'आरोपी को लगभग 14 महीनों तक ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया': सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस और गया कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा

  • आरोपी को लगभग 14 महीनों तक ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस और गया कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा

    सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि राज्य सरकार 'गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत आरोपी व्यक्ति को लगभग 14 महीनों तक ट्रायल कोर्ट के सामने पेश करने में विफल रही। इसके चलते उस पर आरोप तय (Charges Framed) नहीं किए जा सके। राज्य सरकार ने खुद अपने हलफनामे में माना है कि यह देरी इसलिए हुई, क्योंकि आरोपी को जेल से कोर्ट में पेश नहीं किया गया।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने सवाल किया कि आरोपी को लगभग 14 महीनों तक ट्रायल कोर्ट के सामने क्यों नहीं पेश किया गया और उस पर आरोप क्यों तय नहीं किए गए?

    कोर्ट ने जांच अधिकारी से भी इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा कि आरोपी को पेश क्यों नहीं किया गया। साथ ही पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट (गया कोर्ट) से इस मामले में एक रिपोर्ट मंगवाएं।

    कोर्ट ने कहा,

    "मामले के जांच अधिकारी को इस कोर्ट के सामने रिपोर्ट पेश करनी होगी, जिसमें यह बताया जाए कि याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश न करने का असली कारण क्या था। जैसा कि पहले बताए गए हलफनामे से पता चलता है, इसी वजह से उस पर आरोप तय नहीं हो पाए... साथ ही हम हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से कहते हैं कि वे संबंधित ट्रायल कोर्ट से इस घटनाक्रम के बारे में रिपोर्ट लें। यह रिपोर्ट 15 नवंबर, 2026 तक एक सीलबंद लिफाफे में इस कोर्ट की रजिस्ट्री के पास जमा की जानी चाहिए।"

    यह मामला तब सामने आया, जब पटना हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने से इनकार करने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई हो रही थी। याचिकाकर्ता पर UAPA, IPC, विस्फोटक अधिनियम (Explosives Act) और शस्त्र अधिनियम (Arms Act) के तहत अपराध करने का आरोप है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि याचिकाकर्ता नक्सली समूह का सक्रिय सदस्य है और एक छापेमारी के दौरान उसके और अन्य लोगों के पास से कई आपत्तिजनक चीजें बरामद की गई थीं।

    याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि राज्य सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में यह स्वीकार किया कि आरोप इसलिए तय नहीं किए जा सके, क्योंकि याचिकाकर्ता (आरोपी) को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश ही नहीं किया गया।

    कोर्ट ने दर्ज किया कि राज्य सरकार के वकील यह नहीं बता पाए कि याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के सामने क्यों नहीं पेश किया गया, या उस पर आरोप क्यों तय नहीं किए गए।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    "बिहार राज्य की ओर से पेश वकील मिस्टर अक्षय अमृतांशु यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि लगभग 14 महीनों की अवधि के दौरान—यानी 10 मई 2025 (जब याचिकाकर्ता ने सरेंडर किया था) से लेकर 29 जुलाई 2025 (जब सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई) तक—याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के सामने क्यों नहीं पेश किया गया, और अब तक आरोप (चार्ज) क्यों तय नहीं किए गए? वास्तव में, यदि हलफनामे में दी गई जानकारी सही है, तो यह हैरानी की बात है कि ट्रायल कोर्ट ने भी याचिकाकर्ता को अपने सामने पेश करने का निर्देश नहीं दिया!"

    यह जानकारी मिलने के बाद कि मुख्य आरोपी को जमानत मिल चुकी है, अदालत ने यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता का मामला मुख्य आरोपी के मामले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में है, याचिकाकर्ता को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

    इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को तय की गई।

    Case Title : DEV KUMAR PASWAN VERSUS STATE OF BIHAR

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