1990 Kashmir University VC Murder Case | सुप्रीम कोर्ट ने बरी किए गए लोगों के खिलाफ CBI की अपील खारिज की

  • 1990 Kashmir University VC Murder Case | सुप्रीम कोर्ट ने बरी किए गए लोगों के खिलाफ CBI की अपील खारिज की

    सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स लिबरेशन फ्रंट द्वारा 1990 में कश्मीर यूनिवर्सिटी के कुलपति और उनके निजी सचिव के अपहरण और हत्या के मामले में सात व्यक्तियों को बरी किए जाने को चुनौती देने वाली CBI द्वारा दायर अपील खारिज की।

    कोर्ट ने विश्वसनीय साक्ष्यों की कमी और इकबालिया बयान दर्ज करने में प्रक्रियागत खामियों का हवाला देते हुए आरोपियों को बरी किए जाने की पुष्टि की।

    कोर्ट ने माना कि इकबालिया बयान अविश्वसनीय है और आतंकवाद और विघटनकारी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम के तहत प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों को पूरा करने में विफल रहे, क्योंकि रिकॉर्डिंग अधिकारी इकबालिया बयान लेते समय आरोपियों की स्वैच्छिकता सुनिश्चित करने में विफल रहे।

    जस्टिस ए. एस. ओक और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने कहा,

    "यह वास्तव में दुखद है कि इस मामले में जांच और सुनवाई किस तरह से हुई, जहां पीड़ितों और आरोपियों दोनों के लिए सत्य और न्याय मायावी रहा। यह व्यर्थ नहीं है कि ऐसे कठोर प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया।"

    न्यायालय ने कहा कि अभियुक्तों के बयानों में स्वीकारोक्ति दर्ज करने का समय नहीं था या यह संकेत नहीं था कि उन्हें कहां से पेश किया गया। न्यायालय ने यह भी कहा कि स्वीकारोक्ति बयानों की रिकॉर्डिंग से पहले अभियुक्तों को विचार-विमर्श के लिए कोई समय नहीं दिया गया, जिससे उक्त बयानों में गड़बड़ी हुई।

    इसने आगे कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि बयान दर्ज करने वाले गवाह को ऐसा करने का अधिकार था। न्यायालय ने माना कि टाडा के तहत स्वीकारोक्ति बयानों की रिकॉर्डिंग के संबंध में करतार सिंह फैसले में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया।

    "करतार सिंह (सुप्रा) का कहना है कि स्वीकारोक्ति को स्वतंत्र माहौल में दर्ज किया जाना चाहिए। भारी सुरक्षा वाले BSF कैंप या JIC में इकबालिया बयान दर्ज करना, जहां आरोपी के लिए माहौल आम तौर पर डरावना और दबंग होता है, उसे स्वतंत्र माहौल में दर्ज नहीं किया जा सकता। यह रिकॉर्ड में आया है कि इस तरह दर्ज किए गए इकबालिया बयानों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने स्वीकार नहीं किया, जिसके बाद उन्हें सीधे विशेष अदालत में भेज दिया गया, जो फिर से कानून का उल्लंघन है।"

    अदालत ने अफसोस जताया,

    "प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।"

    अदालत ने कहा कि विशेष अदालत ने यह टिप्पणी करने से परहेज किया कि यह शक्ति और अधिकार के दुरुपयोग का मामला है। प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की पूरी तरह से अवहेलना की गई।

    अदालत ने यह भी कहा कि हत्या के हथियार (एके-47 राइफल) को बरामद करने में विफलता ने अभियोजन पक्ष के मामले को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया, जिससे फोरेंसिक साक्ष्य कमजोर हो गए। फोरेंसिक गवाह ने गवाही दी कि उसने वह एके-47 राइफल नहीं देखी, जिससे कारतूस दागे गए। न्यायालय ने रेखांकित किया कि गवाह आरोपी की पहचान नहीं कर सके, जिससे उनकी गवाही अविश्वसनीय हो गई। गवाहों ने अपहरणकर्ताओं को मूंछ वाले युवक बताया, लेकिन उन्हें पहचान नहीं पाए।

    केस-टाइटल: राज्य (सीबीआई) बनाम मोहम्मद सलीम जरगर @ फैयाज और अन्य

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