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"मेरे प्यारे दोस्त, कल केस है! आपके वकील ने ब्रीफ तक नहीं पढ़ी है" भूलाभाई देसाई की कहानी, जिन्होंने भारत की आजादी के लिए जिरह की

LiveLaw News Network
22 Aug 2020 4:59 AM GMT
"मेरे प्यारे दोस्त, कल केस है! आपके वकील ने ब्रीफ तक नहीं पढ़ी है" भूलाभाई देसाई की कहानी, जिन्होंने भारत की आजादी के लिए जिरह की
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संजोय घोष

"और यह न्याय का मज़ाक होगा, अगर हमें किसी फैसले के नतीजे रूप में बताया जाए या अन्य‌था हो, कि भारतीय, एक सैनिक के रूप में जर्मनी के खिलाफ इंग्लैंड की आज़ादी के लिए लड़ सकता है, इंग्लैंड की आज़ादी के लिए इटली के खिलाफ, जापान के खिलाफ लड़ सकता है, और अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई है कि जब एक आज़ाद भारतीय राज्य खुद को इंग्लैंड सहित किसी भी देश से आज़ाद करने की इच्छा व्यक्त नहीं कर सकता है।"

यह ऐसा ट्रायल था, जिस पर सभी की ‌निगाह थी। खचाखच भरे कोर्ट रूप में उस गुजराती वकील के एक-एक शब्द गूंज रहे थे। भीड़ एक -एक दलील सुन रही, जिन्हें आज़ादी के लिए बेताब मुल्क और अपने नायकों के अपमान से दुखी मुल्क के बचाव में पेश किया जा रहा था

वकील ने 10 घंटों तक दलीलों पर दलीलें पेश कीं, हालांकि उन्हें पहले से ही पता था कि यह एक हारा हुआ मुकदमा है। वह इस बात से वाकिफ ‌थे कि ‌जिन तीन अभियुक्तों को चुना गया है, जो कि तीन प्रमुख समुदायों के सदस्य हैं, उनका बचाव इतिहास के लिए महत्वपूर्ण होगा।

13 अक्टूबर, 1877 को वलसाड, गुजरात के एक मामूली सरकारी वकील, जीवनजी देसाई को जब बताया गया था कि उनकी पत्नी रमाबाई ने एक बेटे को जन्म दिया है, तो उन्हें कल्पना भी नहीं रही होगी कि वह एक ऐसे बेटे के पिता बने हैं, जो जो भारत के आज़ादी का मुकदमा लड़ेगा।

भूलाभाई इकलौती संतान थे, जबकि उन दिनों ऐसे दुर्लभ होता था। उन्हें लाड़ से पला गया था। उन्हें पढ़ाने के जिम्मेदारी मामा ने अपने हाथों में ली थी। भूलाभाई ने वलसाड के अवाबाई स्कूल में पढ़ाई की, जब तक वे बॉम्बे नहीं चले गए। उन्होंने 1895 में भारदा हाई स्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास किया।

गांव के उस युवक को एल्फिंस्टन कॉलेज ने नया कलेवर दिया, उन्हें इंग्लिश साहित्य और कविता से प्रेम ‌हो गया। शायद, अंग्रेजी उनका पहला प्यार था। उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एमए किया। गुजरात कॉलेज, अहमदाबाद में उन्होंने अंग्रेजी और इतिहास पढ़ाया।

देसाई ने नौकरी के साथ कानून की पढ़ाई नहीं की होती तो वह किसी कॉलेज में अध्यापक ही बने रह जाते। जब वह पढ़ रहे थे, तभी उनकी शादी हो गई। उनकी पत्‍नी इच्‍छाबेन ने एक बेटा को जन्म दिया, जिसका नाम धीरूभाई था, लेकिन वह लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाई और कैंसर से उनकी 1923 मौत हो गई।

तब तक देसाई बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी पहचान बना चुके थे। उन दिनों अंग्रेज और भारतीय वकीलों के बीच गहरा अंतर हुआ करता था। याद रखें कि यह अदालत है, जिसने अततः जब कॉर्नेलिया सोराबजी के लिए अपने दरवाजे खोले, तो उन्हें एक भी केस न देकर आगे बढ़ने से रोक दिया, क्योंकि वह न केवल भारतीय थीं, बल्कि एक महिला भी थीं।

