सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की वजह से व्यस्क मताधिकार खत्म हो रहा है: सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने SIR की आलोचना की
Shahadat
27 Sept 2026 1:03 PM IST

सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने शुक्रवार को चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया देश को वयस्क मताधिकार की संवैधानिक गारंटी से दूर ले जा रही है और बड़ी संख्या में वोटरों के नाम सूची से हटाए जाने को लेकर चिंताएं पैदा कर रही है।
दवे ने कई राज्यों में SIR प्रक्रिया को चुनौती देने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के रवैये की भी आलोचना की।
17वें के.एम. बशीर मेमोरियल लेक्चर में "क्या हम संविधान के प्रति विफल हो रहे हैं या संविधान हमारे प्रति विफल हुआ है?" विषय पर बोलते हुए दवे ने बताया कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के ज़रिए राजनीतिक समानता ज़रूरी है।
दवे ने कहा,
"अंबेडकर कहते हैं कि राजनीति में हमारे पास समानता होगी। आप जानते हैं, वयस्क मताधिकार। बेशक, अब चुनाव आयोग और भारत के सुप्रीम कोर्ट की वजह से वह मताधिकार खत्म हो रहा है। क्योंकि SIR के नाम पर हर किसी को - यहाँ तक कि मुझे और मेरी पत्नी को भी - नोटिस मिला है कि क्या हमें वास्तव में वोटर लिस्ट में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं।"
चुनाव आयोग ने 24 जून, 2025 को बिहार में वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) की घोषणा की थी। इसके तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट में इस प्रक्रिया को पहली बार चुनौती दी गई और याचिकाकर्ताओं ने SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की। इसके बाद अन्य राज्यों में भी SIR प्रक्रियाओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं दायर की गईं।
हालांकि, कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई। बिहार में SIR प्रक्रिया 30 सितंबर, 2025 को अंतिम वोटर लिस्ट के प्रकाशन के साथ पूरी हुई। इसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव 6 और 11 नवंबर, 2025 को हुए।
जनवरी 2026 में सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य मामलों के समूह में फैसला सुरक्षित रख लिया और 27 मई, 2026 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें SIR आयोजित करने की चुनाव आयोग की शक्ति बरकरार रखी गई।
तब तक कुछ अन्य राज्यों में भी यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इस तरह SIR की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फ़ैसला बिहार, पुडुचेरी, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया पूरी होने और विधानसभा चुनाव हो जाने के बाद आया।
बिहार मामले की सुनवाई में कोर्ट ने SIR कराने की ECI की शक्ति को सही ठहराया। साथ ही दावों की प्रक्रिया के लिए पहचान दस्तावेज़ के तौर पर आधार को स्वीकार करने जैसे सुरक्षा उपाय करने का निर्देश भी दिया।
दवे ने SIR पर कोर्ट के नज़रिए और फ़ैसले की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट तब भी दखल देने को तैयार नहीं है जब उसे दिखता है कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट ने इस प्रक्रिया को होने दिया, और अब यह बात सामने आई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार बाकी दो चुनाव आयुक्तों के बिना फ़ैसले ले रहे थे।
दवे इस हफ़्ते की शुरुआत में 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट का ज़िक्र कर रहे थे, जिसमें कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान मतदाता सूची और SIR से जुड़े फ़ैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई। अख़बार ने रिपोर्ट दी कि संधू और जोशी ने कहा कि ये फ़ैसले उनकी जानकारी के बिना या उनकी सिफ़ारिशों के ख़िलाफ़ लिए गए।
उन्होंने कहा,
"जब हम लोकतंत्र की बात करते हैं तो आपने पिछले 48 घंटों में देखा होगा कि कैसे दो चुनाव आयुक्तों ने यह बात सामने रखी कि मुख्य चुनाव आयुक्त कुछ ऐसा कर रहे थे जो पूरी तरह से ग़लत था, और फिर भी कुछ नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को होने दिया और नतीजतन, बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव हो गए, जहां हमें पता ही नहीं कि नतीजे कैसे आए।"
उन्होंने आगे कहा,
"क्योंकि पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख लोगों को और बिहार में भी इतनी ही संख्या में लोगों को बाहर रखा गया। अकेले दिल्ली में 47 लाख और महाराष्ट्र में 2 करोड़ लोग छूट रहे हैं। तो अगर आप 13.5 करोड़ भारतीयों को ग़ैर-भारतीय मानकर रखेंगे तो आप सोच सकते हैं कि इससे लोकतंत्र और लोकतंत्र के कामकाज पर कितनी बुरी तरह असर पड़ेगा।"
अखबार की जांच के अनुसार, संधू और जोशी की आपत्तियों में 'फॉर्म 6' में बदलाव भी शामिल था, जिसका इस्तेमाल नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए किया जाता है। 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने इस आधार पर बदलाव का विरोध किया कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स' में संबंधित संशोधन किए बिना कानूनी फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता।
जांच में वोटर-लिस्ट डेटाबेस तक पहुंच के सेंट्रलाइजेशन (केंद्रीकरण) पर भी आपत्तियां जताई गईं। रिपोर्ट के अनुसार, संधू ने चिंता जताई कि कानूनी चुनाव अधिकारियों को रोल-मैनेजमेंट सिस्टम तक उचित और पूरी पहुंच नहीं दी जा रही थी।
इस रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई। इसमें वोटर-लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के संबंध में कानूनी कर्तव्यों के कथित उल्लंघन को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई।
दवे ने चुनावी प्रक्रिया में पैसे के ट्रांसफर और कल्याणकारी योजनाओं के इस्तेमाल की भी आलोचना की और तर्क दिया कि ऐसे उपाय वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं।
उन्होंने कहा,
"बिहार चुनाव से पहले, हर महिला के अकाउंट में 10,000 रुपये आए। क्या इससे वोट देने के बारे में उसके और उसके पति या परिवार के फैसले में बदलाव नहीं आएगा या वे प्रभावित नहीं होंगे? क्योंकि तब आप और अधिक की उम्मीद करते हैं।"
उन्होंने कहा कि चुनावों को प्रभावित करने के लिए ऐसे उपायों का इस्तेमाल किया जा रहा था, और नतीजतन चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह से एकतरफा हो गई।

