द करने (countermand) का एक ठोस आधार है।"
सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले अजय शंकर श्रीवास्तव बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया और एम. वर्धन बनाम भारत संघ मामले में जारी किए गए निर्देशों का हवाला देते हुए याचिका में यह तर्क दिया गया कि वेरिफिकेशन प्रक्रियाओं के संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप के बावजूद, उनका प्रभावी और पारदर्शी कार्यान्वयन अभी भी नदारद है।
याचिका में कहा गया कि मांगी गई राहत का उद्देश्य किसी व्यक्तिगत अधिवक्ता को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि गोपनीयता-अनुरूप पारदर्शिता और विनियामक जवाबदेही सुनिश्चित करना तथा न्याय वितरण प्रणाली में विश्वास को सुदृढ़ करना है।
The petition has been filed by Deepak Prakash AoR.