देसाई की किस्मत बेहतर थी। उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ने के बाद, 1905 में वकालत की शुरुआत की और दो दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली। कलकत्ता से लाहौर तक उनकी ख्या‌ति बढ़ती गई। उस समय लॉरेंस जेनकिंस मुख्य न्यायाधीश थे और उन्होंने अदालतों के "भारतीयकरण" की दिशा में कई कदम उठाए, जिससे देसाई को काफी मदद मिली।

पीबी वाचा का मानना है कि देसाई की तरक्की का श्रेय स्कॉट, लाउंडेस और राईक्स जैसे यूरोपीय बैरिस्टरों के धीरे-धीरे गायब होने को भी दिया जा सकता है। [1] एक बार, सभी 21 चैंबर सम्मन में देसाई को ब्रीफ किया गया था, जिन्होंने जज चैंबर बोर्ड का गठन किया था। देसाई को प्रतिदिन 20 से 40 मामलों की ब्रीफ दी जाती थी।

वह एक चौकड़ी के सदस्य थे, जिसमें चिमनलाल सेटलवाड़, कंगा और तारापोरवाला शामिल थे। एमसी सेटलवाड़ ने देसाई पर एक किताब भी ‌लिखी है।

अपनी पुस्तक में सेटलवाड़ याद करते हैं, "देसाई की प्रशिक्षित स्मृति उनकी एक उल्लेखनीय गुणवत्ता ‌थी, जो उन्हें निस्संदेह बाद के वर्षों में बार में अलग खड़ा करती थी, जिसकी मदद से वह नोट के बिना अदालत में जटिल मामलों का संचालन किया करते थे।"

ऐसा लगता है कि देसाई को यह आदत तब पड़ी, जब बार के एक सीनियर ने उन्हें लाइब्रेरी में परिश्रमपूर्वक नोट्स बनाते हुए देखा तो नोट छीन लिए और उन्हें फाड़ दिया। युवा देसाई को खासी फटकार लगाई गई कि वो नोट बनाने की आदत न डालें।

देसाई पर सेटलवाड़ की पुस्तक मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है। यह अत्यधिक अनुशंसित भी है।

किताब में केएम मुंशी, एमवी देसाई और एचजे कानिया को देसाई के जूनियर्स के रूप में उद्धृत किया गया है, जिन्होंने खुद बाद में प्रसिद्धि और गौरव प्राप्त किया।

देसाई के शुरुआती दिनों में भारतीय वकील अपने यूरोपीय समकक्षों के विपरीत, अदालत में पगड़ी पहते थे। देसाई ने दहकती लाल रंग की पगड़ी पहनते थे। सेटलवाड़ लिखते हैं कि एक बार देसाई ने लंच ब्रेक के दौरान बार रूम में अपनी था पगड़ी उतारकर रखी थी, चिमनलाल सेटलवाड़ ने देसाई के साथ शरारत की और पगड़ी लेकर भाग गए। भूलाभाई अपनी पगड़ी नहीं खोज पाए तो जस्टिस मार्टन के कक्ष में पहुंचे और उन्हें अपनी परेशानी से अवगत कराया। मार्टन पगड़ी न होने के कारण मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।

वाच्‍चा बताते हैं कि एक बार देसाई को मुख्य न्यायाधीश मैकलोड की धीमी गति से चिढ़ हो गई। वह मूल अपील पर सुनवाई कर रहे थे। आश्चर्यजनक रूप से देसाई को लगभग सभी में ब्रीफ किया गया था, 10 पेपरबुक्स को रात भर पढ़ा गया था, जब कोर्ट ने 11 वीं अपील उठाई, भूलाभाई ने विरोध किया था।

फली नरीमन ने भूलाभाई के बारे में एक दिलचस्प किस्‍स साझा किया है। एक वसीयत के मुकदमे में, बीपी खेतान ने देसाई को ब्रीफ किया और मुवक्किल ने कहा कि देसाई के साथ वह हर कांफ्रेंस के लिए देसाई के साथ बॉम्बे आए। देसाई व्यस्त वकील थे और उन्हें एक महीने पहले जाना था। देसाई केस के लिए हर दिन केवल 30 मिनट का समय बचा पाते थे और खेतान ने उन्हें लगातार तथ्यों को याद ‌दिलाते।

सुनवाई की पूर्व संध्या पर, उस मारवाड़ी सॉलिसिटर ने अपने मुवक्किल से कहा "मेरे प्यारे साथी, कल मामला है! हमने वह सब किया है जो हम कर सकते हैं, लेकिन किस्मत आपके खिलाफ है। आपके वकील ने ब्रीफ नहीं पढ़ा है और आप अब यह कर सकते हैं कि महालक्ष्मी मंदिर जाएं और प्रार्थना करें कि कुछ चमत्कार हो जाए।"अगले दिन, खेतान का मुंह खुला रहा गया, जब देसाई ने कोर्ट में, 2000 पेज के ब्रीफ को पढ़े बिना शानदार जिरह की। [2]

