वकील के दफ्तर की तलाशी और Advocate-Client Privilege का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, CJI ने जल्द सुनवाई पर सहमति दी

  • वकील के दफ्तर की तलाशी और Advocate-Client Privilege का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, CJI ने जल्द सुनवाई पर सहमति दी

    वकील के दफ्तर की तलाशी और Advocate-Client Privilege से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। अधिवक्ता पुनीत बत्रा ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में Special Leave Petition (SLP) दाखिल की है, जिसमें हाईकोर्ट ने GST विभाग द्वारा उनके लॉ ऑफिस में की गई तलाशी और जब्ती को बरकरार रखा था।

    मामले को सीनियर एडवोकेट विकास सिंह और एन. हरिहरन ने चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए मेंशन किया। सीनियर एडवोकेट हरिहरन ने दलील दी कि जब्त किए गए कंप्यूटर और अन्य डिवाइस में दूसरे क्लाइंट्स से जुड़ी गोपनीय और विशेषाधिकार प्राप्त जानकारी भी मौजूद है। CJI ने मामले को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

    क्या है पूरा मामला?

    पुनीत बत्रा ने दिल्ली स्थित अपनी लॉ फर्म Bass Legal LLP के परिसर में GST विभाग द्वारा की गई तलाशी को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

    GST अधिकारियों ने तलाशी के दौरान उनके केबिन से CPU और अन्य दस्तावेज जब्त किए थे।

    बत्रा की ओर से दलील दी गई कि जब्त कंप्यूटर में उनके क्लाइंट्स के साथ हुई गोपनीय बातचीत और कानूनी सलाह से संबंधित सामग्री मौजूद हो सकती है। खास तौर पर Martkarma Technology Pvt. Ltd. (MTPL) नामक गेमिंग कंपनी से जुड़े दस्तावेजों का उल्लेख किया गया।

    उनका कहना था कि ऐसी सामग्री Advocate-Client Privilege के तहत संरक्षित है और जांच एजेंसियों को इसे सामान्य रूप से एक्सेस करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    GST विभाग का क्या आरोप है?

    GST विभाग का आरोप था कि बत्रा की भूमिका केवल कंपनी को कानूनी सलाह देने वाले वकील तक सीमित नहीं थी।

    विभाग ने जांच के दौरान दर्ज बयानों और अन्य सामग्री के आधार पर दावा किया कि बत्रा कथित तौर पर MTPL के मामलों के संचालन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे।

    इसी आधार पर विभाग ने उनके खिलाफ जांच आगे बढ़ाने के लिए उनके कार्यालय में तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा?

    दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल खेतरपाल और जस्टिस शैल जैन की डिवीजन बेंच ने बत्रा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि Advocate-Client Privilege किसी वकील के अपने आचरण की जांच के खिलाफ पूर्ण सुरक्षा नहीं है।

    कोर्ट के अनुसार, यदि अधिकारियों के पास प्रथमदृष्टया ऐसा material मौजूद है जिससे संकेत मिलता है कि वकील केवल कानूनी सलाहकार की भूमिका से आगे बढ़कर उस मामले से जुड़े कार्यों में शामिल हो सकता है, तो उसके अपने आचरण की जांच की जा सकती है।

    हाईकोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि वास्तविक रूप से privileged communications और confidential client material को कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

    “वकील होना तलाशी से पूरी तरह छूट नहीं देता”

    हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि संबंधित व्यक्ति एक वकील है, उसके परिसर में की गई वैध तलाशी को अवैध नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने पाया कि Bass Legal LLP और बत्रा के केबिन में तलाशी CGST Act की धारा 67(2) के तहत जारी वैध authorization के आधार पर की गई थी।

    हालांकि, कोर्ट ने साथ ही यह भी साफ किया कि उसके फैसले का मतलब वकीलों के परिसरों की unrestricted search की अनुमति देना नहीं है।

    दूसरे क्लाइंट्स की जानकारी पर विशेष सुरक्षा

    हाईकोर्ट ने जांच के दौरान दूसरे क्लाइंट्स की ऐसी जानकारी को लेकर भी महत्वपूर्ण सुरक्षा दी, जिसका MTPL के मामले से कोई संबंध नहीं है।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि आगे की जांच के लिए GST अधिकारियों को पहले से तैयार cloned copy of data का इस्तेमाल करना होगा।

    उन्हें बत्रा के अन्य क्लाइंट्स से संबंधित ऐसी जानकारी की जांच करने से रोक दिया गया, जिसका MTPL के मामलों से कोई संबंध नहीं है।

    यदि भविष्य में ऐसी कोई सामग्री जांच के लिए प्रासंगिक बनती है, तो उसके लिए कोर्ट से उचित आदेश लेना होगा।

    अब सुप्रीम कोर्ट में उठेगा बड़ा सवाल

    सुप्रीम कोर्ट के सामने अब मुख्य सवालों में यह शामिल होगा कि—

    - क्या Advocate-Client Privilege वकील के परिसर की तलाशी और डिजिटल डेटा की जांच के खिलाफ पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है?

    - यदि किसी वकील के अपने आचरण को लेकर प्रथमदृष्टया material हो, तो जांच एजेंसी किस सीमा तक उसके कार्यालय और डिजिटल डिवाइस की जांच कर सकती है?

    - दूसरे क्लाइंट्स की confidential और privileged information को जांच से कैसे सुरक्षित रखा जाए?

    - क्या जांच एजेंसी वकील के कब्जे में मौजूद डिजिटल डेटा तक पहुंच सकती है, और यदि हां, तो उसकी सीमा क्या होगी?

    CJI जस्टिस सूर्यकांत ने मामले को सूचीबद्ध करने पर सहमति दे दी है। इस तरह यह मामला वकील-क्लाइंट गोपनीयता, जांच एजेंसियों की शक्तियों और डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया है।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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