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जमानत क्यों महत्वपूर्ण है: मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 की धारा 7 पर विचार

LiveLaw News Network
13 Nov 2020 2:20 PM GMT
जमानत क्यों महत्वपूर्ण है: मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 की धारा 7 पर विचार
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एडवोकेट नीमा नूर मोहम्मद, एडवोकेट जॉन एस राल्फ

जस्टिस फेलिक्स फ्रैंकफर्टर के लोकप्र‌िय उद्धरण को फिर से दोहराए जाने का समय आ गया है, जिसे मैकनाब बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका के जर‌िए कहा गया था कि "स्वतंत्रता का इतिहास, व्यापक रूप से, प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के अनुपालन का इतिहास रहा है।" हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 के धारा 5 (सी) के प्रावधानों के अनुसार इब्राहिम मोहम्‍मद इकबाल लकड़वाला बनाम महाराष्ट्र राज्य में अग्र‌िम जमानत खारिज किया जाना, याद दिलाता है कि विधायिका ने जानबूझकर और अब न्यायपालिका ने भी, सभी उचित सम्मान के साथ, संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के तहत गांरटीकृत जमानत संबंध‌ित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों में बाधा डाली है। जमानत संबंधी उक्त प्रावधान का अध्ययन मात्र इस प्रकार है "इस अधिनियम के तहत अपराध के आरोपी किसी व्यक्ति को जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा, जब तक कि मजिस्ट्रेट, आरोपी द्वारा दायर आवेदन पर और विवाहित मुस्लिम महिला की सुनने के बाद, जिसे तालाक दिया गया है, इस बात से संतुष्ट हैं कि ऐसे व्यक्ति को जमानत देने के उचित आधार हैं" यह बिलकुल स्पष्ट करता है कि विधायिका जानबूझकर जमानत संबधी न्यायशास्त्र से दूर हो गई है, अर्थात "जेल अपवाद, और जमानत नियम है"। मोती राम बनाम मध्य प्रदेश राज्य का फैसला, इस बिंदु पर, विस्तार से कहता है कि सामाजिक न्याय हमारे संविधान का सिग्नेचर ट्यून और अपनी स्वतंत्रता को खोने की कगार पर खड़ा आम आदमी सामाजिक न्याय का उपभोक्ता है।"

इस पृष्ठभूमि में आलेख को निम्न बिदुओं पर केंद्रित किया गया है-

1. जमानत की अस्वीकृति के लिए वैधानिक प्रावधानों में निहित कारणों पर विचार करना।

2. विवाह से संबंधित अपराधों में जमानत।

3. अधिनियम के अधिकारातीत प्रावधानों के माध्यम से मुस्लिम पतियों के साथ अलग व्यवहार कर, अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन।

धारा 437 सीआरपीसी के तहत ऐसे व्यक्ति को छोड़कर, सभी गैर-जमानती अपराधों में जमानत दी जा सकती है, जिसे यह मानने के लिए उचित आधार हों कि वह ऐसे अपराध का दोषी है, जिसमें मौत की सजा या आजीवन कारावास दिया जा सकता है और यदि व्यक्ति ने संज्ञेय अपराध किया है, और उसे ऐसे अपराध में दोषी करार दिया गया है, जिसमें पहले मौत की सजा, आजीवन कारावास या सात साल या उससे अधिक के कारावास की सजा दी गई थी, या उसे पहले दो या अधिक अवसरों पर गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध में दोषी ठहराया गया था। इन परिस्थितियों के लिए भी अदालत आरोपी के बीमार या दुर्बल होने पर या विशेष कारणों को साबित करने पर जमानत दे सकती है। इसलिए इस प्रावधान के अध्ययन मात्र से विधायिका की मंशा स्पष्ट होती है कि, जब तक कि न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक न समझे कि ऐसा व्यक्ति उस अपराध के समान अपराध नहीं करेगा, जिस में वह आरोपी है या जिसे करने का उसपर संदेह है, या अन्यथा न्याय के हितों में, किसी भी व्यक्ति को जमानत से इनकार नहीं किया जाएगा। जिससे यह प्रतिबिंबित होता है कि बड़े पैमाने पर समाज को कोई खतरा नहीं होने का अपवाद हो तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है।

अब यहां मुस्लिम महिलाओं (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 की धारा 7 (सी) के अध्ययन की आवश्यकता आती है, जिसने स्पष्ट रूप से सीआरपीसी में उल्लिखित उपरोक्त विचारों की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी और जमानत संबंधी न्यायशास्त्र की धारणा का उल्लंघन किया है। तात्कालिक संदर्भ में अपराध, यानी तीन तालक का उच्चारण, पूरा हो गया है और इस संबंध में आगे की जांच की आवश्यकता नहीं होगी और इसी प्रकार के अपराध के होने या साक्ष्य से छेड़छाड़ की कोई मुद्दा नहीं है। इसी प्रकार सीआरपीसी और अन्य दंड प्रावधानों से विचलित होने पर, कानून जमानत मामले में सरकारी वकील के बजाय पीड़ित पत्नी को सुनने के लिए निर्धारित करता है। यह विचलन आपराधिक न्याय प्रणाली की नींव को अस्तव्यस्त करता है, जहां पत्नी जमानत का विरोध करेगी क्योंकि वह प्रतिशोध से प्रेरित है और इस प्रकार आरोपी के विरोध करने के अधिकार को दुर्भाग्य से छीन लिया गया है।

