अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या हानिकारक उपचार का संरक्षण? चिलीज निर्णय पर एक आलोचनात्मक दृष्टि
Sinha Anish
18 May 2026 10:49 PM IST

अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने 2026 में चिलीज बनाम सालजर मामले में 8-1 के बहुमत से एक ऐसा निर्णय सुनाया जिसने न केवल LGBTQ किशोरों के अधिकारों पर प्रश्नचिह्न लगाया, बल्कि चिकित्सा पेशे पर राज्य के नियामक अधिकार की जड़ों को भी हिला दिया। यह निर्णय कोलोराडो राज्य के उस कानून को असंवैधानिक घोषित करता है जो नाबालिगों पर 'कन्वर्जन थेरेपी' अर्थात मनोवैज्ञानिक वार्तालाप के माध्यम से व्यक्ति के यौन अभिविन्यास या लैंगिक पहचान को परिवर्तित करने के प्रयास पर प्रतिबंध लगाता था। प्रथम दृष्टि में यह मामला केवल एक राज्य कानून की संवैधानिकता तक सीमित प्रतीत होता है, किन्तु इसके दूरगामी निहितार्थ अत्यंत व्यापक एवं चिंताजनक हैं।
प्रथम संशोधन का विस्तार और चिकित्सीय विनियमन पर आघात
न्यायमूर्ति गोर्सच ने बहुमत की राय लिखते हुए लाइसेंसप्राप्त स्वास्थ्य पेशेवरों के शब्दों को 'देखभाल प्रदान करने के आनुषंगिक भाषण' के स्थान पर 'दृष्टिकोण-आधारित अभिव्यक्ति' के रूप में पुनर्परिभाषित किया। इस पुनर्परिभाषा का व्यावहारिक अर्थ यह है कि जो पहले 'चिकित्सीय आचरण' माना जाता था, उसे अब उच्चतम संवैधानिक संरक्षण प्राप्त 'भाषण' माना जाएगा। परिणामस्वरूप, न्यायालय ने समीक्षा का मानक 'सम्भावित रूप से संवैधानिक' से बदलकर 'सम्भावित रूप से असंवैधानिक' कर दिया, एक ऐसा परिवर्तन जो व्यवहार में लगभग किसी भी विनियमन को अस्तित्वहीन बना देता है।
न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय NIFLA बनाम बेसरा (2018) पर आधारित होकर यह स्थापित किया कि कोलोराडो का कानून 'दृष्टिकोण-विभेद' करता है, क्योंकि वह यौन अभिविन्यास की पुष्टि करने वाली चिकित्सा की अनुमति देता है परन्तु उसे परिवर्तित करने वाली चिकित्सा पर रोक लगाता है। यह तर्क सतह पर तो तार्किक प्रतीत होता है, किन्तु इसमें एक मौलिक भ्रांति यह है कि न्यायालय 'हानिकारक उपचार के निषेध' को 'विचार के निषेध' के समान मान रहा है।
न्यायमूर्ति जैक्सन का असहमति पत्र: एक ऐतिहासिक चेतावनी
न्यायमूर्ति जैक्सन की एकमात्र असहमति इस निर्णय की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विधिक टिप्पणी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि NIFLA निर्णय स्वयं यह स्वीकार करता है कि राज्य 'चिकित्सीय उपचार के प्रयोजन से बोले गए भाषण को उचित रूप से विनियमित कर सकते हैं।' न्यायमूर्ति जैक्सन के अनुसार, संविधान राज्य को इसलिए नहीं निःशक्त करता कि 'घटिया देखभाल स्केलपेल के बजाय भाषण के माध्यम से दी जाती है।' उनका यह कथन विधि के एक मूलभूत सिद्धांत को रेखांकित करता है कि यदि कोई कृत्य हानिकारक है, तो उसे भाषण का जामा पहनाकर संरक्षित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति जैक्सन ने इस निर्णय को 'खतरनाक कीड़ों का डिब्बा खोलने' की संज्ञा दी। उनका आशय स्पष्ट है कि जब एक बार चिकित्सीय मानकों को 'मत की अभिव्यक्ति' के रूप में पुनर्परिभाषित कर दिया जाए, तो प्रत्येक देखभाल मानक को इसी तर्क से चुनौती दी जा सकती है। उन्होंने ये भी माना कि आज शायद ही ये महज कन्वर्जन थेरेपी का मामला हो पर कल शल्यचिकित्सा की सहमति आवश्यकताएँ और परसों नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम के प्रोटोकॉल, इन सब पर यही तर्क लागू किया जा सकेगा।
