सुप्रीम कोर्ट ने क्यों माना कि ऑनलाइन गेमिंग पर रोक लगाने वाले राज्यों के कानून 'पब्लिक ऑर्डर' के दायरे में आते हैं?
Shahadat
4 Jun 2026 3:00 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 1 के तहत 'सार्वजनिक व्यवस्था' (Public Order) के तत्वों की व्याख्या की और यह फैसला सुनाया कि राज्य ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों को विनियमित करने और उन पर रोक लगाने के लिए सार्वजनिक व्यवस्था पर अपनी विधायी शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए यह माना कि संवैधानिक अभिव्यक्ति "सार्वजनिक व्यवस्था" केवल दंगों, हिंसा या राज्य की सुरक्षा के लिए खतरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सामाजिक और आर्थिक अव्यवस्थाओं तक भी फैली हुई, जो समुदाय के सामान्य जीवन को बाधित करती हैं।
अदालत ने यह टिप्पणी तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों की वैधता को बरकरार रखते हुए की, जो ऑनलाइन सट्टेबाजी और दांव लगाने की गतिविधियों को विनियमित करते हैं।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि "सार्वजनिक व्यवस्था" अभिव्यक्ति की भारतीय अदालतों द्वारा लगातार व्यापक व्याख्या की गई। रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य मामले में संविधान पीठ के निर्णय का हवाला देते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि सार्वजनिक व्यवस्था का अर्थ किसी राजनीतिक समाज के सदस्यों के बीच व्याप्त उस शांतिपूर्ण स्थिति से है, जो सरकार द्वारा लागू किए गए आंतरिक नियमों के परिणामस्वरूप बनी रहती है।
सार्वजनिक व्यवस्था में सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक सुविधा और सार्वजनिक हित शामिल हैं।
अदालत ने पिछले उन निर्णयों पर प्रकाश डाला, जिनमें यह माना गया कि सार्वजनिक व्यवस्था में स्वास्थ्य और सुविधा की सुरक्षा भी शामिल है। स्टेट ऑफ़ राजस्थान बनाम जी. चावला मामले का हवाला देते हुए—जिसमें लाउडस्पीकरों पर लगाए गए प्रतिबंधों को सही ठहराया गया—अदालत ने टिप्पणी की कि सार्वजनिक व्यवस्था केवल हिंसा को रोकने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उन गतिविधियों को रोकने तक भी फैली हुई, जो समुदाय की शांति, स्वास्थ्य, सुविधा और शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए हानिकारक हैं।
अदालत ने यह अवलोकन किया कि राज्यों के पास सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जो शक्ति है, उसमें उन गतिविधियों को रोकने की शक्ति भी शामिल है जिनसे व्यापक सामाजिक नुकसान या सार्वजनिक उपद्रव उत्पन्न होता है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि सार्वजनिक व्यवस्था के दायरे में सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक शांति और सार्वजनिक हित आते हैं। मधु लिमये बनाम उप-विभागीय मजिस्ट्रेट मामले में दिए गए निर्णय का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था का दायरा इतना व्यापक है कि इसमें सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक कल्याण के लिए उत्पन्न होने वाले खतरे भी शामिल हो जाते हैं।
अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा एस. भगवती बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में दिए गए निर्णय का भी सहारा लिया, जिसमें यह माना गया कि सार्वजनिक व्यवस्था को केवल दंगों, विद्रोहों या हिंसक अपराधों के संदर्भ में ही नहीं समझा जाना चाहिए। इसके दायरे में समाज का सुचारू रूप से कार्य करना और वे परिस्थितियां भी आती हैं, जो नागरिकों को अपने जीवन की सामान्य गतिविधियों को शांतिपूर्वक ढंग से संचालित करने में सक्षम बनाती हैं। हाईकोर्ट ने यह माना कि आर्थिक क्षेत्र में होने वाली गड़बड़ियां 'सार्वजनिक व्यवस्था' (Public Order) का उल्लंघन तब मानी जा सकती हैं, जब वे समाज के सुचारू रूप से चलने में बाधा डालती हैं।