यह वह दौर ‌था, जब बार के सितारे स्वतंत्रता संग्राम में शाामिल होते और उसे दिशा देते थे। भूलाभाई भी एनी बेसेंट के होम रूल लीग आंदोलन की ओर आकर्षित हुए थे। देसाई लिबरल पार्टी में शामिल भी हुए थे।

गुजरात के किसानों द्वारा किए गए बारडोली सत्याग्रह में शामिल होकर देसाई अन्य गुजरा‌तियों के संपर्क में आए। "नो-टैक्स" के लिए संघर्ष का नेतृत्व महात्मा के आशीर्वाद से सरदार पटेल ने किया था।

बापू की बाद की जांच में यह स्पष्ट था कि केवल सबसे अच्छे वकील को ही किसानों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए और स्वाभाविक पसंद देसाई थे। किसानों के परिप्रेक्ष्य से देसाई की उत्कृष्ट प्रस्तुति ने सरकार को राजस्व में संशोधन करने, जब्त भूमि वापस करने और किसानों को जेल से रिहा करने के लिए मजबूर किया। देसाई एक किंवदंती बन गए थे।

भूलाभाई देसाई 1930 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्हें गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन ने इतना आकर्षित किया, उन्होंने स्वदेशी सभा का गठन किया और 80 कपड़ा मिलों को ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार में शामिल होने के लिए राजी किया।

ब्रिटिशों ने सभा के क्रियाकलाप पर नाराजगी जताई थी और 1932 में देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया। जेल से उन्होंने अपने बेटे को लिखा "बाहरी दुनिया में मुझमें खूब जोश था, जबकि जेल में, रूटीन की दिनचर्या और खाली दीवारों को देखते रहना पड़ रहा है।" देसाई अक्सर बीमार पड़ जाते थे, इसलिए सेहते के आधार पर उन्हें छोड़ दिया गया। उन्होंने जेल में पुस्तकालय बनाया था। सरदार पटेल के आग्रह पर यूरोप में वापस आने के बाद देसाई को कांग्रेस कार्य समिति में शामिल किया गया।

जब 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट लागू किया गया, तो देसाई ने कांग्रेस की भागीदारी की वकालत की। वह गुजरात विधान सभा के लिए चुने भी गए।

जब हिटलर ने पोलैंड पर हमला किया, ब्रिटेन को युद्ध में शामिल था। वह भारत की ओर से एकतरफा युद्ध की घोषणा करना चाहता था। 19 नवंबर, 1940 को, सेंट्रल असेंबली में, देसाई ने कहा, "जब तक यह भारत का युद्ध नहीं है, यह असंभव है कि आपको भारत का समर्थन मिलेगा"। जल्द ही देसाई डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत यरवदा जेल में बंद कर दिया गया। हालांकि, सितंबर 1941 में स्वास्थ्य आधार पर उनकी रिहाई ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है।

याद रखें कि इसी समय कांग्रेस का भारत छोड़ो आंदोलन, प्रांतीय मंत्रियों का इस्तीफा और ‌ब्रिटिश सरकार के लिए अप्रिय दृष्टिकोण अखंड भारत के लिए घातक साबित हुआ। कांग्रेस मंत्रालयों के इस्तीफे और जेल में बंद प्रमुख नेताओं के कारण कांग्रेस किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई थी, जिससे मुस्लिम लीग को बल मिला, जबकि पिछले चुनावों में वह पस्त हो गई थी। वह शाही सरकार के संरक्षण में और ताकत से आगे बढ़ी। रिहाई के कारण देसाई लियाकत अली खान के साथ सहयोग की शर्तों पर बातचीत करने की महत्वपूर्ण स्थिति में थे, हालांकि रिहाई ने उन्हें कैद से बाहर निकलने के लिए आसान तरीका अपनाने के आरोप का सामना भी करवाया, जबकि अन्य नेता जेल में बंद थे। यह आरोप देसाई ही था कि उनका नाम संविधान सभा के लिए कांग्रेस पार्टी द्वारा नामित व्यक्तियों की सूची में भी नहीं आया। [3]