अब अगले मुद्दे पर गौर करने की जरूरत है जो शादी से संबंधित अपराधों में जमानत का है। आईपीसी की योजना के अनुसार, केवल गंभीर अपराध जैसे दहेज हत्या (धारा 304 बी), पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (धारा 498 ए), शादी का भरोसा दिलाकर पुरुष द्वारा सहवास, जिसमें 10 साल के कारावास की सजा है, (धारा 493), गैर-जमानती हैं, बाकी सभी अपराध जमानती हैं। अब ट्रिपल तलाक देने के मौजूदा अपराध के मामले पर आते हैं, जो खुद दीवनी गलती की प्रकृति का है, से जमानत के अधिकार को हटा दिया गया है, जिससे विधायिका द्वारा जमानत कानून का मजाक उड़ाया जाता है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है, जहां कानून जीवनसाथी को समझौते के लिए समय और स्थान नहीं दे रहा है, जो कि ...इस्लामी कानून का आधार है।

अंतिम सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, वह यह है कि कैसे प्रश्नगत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के प्रसिद्ध फैसले द्वारा अनिवार्य, तर्कशीलता, निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरेगी। यह कानून मुस्लिम पतियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विचार किए बिना उनकी जमानत को खारिज कर उन पर निवारक निरोध थोप रहा है और जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि इस अपराध से रोकने का कोई तर्क नहीं है, जो पहले से ही पूरा हो चुका है। दिलचस्प रूप से अंतिम परिणाम, यानी तलाक वह नहीं है, जिसे दंडित किया जाता है, बल्कि उसे देने के का तरीका है और इस प्रकार आपराधिक प्रवृत्त‌ि की पारंपरिक आवश्यकता यहां फीकी पड़ जाती है क्योंकि उसे अपना अपराध स्थापित करने के लिए एक उचित प्रक्रिया नहीं दी जाती है। इसलिए यह प्रक्रिया अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्‍लंघन है। जमानत को खारिज करने के साथ ही, अनुच्छेद 19 (डी) के तहत गारंटीकृत आवाजाही के अधिकार का भी उल्लंघन किया जाता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दीवानी प्रकृति के वैवाहिक अपराध के लिए इस तरह के दंड देने की तर्कशीलता बिल्कुल अस्पष्ट है, यह साबित कर रही है कि मुस्लिम पतियों के साथ अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन कर, दोहरा व्यवहार किया जा रहा है। जैसा कि मोती राम मामले में कहा गया है, अगर पति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम होते हैं, यानी (1) हालांकि निर्दोष माना जाने के बावजूद, उसके जेल जीवन के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक अभावों को भुगतना पड़ता है; (2) वह अपनी नौकरी खो देता है, अगर उसके पास है, और खुद का और अपने परिवार का सयोग देने के लिए काम करने के अवसर से वंचित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसकी हिरासत का बोझ परिवार के निर्दोष सदस्यों पर पड़ता है, (3) उसे उसकी रक्षा की तैयारी में योगदान से रोका दिया जाता है; और (4) सरकारी खजाने पर उसे जेल आदि में रखने का खर्च उठाना पड़ता है।

अब जब हम निष्कर्ष पर हैं तो यह प्रश्न शेष है कि क्या इस कानून ने अपने उद्देश्य के अनुसार, मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा को प्रभावी ढंग से कम किया है और आश्चर्य नहीं है कि इस सवाल का जवाब अनुत्तरित ही रहेगा, जब तक कि इस देश में इस्लामी सुधारों का राजनीतिकरण किया जाता है। यह सवाल रहेगा कि इस तथ्य पर कि आखिर कब तक निराश्रित मुस्लिम महिलाएं न्याय के द्वार खटखटाएंगी, जहां न तो राज्य और न ही समाज के पास दृढ़ इच्छाशक्ति है कि वे अपना उत्थान कर सके। कुप्रथाओं और अज्ञानता के कारण यह संकट बना रहेगा, और अब टूट चुके वैवाहिक संबंध उनके घाव को गहरा ही करेंगे।

ये व्यक्तिगत विचार हैं।

(एडवोकेट नीमा नूर मोहम्मद, असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, दिल्ली सरकार, और एडवोकेट जॉन एस राल्फ, एडवोकेट, केरल हाईकोर्ट)

संदर्भ -

1. 318 U.S. 332 (1943)

2. अग्र‌िम जमानत याचिका (ST) No. 2224 of 2020, 21-10-20 को निर्ण‌‌ित

3. 1978 AIR 1594 4. 1978 AIR 597

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