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COVID 19: कोरोना के दौर में क्या हैं भारतीय अदालतों की चुनौतियां?

LiveLaw News Network
2 April 2020 8:45 AM GMT
COVID 19: कोरोना के दौर में क्या हैं भारतीय अदालतों की चुनौतियां?
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वैश्विक महामारी के दौर में भारतीय न्यायालयों की तैयारियां कैसी हैं और चुनौतियां क्या है?

अवनि बंसल

प्रोफेसर ने फर्स्ट इयर के कानून स्टूडेंट से पूछाः कानून क्या है? क्या आपातकालीन स्थितियों में कानून प्रासंगिक होता है?

छात्र: प्रोफेसर, क्या हमें मास्लो के 'आवश्यकताओं के पदानुक्रम' की च‌िंता है, विशेष रूप से आपातकालीन स्थितियों में, और स्पष्ट रूप से कानून उनमें शामिल नहीं है!

प्रोफेसर: कानून पदानुक्रम के प्रत्येक स्तर पर मौजूद है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के बारे में सो‌च‌िए, और महत्वपूर्ण बात यह है कि 'आपातकाल' को वैध रूप से कानून ही परिभाषित कर सकता है।

यह पहली बार है, जब भारतीय न्यायालय ऐसे संकट का सामना कर रहे हैं। एक सदी पुरानी स्पैनिश फ्लू की महामारी के कारण, अमेरिकी अदालतों के पास ऐसे हालात के अनुभव हैं, हालांकि भारतीय न्यायालयों का पहली बार वैश्विक महामारी की विपदा से सामना हो रहा है।

अच्छी बात यह है कि भारत की सुप्रीम कोर्ट के पास, अनच्छेद 142 के जारी निर्देशों के तहत, पहले से ही ऐसी शक्तियां मौजूद हैं, जिनकी COVID-19 जैसी स्थितियों में आवश्यकता है।

अमेरिका में, सभी अदालतों को शासित करने के लिए एक नियम नहीं हैं। सभी 13 संघीय अपीलीय अदालतें COVID-19 के निस्तारण के लिए स्वयं की रणनीतियां बना रही है। इस मामले में भारतीय सुप्रीम कोर्ट बेहतर स्‍थ‌िति में है कि वह भारत की सभी अदालतों के लिए नियम बना सकती है।

बुरी बात यह है कि भारतीय न्यायालयों, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट का जिस चुनौती से सामना है, वह अद्वितीय और अनूठी है, आंतरिक हैं और बाहरी भी। बाहरी ऐसे कि जहां न्यायालयों को महामाहरी के मद्देनजर सरकार का सहयोग करना पड़ता है, वहीं सरकार की संवैधानिक बध्यताओं पर भी निगाह रखनी पड़ती है, जैसे कि बड़े पैमाने पर वेतन में कटौती न हो या छंटनी न हो, पुलिस बुनियादी मानवाधिकारों का हनन न करे आदि।

आतंरिक चुनौती यह है कि न्यायालयों को बुनियादी सुविधाओं, तकनीकी का अभाव (विशेष कर निचली अदालतों के लिए) और सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में कोर्ट कैसे चले, जैसी आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भारतीय न्यायालयों को 'आपातकाल' जैसी स्थिति का एकमात्र अनुभव 1971 के हालात का ही है। हालांकि COVID-19 की महामारी के बाद पैदा हुई चुनौतियों के समक्ष वह अनुभव बहुत मामूली है।

मौजूदा संकट, सत्ता के समक्ष 'न्यायिक स्वतंत्रता' का ही नहीं, बल्‍कि महामारी के समक्ष 'न्यायिक संवेदनशीलता', 'न्यायिक विशेषज्ञता' और 'न्यायिक दृष्टि' का परीक्षण भी है।

उदाहरण के‌ लिए, मौजूदा लॉकडाउन और अगर इसे आगे बढ़ाया गया तो क्या भारतीय न्यायालय हा‌श‌िए के नागरिकों,गरीबों ओर प्रवासियों मजदूरों की दुर्दशा के प्रति संवेदनशील रहेंगी? इसी प्रकार, क्या हमारे पास COVID​​-19 की जांच और न‌िदेशों की रोशनी में उभरे तकनीकी मुद्दों को संबोधित करने की न्यायिक दक्षता है? या सरकार की बढ़ती निगरानी की रोशनी में हम अपनी निजता और सुरक्षा के बीच संतुलन स्‍थापित कर सकते हैं? इसके अलावा, क्या ऐसी 'न्यायिक दृष्टि' है, सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा का उपयोग करने से आगे भी सोच पाएं? ऐसी दृ‌‌ष्टि जो कि पुलिस कर्मियों और स्वास्‍थ्य कर्मियों के लिए निवारक उपायों आदेश देने में दिख सके।