देसाई-लियाकत संधि, जिसके तहत देसाई और जिन्ना ने कांग्रेस-लीग समानता के आधार पर एक गठबंधन सरकार बनाते, [4] दुख की बात है कि पैदा भी नहीं हुई था कि जिन्ना ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि उन्हें ऐसे किसी समझौते की जानकारी नहीं है। जबकि फुसफुसाहट थी कि देसाई ने बापू की मौन सहमति से यह काम किया था। बाद में कांग्रेस और लीग दोनों ने उक्त समझौते को नकारने में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा की।

देसाई को "नेतृत्व को बाईपास करने" और "पीठ में छुरा घोंपने" जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा और कांग्रेस वर्किंग कमेटी से हटा दिया गया। हालांकि, भूलाभाई देसाई की कहानी खत्म नहीं हुई थी, वह निराश थे, लेकिन हारे नहीं थे।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की सितंबर 1945 की बैठक में, नेहरू ने आज़दा हिंद फौज के सैनिकों के लिए जनता के समर्थन को भांपते हुए देसाई की अध्यक्षता में एक ‌डिफेंस कमेटी की घोषणा की थी।

देसाई, पहले से ही देसाई-लियाकत समझौते बाद हुए बवाल से दहले हुए थे। उनका स्वास्थ्य भी गिर रहा था। डिफेंस कमेटी ने समय के विस्तार के लिए वायसराय की अपील की, हालांकि उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया।

5 नवंबर, 1945 को, दिल्ली के लाल किले के अंदर, प्रसिद्ध आईएनए ट्रायल शुरू हुआ। राजद्रोह के आरोप में कटघरे में शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श ढिल्लों खड़े थे। तीनों अपनी वर्दी उतारकर नेताजी के नारे "दिल्ली चलो" के साथ हो लिए थे। अब वे दिल्ली के दिल में थे, हालांकि उस तरह नहीं, जिस तरह से नेताजी उन्हें चाहते थे। वे कैदी थे और ब्रिटिश कोर्ट में उनका ट्रायल चल रहा था।

उम्मीद की क‌िरण मात्र यह थी कि उनका बचाव भूला भाई देसाई कर रहे थे, जो कि चीफ डिफेंस काउंसल ‌थे। और तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू और डॉ केएन काटजू उन्हें मदद कर रहे थे।

देसाई ने गवाहों से देसाई की थी। सेटलवाड़ लिखते हैं कि देसाई ने नैतिकता का पूरा ध्यान रखा। उन्होंने कैप्टन धरगलकर का उदाहरण दिया है। किसी ने देसाई को बताया कि गवाह के अपने पिता से अच्छे रिश्ते नहीं हैं और पिता के ‌जिक्र से वह नर्वस हो जाएगा। "यह उचित नहीं है", भूलाभाई ने कहा, "मैं गलत तरीकों का उपयोग नहीं करूंगा"। अगले दिन उन्होंने अपनी फॉरेंसिक कुशलता से गवाह को ध्वस्त कर दिया।

यह ट्रायल देसाई की फोटोग्राफिक मेमोरी का भी प्रदर्शन था। एक सूबेदार से जिरह करते हुए देसाई ने उसे कुछ कहा, जो कि उसने महाधिवक्ता को दिए जवाब में कहा था। महाधिवक्ता आपत्ति जताते हुए कहा कि यह असत्य है। इस पर आश्वस्त देसाई ने कहा "इस अदालत में रिकॉर्ड जैसी भी कोई चीज रखी है", "मेरा सुझाव है कि हम रिकॉर्ड को देखें"। रिकॉर्ड ने देसाई को सही साबित किया था।

ट्रायल के दौरान भूलाभाई का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया और डॉक्टरों ने एक बार उनके सूजे हुए पैरों और थकान को देखते हुए उन्हें पूर्ण आराम की सलाह दी। भूलाभाई ने अपने कर्तव्य का हवाला दिया और आखिरकार काटजू के कहने पर समझौता करने को तैयार हो गए। तय यह हुआ कि काटजू अगले दिन की कार्यवाही का संचालन करते और किसी भी आपात स्थिति के लिए वे उपलब्ध रहते।

देसाई ने दो दिनों तक बिना रुके 10-10 घंटे बहस की, न किसी नोट को देख और न किसी का सहयोग लिया। उन्होंने कहा कि ट्रायल ब्रिटिश म्युनिसिपल लॉ के तहत आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक कानून के प्रभाव थे।

