2017 स्कूल हेडमिस्ट्रेस रेप-मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार की बरी करने के खिलाफ अपील खारिज की

Shahadat

22 April 2026 7:46 PM IST

  • 2017 स्कूल हेडमिस्ट्रेस रेप-मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार की बरी करने के खिलाफ अपील खारिज की

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में असम सरकार द्वारा गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज की, जिसमें 2017 के एक स्कूल हेडमिस्ट्रेस के रेप और मर्डर केस में आरोपी को बरी किया गया था।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें आरोपी मोइनुल हक को मर्डर और रेप के आरोपों से बरी करने के फैसले को सही ठहराया गया। बेंच ने सबूत मिटाने के आरोप में हाई कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई सज़ा भी रद्द की।

    बरामदगी और पहचान में खामियां

    यह मामला असम में एक स्कूल हेडमिस्ट्रेस के जघन्य मर्डर से जुड़ा है, जिसका शव एक बैग में छिपा हुआ मिला था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपी (प्रतिवादी) इस अपराध में शामिल था।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को मर्डर (IPC की धारा 302) और रेप (IPC की धारा 376A) के आरोपों में दोषी ठहराया और उसे मौत की सज़ा सुनाई, जिसे बाद में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने IPC की धारा 201 (सबूत मिटाना) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखा, लेकिन सज़ा कम की। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    आरोपी के खिलाफ पूरा मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित था, जिसमें एकमात्र दोषी कड़ी एक काली छतरी की बरामदगी थी, जिसके बारे में दावा किया गया कि वह मृतका की थी। दावा किया गया कि यह बरामदगी भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत दिए गए एक खुलासे के बयान के आधार पर की गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपी से छतरी की कथित बरामदगी में गंभीर खामियां थीं।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित तौर पर दोषी ठहराने वाले सामान की बरामदगी, जिसके बारे में कहा गया कि वह साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत किए गए खुलासे के आधार पर की गई, उस पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता, जब तक कि उस सामान को सीलबंद न रखा गया हो और उसकी ठीक से पहचान न की गई हो।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह टिप्पणी की,

    “जांच अधिकारी द्वारा अपनाई गई पहचान प्रक्रिया—यानी, मृतक के परिवार वालों को बस पुलिस स्टेशन बुलाकर उनसे यह पूछना कि क्या यह छाता मृतक का है—चीज़ों की पहचान के लिए तय प्रक्रिया का साफ़ उल्लंघन है। आम तौर पर बरामद चीज़ को सील किया जाना चाहिए था और पहचान के लिए टेस्ट परेड (Test Identification Parade) मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में की जानी चाहिए थी ताकि पहचान की प्रक्रिया पर कोई सवाल न उठ सके।”

    अपील खारिज करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में यह कहा गया कि जांच एजेंसी की यह ज़िम्मेदारी है कि वह किसी भी बरामद चीज़ को सील करे, जिसके बारे में यह आरोप हो कि वह अपराध से जुड़ी है। कोर्ट ने कहा कि चीज़ को सील करने और मजिस्ट्रेट के सामने पहचान परेड कराने के बजाय ट्रायल कोर्ट ने इस बरामदगी को 'साक्ष्य अधिनियम' (Evidence Act) की धारा 27 के तहत वैध मानने में गलती की।

    कोर्ट ने कहा,

    “हमारा यह पक्का मानना ​​है कि न तो छाते की बरामदगी कानून के मुताबिक साबित हुई, और न ही उसकी पहचान इतनी भरोसेमंद है कि उसे आरोपी-प्रतिवादी या अपराध से जोड़ा जा सके।”

    इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि छाता घटना के 14 दिन बाद बरामद हुआ था; यह एक और अहम वजह थी जिससे अभियोजन पक्ष का मामला कमज़ोर पड़ा—खासकर इसलिए, क्योंकि उनका पूरा मामला केवल 'परिस्थितिजन्य साक्ष्यों' (Circumstantial Evidence) पर आधारित है।

    कोर्ट ने कहा,

    “बरामदगी में 14 दिन का इतना बड़ा अंतर बरामदगी की प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करता है।”

    प्रतिवादी को फंसाने वाले एक 'सह-आरोपी' (Co-Accused) की गवाही पर राज्य सरकार का भरोसा खारिज करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि सह-आरोपी के इकबालिया बयान का कानूनी महत्व बहुत कम होता है, और बिना किसी मज़बूत पुष्टि के, केवल उसी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

    बेंच ने उन स्थापित सिद्धांतों का सहारा लिया, जो परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों पर लागू होते हैं। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी को दोषी ठहराने से पहले परिस्थितियों की पूरी कड़ी (Chain of Circumstances) का पूरा होना ज़रूरी है, और यह भी ज़रूरी है कि ऐसी कोई भी संभावना बाकी न रहे जो आरोपी के निर्दोष होने की ओर इशारा करती हो।

    खास बात यह है कि कोर्ट ने आरोपी को 'IPC की धारा 201' (सबूत मिटाने) के तहत मिली सज़ा भी रद्द की—भले ही आरोपी ने उस सज़ा के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं की थी।

    बेंच ने यह साफ किया कि आरोपी द्वारा अपील न किए जाने का मतलब यह नहीं है कि 'अपीलीय अदालत' (Appellate Court) के पास न्याय के हित में किसी गलत सज़ा सुधारने का अधिकार नहीं रह जाता।

    Cause Title: THE STATE OF ASSAM VERSUS MOINUL HAQUE @ MONU

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