सार्वजनिक व्यवस्था के लिए कसौटियां
सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे फ़ैसलों का हवाला दिया, जिनमें यह समझाया गया कि 'सार्वजनिक व्यवस्था' किस तरह आम 'कानून-व्यवस्था' (Law and Order) से अलग होती है। 'अरुण घोष बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' मामले में तय किए गए सिद्धांत को दोहराते हुए कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि असली कसौटी यह है कि क्या कोई काम "समुदाय के जीवन की सामान्य गति" (even tempo of life of the community) में बाधा डालता है। कोर्ट ने कहा कि कानून का हर उल्लंघन कानून-व्यवस्था पर असर डालता है, लेकिन केवल वही काम 'सार्वजनिक व्यवस्था' में गड़बड़ी माने जाते हैं, जिनके समाज पर दूरगामी और व्यापक असर पड़ते हैं।
कोर्ट ने 'राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य' मामले में विकसित किए गए "संकेन्द्रित वृत्त" (Concentric Circles) के सिद्धांत का भी ज़िक्र किया। इस सिद्धांत के अनुसार, "कानून-व्यवस्था" सबसे बड़ा वृत्त है; इसके भीतर "सार्वजनिक व्यवस्था" एक छोटा वृत्त बनाती है। "राज्य की सुरक्षा" सबसे संकरा या छोटा वर्ग है। कोई काम कानून-व्यवस्था पर असर डाल सकता है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह सार्वजनिक व्यवस्था पर भी असर डाले। ठीक वैसे ही कोई काम सार्वजनिक व्यवस्था पर असर डाल सकता है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह राज्य की सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा करे।
कोर्ट ने पिछले मामलों में विकसित किए गए "संभाव्यता परीक्षण" (Potentiality Test) पर ज़ोर दिया। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी काम की प्रकृति या स्वरूप ही सब कुछ तय नहीं करता; बल्कि, समाज पर पड़ने वाला उसका संभावित असर ज़्यादा मायने रखता है। कोई ऐसा काम, जो भले ही किसी एक व्यक्ति को लक्ष्य करके किया गया हो, फिर भी वह 'सार्वजनिक व्यवस्था' पर असर डाल सकता है—बशर्ते उसके परिणाम व्यापक समुदाय तक पहुँचते हों और सामान्य सामाजिक जीवन में बाधा डालते हों।
सार्वजनिक व्यवस्था के तत्व
अदालत ने सार्वजनिक व्यवस्था के निम्नलिखित तत्व निकाले –
“1) एक राजनीतिक समाज के सदस्यों के बीच शांति की वह स्थिति, जो सरकार द्वारा लागू किए गए आंतरिक नियमों के परिणामस्वरूप बनी रहती है।
2) अव्यवस्था की अनुपस्थिति।
3) शांतिपूर्ण, व्यवस्थित सामाजिक अस्तित्व की एक सकारात्मक स्थिति, जो सामान्य नागरिक जीवन को संभव बनाती है।
4) सार्वजनिक व्यवस्था समाज और समुदाय की एक व्यवस्थित स्थिति को दर्शाती है, जिसमें नागरिक शांतिपूर्वक अपने जीवन की सामान्य गतिविधियों को जारी रख सकते हैं।
5) सार्वजनिक व्यवस्था किसी इलाके में जीवन की "एकसमान गति" में परिलक्षित होती है। इसलिए, ऐसा आचरण जो इस एकसमान गति को बनाए रखता है या सुरक्षित करता है, वह सार्वजनिक व्यवस्था के विनियमन के दायरे में आता है।
6) सार्वजनिक सुरक्षा या हित को, संदर्भ के आधार पर सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के संबंध में वैध रूप से invoked किया जा सकता है, ताकि सार्वजनिक व्यवस्था को संरक्षित करने वाली विधायी कार्रवाई का समर्थन किया जा सके।