राज्य के 'पेरेन्स पैट्रिए' अधिकार और बच्चों की स्वायत्तता की उपेक्षा
यह निर्णय राज्य के उस मौलिक अधिकार को भी कुंठित करता है जिसे 'पेरेन्स पैट्रिए' कहते हैं, अर्थात राज्य का यह दायित्व कि वह उन बच्चों की रक्षा करे जो स्वयं अपनी रक्षा करने में असमर्थ हैं। प्रिंस बनाम मेसाचुसेट्स (1944) में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह स्थापित किया था कि राज्य की यह शक्ति माता-पिता की असहमति के बावजूद बच्चों को हानि से बचाने तक विस्तृत है। चिलीज निर्णय इस सिद्धांत को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर देता है जब हानि 'वार्तालाप' के रूप में प्रस्तुत होती है।
इससे भी गम्भीर बात यह है कि बहुमत के निर्णय में बच्चे को एक स्वतंत्र अधिकारधारी के रूप में मान्यता ही नहीं दी गई। पूरा विश्लेषण चिकित्सक के प्रथम संशोधन अधिकारों पर केंद्रित है। वह किशोर जिस पर यह चिकित्सा की जाएगी, उसकी गरिमा, उसकी मनोवैज्ञानिक सुरक्षा, उसका स्वयं का दृष्टिकोण, ये सब बहुमत की राय में लगभग अनुपस्थित हैं।
यह एक ऐसी विधिक संरचना है जो शक्तिशाली (चिकित्सक) को कमजोर (बच्चे) से अधिक संरक्षण देती है।
स्क्रमेटी निर्णय से विरोधाभास और न्यायालय की असंगति उजागर
चिली निर्णय को 2025 के यूनाइटेड स्टेट्स बनाम स्क्रमेटी निर्णय के साथ पढ़ने पर एक विचारोत्तेजक विरोधाभास सामने आता है। स्क्रमेटी में न्यायालय ने टेनेसी को नाबालिगों के लिए लिंग-पुष्टि करने वाली चिकित्सा पर रोक लगाने की अनुमति दी, भले ही इस चिकित्सा को चिकित्सा विशेषज्ञों का व्यापक समर्थन प्राप्त था।
वहाँ न्यायालय ने राज्य को चिकित्सा सहमति के बारे में अपना निर्णय लेने का अधिकार दिया। किन्तु चिली में, जहाँ चिकित्सा सहमति इसी बात पर है कि कन्वर्जन थेरेपी हानिकारक है, न्यायालय ने कोलोराडो का यही निर्णय अस्वीकार कर दिया।
दोनों मामलों में बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न था, दोनों में चिकित्सा विशेषज्ञता का प्रश्न था और दोनों में राज्य के विनियामक अधिकार का प्रश्न था फिर भी परिणाम परस्पर विरोधी रहे। यह असंगति इस सत्य को उजागर करती है जिसकी ओर निर्णय के आलोचक संकेत कर रहे हैं, कि न्यायालय का निर्णय साक्ष्य से नहीं, वरन् उस परिणाम से निर्देशित होता है जिसे वह प्राप्त करना चाहता है।
बहुमत ने बक बनाम बेल (1927), जो अनिवार्य नसबंदी को उचित ठहराने वाला कुख्यात निर्णय है, का उल्लेख किया और कहा कि पेशेवर सहमति पर आँख मूँदकर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। यह उद्धरण ही इस निर्णय की मानसिकता को प्रकट करता है कि एक ऐसे मामले में जहाँ व्यापक चिकित्सा सहमति बच्चों की सुरक्षा के पक्ष में है, न्यायालय उसी सहमति पर संदेह करने के लिए एक अत्यंत विवादास्पद ऐतिहासिक उदाहरण का सहारा लेता है।
भारतीय विधिक परिप्रेक्ष्य और चिलीज से हमें क्या सीखना चाहिए?