देसाई ने बताया कि इंडियन नेशनल आर्मी उचित रूप से गठित, स्व-शासित सेना है, जिसके पास स्वयं का कोड, रैंक, वर्दी और पदक है। यह ब्रिटिश सेना से अलग हुए सैनिकों से बना जापानी सेना का पांचवां कॉलम नहीं है, जैसाकि अभियोजन पक्ष न्यायालय मानवाना चाहता है।

देसाई ने चतुराई से देशद्रोह के आरोपों का सामना कर रहे सैनिकों को एक गुलाम राष्ट्र का प्रतीक बना दिया, जो मुक्ति का युद्ध लड़ रहे थे! उन्होंने पूरे देश को ट्रायल पर और उपनिवेशवाद को कटघरे में खड़ा कर दिया। सत्ता को पता था कि वह हार चुकी है। देसाई ने शाह नवाज खान गवाही की याद दिलाई, जिसमें उन्होंने कहा कि जब उन्हें राजा और देश के बीच चुनने को मजबूर होना पड़ा तो उन्होंने देश को चुना।

देसाई की भावुक दलीलों के बावजूद, अदालत ने 31 दिसंबर, 1945 को तीनों सैनिकों को देशद्रोह का दोषी पाया। हालांकि, औपनिवेशिक आकाओं ने राष्ट्रीय मनोस्थिति और आईएनए कैदियों के लिए जनता के बीच समर्थन को भांप लिया था। गुप्त रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि प्रतिकूल सजा देने से लोग विद्रोह कर देंगे। दोषियों को फांसी नहीं दी गई, लेकिन उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और उनके सभी वेतन और भत्ते को जब्त करने का आदेश दिया गया और उन्हे कालापानी (आजीवन अंडमान सेलुलर जेल में रहने की) सजा सुनाई गई।

रिनचेन नोरबू वांगचुक लिखते हैं, "लेकिन देसाई ने जो पेशकश की थी वह फॉरेंसिक परिशुद्धता के साथ एक उल्लेखनीय बचाव था, जिसका सजा पर गहरा प्रभाव था और इससे भी महत्वपूर्ण बात, स्वतंत्रता संघर्ष पर प्रभाव पड़ा। यह ट्रायल और उसके बाद के सार्वजनिक आक्रोश था, जिसने भारत में औपनिवेशिक शासन की कमर तोड़ दी। और ऐसा करने में सबसे आगे खड़े थे भूलाभाई देसाई।"[5]

देसाई का बॉम्बे में एक रॉकस्टार के की तहर स्वागत किया गया था। हालांकि, जिस आदमी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए जिरह की, दुखद है कि वह स्वतंत्र भारत को देखने के लिए जीवित नहीं रहा। 6 मई, 1946 को उनकी मृत्यु हो गई। उसी साल बॉम्बे के एक और बेटे ने डायरेक्ट एक्‍शन प्लान लॉन्च किया, जिसने देसाई के भारत को चकनाचूर कर दिया।

देसाई की स्मृति आज एक ऐसी सड़क तक सिमट गई है, जो आपको ब्रीच कैंडी क्लब या महालक्ष्मी मंदिर तक ले जाती है। अब भी कुछ पुराने लोग इसे वार्डन रोड कहना पसंद करते हैं। यह इस भूले हुए महान वकील और स्वतंत्रता सेनानी को उसकी जगह दिलाने का समय, जो कि जिसका की वह हकदार है। [6]

लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं।)

[1] पीबी वाच्‍चा, फेमस जजेज़, लॉयर्स एंड केसेज़ ऑफ बॉम्बे, यूनिवर्सल लॉ पब्लिशिंग कंपनी, 1962।

[2] फली नरीमन, "बिफोर मेमोरी फेड्स: एन ऑटोबायोग्राफी"।

[3] सैयद साद अहमद, गांधी @ 150: भूलाभाई देसाई, गांधीज़ ट्रस्टेड लीगल लेफ्टिनेंट", 7.10.2019, आउटलुक।

[4] वीपी मेनन, ट्रांसफर ऑफ पॉवर।

[5] रिनचेन नॉर्बु वानचुक, "ग्रेटेस्ट लीगल आर्गुमेंट डिलीवरेड इन इंडिया", thebetindindia.com, 30.01.2020.

[6] श्रीनाथ राव, "भूलाभाई देसाई रोड: इन मेमोरी ऑफ कांग्रेस लॉयर, हू ‌डिफेंडेड आईएनए सोल्जर्स", 20.08.2020, द इंडियन एक्सप्रेस.

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