7) सार्वजनिक व्यवस्था "कानून और व्यवस्था" के सबसे व्यापक दायरे और "राज्य की सुरक्षा" के सबसे संकीर्ण दायरे के बीच एक संवैधानिक स्थिति रखती है; यह व्यक्तिगत अशांतियों के बजाय व्यापक सामाजिक प्रभाव को दर्शाती है, लेकिन राज्य की सुरक्षा के लिए खतरों की तुलना में इसका परिमाण कम होता है।”
अदालत ने माना कि सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान या अशांति निम्नलिखित स्थितियों में उत्पन्न होती है –
“1) कोई कार्य सार्वजनिक व्यवस्था में तब व्यवधान डालता है, जब वह केवल किसी एक व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने के बजाय, समुदाय के जीवन की वर्तमान या एकसमान गति को प्रभावित करता है।
2) जब किसी कार्य के परिणाम समुदाय के बड़े वर्गों तक फैल जाते हैं, जिससे कानून और व्यवस्था का और अधिक उल्लंघन भड़कता है या सांप्रदायिक भावनाएँ उत्तेजित होती हैं तो सार्वजनिक व्यवस्था भंग हो जाती है।
3) ऐसी गतिविधियां जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं या स्पष्ट रूप से उपद्रव (nuisance) का रूप लेती हैं, वे सार्वजनिक व्यवस्था के तहत राज्य की सक्षमता के दायरे में पूरी तरह से आती हैं।
4) ऐसी गतिविधियां जो दूसरों के स्वास्थ्य, शांति और आराम को नुकसान पहुंचाती हैं।
5) यदि कोई चीज़ समुदाय के जीवन की धारा को बाधित करती है, और केवल किसी एक व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती है।
6) ऐसा आचरण जो समुदाय में इस हद तक भय या घबराहट पैदा करता है कि जीवन की सामान्य गतिविधियां छोड़ दी जाती हैं, वह सार्वजनिक व्यवस्था का विषय बन जाता है, भले ही वह तात्कालिक कार्य किसी विशेष व्यक्ति को लक्षित करके किया गया हो।
7) सामाजिक या आर्थिक क्षेत्रों में होने वाली ऐसी अशांतियां जो समाज के व्यवस्थित कामकाज को हिला देती हैं—जिनमें बड़े पैमाने पर होने वाली वित्तीय चूकें शामिल हैं, जो सार्वजनिक विश्वास को कमज़ोर करती हैं—वे भी सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन मानी जा सकती हैं।”
ऑनलाइन गेमिंग और सार्वजनिक व्यवस्था
अदालत ने यह टिप्पणी की कि डिजिटल युग में सार्वजनिक व्यवस्था को अशांति के पारंपरिक रूपों तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसमें इंटरनेट-आधारित गतिविधियों से होने वाले नुकसान को भी शामिल किया जाना चाहिए।
श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा,
"श्रेया सिंघल (उपर्युक्त) मामला यह स्थापित करता है कि डिजिटल युग में भी सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर ऑनलाइन अभिव्यक्ति को उन परिस्थितियों में प्रतिबंधित किया जा सकता है, जहां वह सार्वजनिक शांति के लिए स्पष्ट और तात्कालिक खतरा पैदा करती हो, तत्काल हिंसा या कानून-विरोधी कार्रवाई को उकसाती हो, अथवा कोई ऐसा वास्तविक खतरा उत्पन्न करती हो जिससे भय फैलता हो या सार्वजनिक व्यवस्था बाधित होती हो।"
उपर्युक्त सिद्धांतों को ऑनलाइन गेमिंग और जुए पर लागू करते हुए अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के परिणाम केवल इसमें शामिल व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि ये सार्वजनिक शांति और सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकते हैं। अंततः अदालत ने यह फैसला सुनाया कि तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों को "सार्वजनिक व्यवस्था" पर कानून बनाने की अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के विरुद्ध कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।
Case Title – State of Tamil Nadu & Ors. v. Junglee Games India Pvt. Ltd. & Ors. and connected cases