इसी प्रकार, COVID 19 के संक्रमण से कैदियों की रक्षा करना, जिनमें से अधिकांश अंडर ट्रायल हैं। जेलों में क्षमता से अधिक भीड़, एक ऐसी चिंता है, जिस पर न्यायालयों को ध्यान देना है। सर्वोच्च न्यायालय ने 16 मार्च, 2020 को इस मामले में संज्ञान लिया, उस पर क्या कार्रवाई ‌होती है, यह देखा जाना बाकी है।

संक्षेप में यह कि भारतीय न्याय प्रणाली COVID-19 के मद्देनजर उभी चुनौतियों का सामना कर पाएगी या नहीं यह भारतीय न्यायालयों की दृष्टि और नेतृत्व की क्षमता पर निर्भर करेगा।

आइए देखते हैं कि न्यायालयों ने COVID 19 की चुनौ‌ती का सामना करने के ‌‌लिए अब तक क्या किया है? यह काबिल-ए-तारीफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने अत्यावश्यक मामलों की सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा का उपयोग करने की पहल की, जिसे बाद में अधिकांश उच्च न्यायालयों ने अपना लिया। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जर‌िए लॉकडाउन की अ‌वधि में अदालत को पूरी तरह बंद करने के संकट और कामकाज करते रहने की जरूरत के बीच सुप्रीम कोर्ट ने संतुलन बैठा लिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी COVID-19 की स्थिति का संज्ञान लिया और अनुच्छेद 226 और 227 के तहत कोर्ट के कामकाज को 4 अप्रैल, 2020 तक जरूरी मामलों तक सीमित कर दिया। उसने रूटीन मामलों को स्थगित कर दिया और 16 मार्च 2020 तक के अंतरिम आदेशों को 15 मई 2020 तक बढ़ा दिया।

सर्वोच्च न्यायलय और उच्च न्यायालयों ने सुनवाई के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को उपयोग किया है, हालांकि निचली अदालतों में तकनीकी उपयोग की कमी एक प्रमुख चिंता बनी हुई है। निचली अदालतों में अधिकांश वादी-प्रतिवादी और वकील इन चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हैं।

चूँकि अधीनस्थ अदालतें भारतीय न्यायिक प्रणाली में न्याय वितरण का पहला स्तर हैं, इसलिए उन्हें तकनीकी स्तर पर सक्षम बनाना समय की आवश्यकता है। जब तक भारत में सभी जिलों और तालुका अदालतों का तकनीकी रूप से सक्षम नहीं नहीं बनाया जाता है, तब तक भारतीय न्याय प्रणाली COVID-19 की चुनौती का ठोस ढंग से सामना नहीं कर पाएगी।

इससे पहले की ये चुनौती और बड़ी हो जाए, सरकार को अधीनस्थ न्यायालयों को तकनीकी रूप से अद्यतित करने के लिए तत्काल धन जारी करना चाहिए।

प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर भारतीय न्याय प्रणाली को अप-टू-डेट करने के लिए संभवतः सांसदों, नीति निर्माताओं और न्यायालयों के लिए रिचर्ड सुस्काइंड की किताब 'Tomorrow's Lawyers' के सुधार प्रस्तावों पर गंभीरता से ध्यान देने का इससे बेहतर समय हो सकता। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के साथ-साथ, कई अन्य प्रौद्योगिकी विकल्पों पर न्यायालयों को विचार करना चाहिए, विशेष रूप से लाइव स्ट्रीमिंग की सुव‌िधा। (सुप्रीम कोर्ट Youtube चैनल के जर‌िए ऐसा करे।)

COVID-19 के मद्देनजर, भारतीय न्यायालयों के समक्ष तकनीकी के अलावा भी कई चुनौतियां हैं।जिनमें पहली चुनौती, न्यायालयों में लंबित मामले हैं। सुप्रीम कोर्ट में लगभग 60,000 मामले लंबित हैं। सभी लंबित मामलों में से 87 प्रतिशत मामलों अधीनस्थ न्यायालयों में है। मौजूदा लॉकडाउन के कारण मामलों के निस्तारण में लगने वाले औसत समय बढ़ सकता है, जिसका बैकलॉग पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

जैसा कि चीन का अनुभव रहा, अगले चार से पांच महीनों तक ऐसे ही हालात रहे तो नए मामले की संख्या कम तो होगी, लेकिन निस्तारण भी बहुत कम मामलो का ही हो पाएगा।

चूंकि मोदी सरकार सितंबर, 2019 में न्यायालयों में लंबित मामलों का संकट हल करने की मंशा व्यक्त कर चुकी है। अगर वह गंभीर है तो इस चुनौती को हल करने का यह एक अच्छा समय हो सकता है।

