उच्च न्यायालयों में एडहॉक आधार पर अतिरिक्त जजों की नियुक्ति नियमित जजों के रिक्त पदों को भरने के बाद ही की जा सकती है : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

  • उच्च न्यायालयों में एडहॉक आधार पर अतिरिक्त जजों की नियुक्ति नियमित जजों के रिक्त पदों को भरने के बाद ही की जा सकती है : केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

    केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत उच्च न्यायालयों में एडहॉक आधार पर अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायाधीशों के नियमित रिक्त पदों को भरने के बाद ही की जा सकती है।

    सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के समक्ष यह दलील एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया आरएस सूरी द्वारा प्रस्तुत की गई थी। पीठ ने पहले लंबित मामलों की बढ़ती संख्या की समस्या से निपटने के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की एडहॉक नियुक्ति पर केंद्र से विचार मांगे थे।

    एएसजी सूरी ने कहा,

    "केंद्र सरकार का रुख प्रतिकूल नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा कि एडहॉक न्यायाधीशों को नियमित नियुक्तियों के बाद ही नियुक्त किया जा सकता है।

    पीठ ने हालांकि एएसजी द्वारा उन्नत इस प्रस्ताव की शुद्धता के बारे में संदेह व्यक्त किया।

    न्यायमूर्ति एसके कौल ने एएसजी से पूछा,

    "आप कह रहे हैं कि पहले नियमित रिक्ति को भरा जाना चाहिए और फिर एडहॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति की जानी चाहिए?"

    एएसजी ने उत्तर दिया,

    "यह विधायी आशय है।"

    "अगर सभी रिक्तियों को भर दिया जाता है, तो कोई समस्या नहीं होगी। जहां तक ​​एडहॉक न्यायाधीशों का सवाल है, विचार यह है कि वे रिक्त पदों को भरने तक काम करते रहेंगे। मुझे बताया गया था कि हाईकोर्ट न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट के बराबर करने के लिए एक विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था। न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि कुछ ऐसा है जिसके बारे में हमें सोचना है कि हाईकोर्ट न्यायाधीशों की आयु 65 वर्ष से अधिक हो।

    इस बिंदु पर, सीजेआई ने पूछा कि क्या संविधान के अनुच्छेद 224A में कुछ भी है जो बताता है कि रिक्त पदों को भरने के बाद ही एडहॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति की जा सकती है।

    सीजेआई ने पूछा,

    "क्या आप हमें संविधान में कोई प्रावधान दिखा सकते हैं जो यह दर्शाता है कि सभी नियमित रिक्तियों को भरने तक एडहॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं की जानी चाहिए। अनुच्छेद में ऐसा क्या है जिससे पता चलता है कि आपको पहले नियमित रिक्तियों को भरना होगा और फिर एडहॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी होगी?"

    सीजेआई ने यह भी टिप्पणी की कि सभी नियमित रिक्तियों को भरना एक ऐसी स्थिति है जो देश में कभी नहीं हुई है।

    जवाब में, एएसजी ने कहा,

    "यदि रिक्तियां भरी जाती हैं, तो सीजेआई न्यायाधीशों की कोई आवश्यकता नहीं होगी। अन्यथा नियमित न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करने और केवल सीजेआई न्यायाधीशों को नियुक्त करने के लिए एक प्रोत्साहन होगा।"

    इस तर्क पर सवाल उठाते हुए, न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि,

    "मुझे समझ में नहीं आता, क्या प्रोत्साहन? आपका तर्क बहुत खतरनाक है। ऐसा नहीं है कि मौजूदा नियुक्तियां नहीं चल सकती हैं। एडहॉक न्यायाधीश अंतरिम अवधि से निपटने के लिए उच्च न्यायालय की मदद करने के लिए है। यह एक प्रावधान है कि आप जो कह रहे हैं, उसका उल्टा इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

    एएसजी सूरी ने तब कहा था कि एडहॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कुछ कदम उठाए जाने हैं। हाईकोर्ट का सीजे किसी भी समय राष्ट्रपति की पहले सहमति से, किसी भी हाईकोर्ट के पूर्व जज से उस अदालत के न्यायाधीश के रूप में बैठने का अनुरोध कर सकते हैं।

    पूर्व न्यायाधीश की सहमति प्राप्त करने के बाद, मुख्य न्यायाधीश को इस मामले को मुख्यमंत्री को भेजना चाहिए। एएसजी ने कहा कि मुख्यमंत्री केंद्रीय कानून मंत्री को प्रस्ताव भेजेंगे।

    जब एएसजी इस प्रक्रिया की व्याख्या कर रहे थे, बोबडे ने कहा कि इन दलीलों को एक हलफनामे के जरिये रिकॉर्ड में डालना होगा।

    उड़ीसा उच्च न्यायालय के लिए पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी दातार ने कहा कि एएसजी जजों की नियुक्ति के लिए केंद्र द्वारा तैयार किए गए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के पैरा 24 का जिक्र कर रहे थे।

    पीठ ने विभिन्न उच्च न्यायालयों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं से एक बैठक बुलाने और उन परिस्थितियों पर चर्चा करने के लिए कहा, जिनके तहत अनुच्छेद 224 ए के तहत एडहॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति की जा सकती है।इस मामले पर अगले गुरुवार, 15 अप्रैल को विचार किया जाएगा।

    पीठ गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) याचिका पर विचार कर रही थी, जिसमें लंबित मामलों को तय करने के लिए उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों की सेवाओं का उपयोग करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 224 ए को शामिल करने की मांग की गई है।

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