यह निर्णय भारतीय विधिक चिंतन के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) में धारा 377 के संदर्भ में पहले ही यह स्थापित कर चुका है कि यौन अभिविन्यास व्यक्ति की अन्तरंग पहचान का अविभाज्य अंग है और इसे राज्य या समाज द्वारा 'सुधारने' का कोई अधिकार नहीं है। इसी आधार पर भारत में कन्वर्जन थेरेपी के विरुद्ध कई याचिकाएँ न्यायालयों में लंबित हैं।
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और इंडियन साइकिएट्रिक सोसाइटी (ICS) दोनों ने कन्वर्जन थेरेपी को न केवल अप्रभावी बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से हानिकारक घोषित किया है। यदि भारत में भी किसी चिकित्सक द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सहारा लेकर ऐसी 'चिकित्सा' को जारी रखने का प्रयास किया जाए, तो चिली निर्णय एक खतरनाक नजीर के रूप में उद्धृत किया जा सकता है। भारतीय न्यायालयों को इस विरोधाभास के प्रति सचेत रहना होगा।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 केवल 'जीवन और दैहिक स्वतंत्रता' की ही नहीं बल्कि 'गरिमा के साथ जीवन' की भी ज़िम्मेदारी लेता है और ये के.से. पुत्तास्वामी बनाम भारत संघ (2017) और अन्य कई कानूनी मामले में स्थापित हो चुका है। इस गरिमा की अवधारणा में यह निहित है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह चिकित्सक हो या माता-पिता, किसी बच्चे की लैंगिक पहचान को 'ठीक करने' के नाम पर उस पर मनोवैज्ञानिक आघात नहीं पहुँचा सकता। Chiles निर्णय इस गरिमा-न्यायशास्त्र के ठीक विपरीत खड़ा है।
निर्णय की विधिक अनिश्चितता और समस्या
चिली निर्णय की सबसे गम्भीर विधिक समस्या यह है कि यह कोई स्पष्ट सिद्धांत स्थापित नहीं करता। न्यायालय ने न तो यह बताया कि कौन से चिकित्सीय विनियमन अब भी वैध हैं, न ही यह कि 'भाषण के माध्यम से दी गई देखभाल' और 'शुद्ध भाषण' के बीच की रेखा कहाँ खींची जाए। इस अनिश्चितता में, प्रत्येक देखभाल मानक को अब 'राय' कहकर चुनौती दी जा सकती है।
संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी के प्रोटोकॉल, नशा-उपचार परामर्श के दिशा-निर्देश या आत्महत्या रोकथाम के मानक, इन सभी को अब 'दृष्टिकोण-आधारित भाषण' कहकर प्रथम संशोधन की आड़ में चुनौती देना सम्भव हो गया है। यह केवल LGBTQ समुदाय की समस्या नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक संकट है।
निष्कर्ष की संविधान बच्चों का सेवक है, उनका शत्रु नहीं
चिली बनाम सालाजार एक ऐसा निर्णय है जो संविधान की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की गारंटी को एक ऐसे हथियार में बदल देता है जो कमजोर बच्चों के विरुद्ध प्रयुक्त होता है। यह वह संवैधानिक दर्शन नहीं है जिसकी परिकल्पना अमेरिका के संस्थापकों ने की थी और न ही यह वह न्यायशास्त्र है जिसे किसी भी लोकतांत्रिक समाज को अपना आदर्श मानना चाहिए।
जैकब्सन बनाम मेसाचुसेट्स (1905) से लेकर प्रिंस बनाम मैसाचुसेट (1944) तक, अमेरिकी विधिशास्त्र की एक सुदृढ़ परम्परा रही है कि राज्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए वैज्ञानिक असहमति के बावजूद भी कार्य करने का अधिकार है। ऐसे में चिली ने इस परम्परा को एक झटके में तोड़ दिया और इसका मूल्य वे बच्चे चुकाएँगे जिनकी आवाज़ इस न्यायालय तक पहुँच ही नहीं पाई।
न्यायमूर्ति जैक्सन के शब्दों में यह निर्णय 'राज्यों की चिकित्सा देखभाल प्रदान करने को किसी भी रूप में विनियमित करने की क्षमता को बाधित करने की धमकी देता है। यह संविधान को पूरी तरह से तर्कहीन तरीके से अज्ञात क्षेत्र में विस्तारित करता है और यह अंततः अमेरिकियों के स्वास्थ्य और कल्याण को गम्भीर नुकसान पहुँचाने का जोखिम उठाता है।'
यह चेतावनी केवल अमेरिका के लिए नहीं है बल्कि यह उस प्रत्येक लोकतंत्र के लिए है जहाँ न्यायालय और विधायिका बच्चों की सुरक्षा एवं पेशेवर स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही है।
लेखक अधिवक्ता एवं विधिक शोधकर्ता हैं