COVID-19 के बाद अदालतों का बोझ कम करने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति और रिक्त पदों का भरना बहुत जरूरी होगा।

लंबि‌त मामलों के बाद, 'अर्जेंसी' का निर्धारण दूसरी बड़ी चुनौती है। मौजूदा लॉकडाउन को देखते हुए, न्यायाधीश फिलहाल 'अत्यावश्यक' मामलों की सुनवाई ही कर रहे हैं। यह पूछा जा सकता है कि 'तात्कालिकता' को कैसे परिभाषित किया जा रहा है।

दुर्भाग्य से भारत में 'तात्कालिकता' को निर्धारित करने को एकमात्र पैमाना न्यायाधीशों का विवेक ही है।

मौलिक अधिकारों के हनन के किसी भी मामले, जैसे कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का ममला, को न्यायालयों को आवश्यक मानना चाहिए। पुलिस अधिकारियों सहित पब्लिक अथॉरिटीज़ के खिलाफ किसी भी शिकायत, शक्तियों के दुरुपयोग के मामलों को तत्परता से सुना जाना चाहिए।

पश्चिम बंगाल के हावड़ा में 32 वर्षीय युवक की मौत, पुलिस की शक्तियों के दुरुपयोग का ऐसा ही एक मामला है। उसकी पत्नी के अनुसार, जब वह दूध लेने घर के बाहर गया था, कथित तौर पर, तब पुलिस ने उसे बेरहमी से पीटा था।

यह उचित है कि राज्य या पुलिस द्वारा, COVID​-19 के संकट के दौर मेंहो रहे मानवाधिकार हनन के मामलों पर न्यायालय बारीकी से नजर रखती है। फिर भी अदालतों को बड़े संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न होने की स्थिति में अपनी शक्ति का उपयोग करने की आवश्यकता पड़ सकती है, विशेषकर यदि सरकार अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर दे/ या आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत कानूनी प्रावधानों की व्याख्या, की जरूरत पड़े।

तीसरी चुनौती यह है कि, COVID-19 का वकीलों, चाहे वो लॉ फर्मों में काम कर रहे हों या मुकदमे लड़ते हों, की स्थिति पर भी असर पड़ सकता है। मंदी और अदालतों की बंदी की स्थिति में वकीलों को काम की कमी या छंटनी का भय है।

दिल्ली सरकार ने बीमा देने के लिए उन वकीलों को 31 मार्च, 2020 तक आवेदन करने को कहा था, जो ‌दिल्ली बार काउंसिल के सदस्य हैं और दिल्ली की मतदाता सूची में हैं। दिल्ली सरकार ने इस मद में 50 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। हालांकि युवा वकीलों के लिए लागू की गई इस कल्याणकारी योजना का COVID-19 के साथ कोई संबंध नहीं है। यह महामारी से पहले शुरु की गई थी। हालांकि, यह योजना भी अब अधर में है, क्योंकि वकीलों के एक समूह ने इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है, और रजिस्ट्रार ने निर्देश दिया है कि कोरोना वायरस की प्रकोप खत्म होने के बाद इस मामले को सूचीबद्ध किया जाएगा।

मुकदमा लड़ने वाले वकीलों को डर है कि अदालतों के खुलने तक उनका पास कोई काम नहीं रहेगा, और लॉ-फर्मों में काम कर रहे वकीलों की चिंता है कि आपदा के बाद उन्हें नौकरियों से हटाया जा सकता है। यह ध्यान योग्य है कि अगर पेशेवरों और लॉ-फर्मों में काम कर रहे वकीलों की बड़े पैमाने पर छंटनी होती है तो कोई ऐसा कानूनी उपचार नहीं है, जिनसे उनका बचाव हो सके।

श्रम और रोजगार मंत्रालय ने हाल ही में एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें सभी निजी और सार्वजनिक नियोक्ताओं सुझाव दिया गया है कि COVID-19 का प्रकोप शांत होने तक उन्हें श्रमिकों की छंटनी नहीं करनी चाहिए।

उल्लेखनीय हैकि श्रम और रोजगार मंत्रालय की इस एडवाइजरी के तहत पेशेवरों को कवर नहीं किया जाता है, इसमें केवल कामगार/ मजदूर ही शामिल हैं। दूसरी बात यह है कि यह एडवाइजरी भर है। तीसरी बात यह कि नियोक्ता पैसे की कमी का हवाला दे सकते हैं और कॉट्रेक्ट का हवाला देकर कर्मचारियों की छंटनी कर सकते हैं।

इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए सरकारी का हस्तक्षेप बहुत ही जरूरी है कि पेशेवरों सहित, वकीलों की छंटनी न हो। सरकार नौकरियों की सुरक्षा के नियोक्ता को वित्तीय सहायता प्रदान कर सकती है या नियोक्ताओं को यह अनुमति दे सकती है कि तनख्वाहों में कटौती कर नौकरियों को सुरक्षित रखें, शेष तनख्वाह का भुगतान सरकार कर सकती है।

मौजूदा स्थिति का वकीलों और अन्य पेशेवरों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है, जिसके लिए ऐसा लगता है कि जनहित याचिका के अलावा कोई कानूनी उपचार मौजूद नहीं है, और संभवतः न्यायालय पीआईएल को तवज्जो न दें? नियोक्ताओं की चिंताओं के साथ वकीलों और अन्य पेशेवरों की छंटनी के मुद्दे को हल करने के लिए सरकारी पहल समय आवश्यक है।

वर्तमान स्थिति चुनौतियों से भरी हुई है। कुछ तात्कालिक उपायों और कुछ दीर्घकालिक उपायों के जर‌िए इसे ठीक करने की जरूरत है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारतीय न्याय प्रणाली को नुकसान न हो।

थोड़े समय में, यदि हालात वाकई खराब होते हैं, और 'अर्जेंट कैटेगरी' के मामलों की संख्या बढ़ती है तो न्यायालय 'ओरल ऑर्ग्यूमेंट' को भी समाप्त कर सकता है।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने स्पैनिश फ्लू के दौरान ऐसा किया था, और उसकी कोई आलोचना भी नहीं हुई थी। अगर न्यायालयों में कर्मचारियों की कमी होती है और मामलों की संख्या में बढ़ती है, कोर्ट पर दबाव बढ़ता है, तो यह एक आपाताकालीन उपाय हो सकता है। ऐसी स्थिति में न्यायालयों ने लिखित दलीलों और सबूतों के आधार पर निर्णय देने का फैसला कर सकती है।

हालांकि यह एक आपातकालीन उपाय है, यह केवल आखिरी उपाय के रूप में अपनाया जा सकता है। यह भी गंभीर चुनौतियां पेश कर सकता है। मसलन जब हालात सामान्य होंगे, तो ऐसे सभी फैसले के खिलाफ नियमित अपील की जा सकती है, जिससे लंबित मामलों की संख्या में और इजाफा होगा।

सभी अदालतों के लिए कम कठोर और अधिक दीर्घकालिक विकल्प यह है कि वो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जर‌िए सुनवाई करने के बावजूद दोनों पक्षों को मौखिक दलील के लिए तय समय दें। वकीलों अंतहीन बहस करने की अनुमति क्यों दी जाए? न्यायालय के रजिस्ट्रार को दोनों पक्षों को केस की श्रेणी और जटिलता के आधार पर पहले ही समय दिया जा सकता है?

अमेरिका में, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी पक्षों को बहस करने के लिए समय आवंटित किया जाता है। भारतीय न्यायालयों को भी ऐसे नियम पर विचार करना चाहिए है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट को सभी स्तरों पर COVID-19 की स्थिति से उत्पन्न मामलों की सुनवाई के लिए विशेष पीठों के गठन पर विचार करना पड़ सकता है। आने वाले दिनों में, अदालतों को अनूठे मामलों का सामना करना पड़ सकता, जो मौजूदा महामारी के कारण पैदा हो सकते हैं। राज्य सरकारों के अलग-अलग निर्देशों के जर‌िए, राज्य और जिले की सीमाओं को सील करने के आलावा, भारत सरकार द्वारा भारतीय सीमाओं को सील करने के अलावा, ऐसे मामले भी हो सकते हैं, जहां सरकार 'आपातकाल' का तर्क देकर बुनियादी अधिकारों पर लगाम लगा सकती है।

जब भारतीय संविधान यह अनुमति देता है कि, सुप्रीम कोर्ट की एक से अधिक बेंच हो सकती हैं, और अन्य स्थानों पर हो सकती हैं, तय यह महत्वपूर्ण समय है कि सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार दोनों ही इस प्रस्ताव पर विचार करें, विशेष रूप से COVID-19 के बाद बढ़े कार्य-भार को देखते हुए और दिल्ली तक की यात्रा से बचने के लिए।

ये ऐसा समय हैं, जब हालात सभी व्यक्तियों, संगठन और संस्थानओं से ये अपेक्षा रखता है कि अपना सर्वश्रेष्ठ दें। अद्वितीय समय के लिए अद्वितीय प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता होती है और हमें यह देखना होगा कि क्या भारतीय न्यायालय, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय, COVID -19 के मद्देनजर पैदा हो रही चुनौतियों का सामना कर पाता है।

ये लेखक के निजी विचार है।

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