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[लॉ ऑन रील्स] "आप लोग हैं कौन?" बोस्टन लीगल और रेप के अपराध में मृत्युदंड

LiveLaw News Network
10 July 2020 3:44 AM GMT
[लॉ ऑन रील्स] "आप लोग हैं कौन?" बोस्टन लीगल और रेप के अपराध में मृत्युदंड

सुनील फर्नांड‌िस

बोस्टन लीगल (2004-2008) 'लॉ' जॉनर की लोकप्रिय अमेरिकी टीवी सीरीज़ों में से एक है।5 सीज़न्स और 101 एपिसोड्स की यह सीऱीज, जिसका न‌िर्माण डेविड ई केली ने किया था, बोस्टन, मैसाचुसेट्स स्थित एक काल्पनिक लॉ फर्म 'क्रेन पूल एंड श्मिट' के वकीलों की जिंदगी और कानूनी मामलों की कहानी है। सीरीज़ में एकमात्र वास्तविक वकील खुद निर्माता डेविड ई केली थे। वह बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के पूर्व छात्र थे।

सीरीज़ में दो प्रमुख पात्र थे डेनी क्रेन और एलन शोर हैं। डेनी क्रेन का किरदार निभाया है विलियम शटनर ने। कनाडाई अभ‌िनेता विलयम शटनर स्टार ट्रेक सीरीज़ में यूएसएस एंटरप्राइज के कैप्टन जेम्स टी किर्क का किरदार अमर कर चुके हैं। एलन शोर का किरदार जेम्स स्पैडर ने निभाया है। फर्म में एलन शोर सबसे अच्छा वकील है, और जेम्स क्रेनी का सबसे अच्छा दोस्त है।

विलियम शटनर

सीरीज़ के लगभग सभी एपिसोड्स में बोस्टर की अदालतों में मामलों को द‌िखाया गया है। सीज़न 4 का एपिसोड 17 का एक मात्र ऐसा एपिसोड है, जिसका शीर्षक 'द कोर्ट सुप्रीम' है, में एलन शोर और डेनी क्रेन अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट (SCOTUS) के समक्ष चाइल्ड रेप के एक आरोपी के लिए बहस करने के लिए वाशिंगटन डीसी की यात्रा करते हैं। वह आरोपी एक मानसिक रूप से विकलांग है।

हमारी सुप्रीम कोर्ट के विपरीत, SCOTUS में केवल 9 जज हैं, जो सालाना खुली अदालतो में लगभग 80-100 मामले सुनते हैं। सीरीज़ में 9 अभिनेताओं ने SCOTUS के 9 जजों का किरदार न‌िभाया है, जो कि काफी हद तक ‌रियल लाइफ जजों की तरह लगते हैं।

SCOTUS में "बहस" के दौरान एलन शोर 'कोकर बनाम जॉर्जिया' - 433 US 584 ( 1977), में SCOTUS के वास्तविक फैसले का हवाला देता है, जिस मामले में SCOTUS ने बलात्कार के ऐसे मामलों में अनिवार्य मौत की सजा को रद्द कर दिया था, जहां बलात्कार का अपराध एक एकमात्र अपराध था और हत्या आदि जैसा कोई और आक्रामक अपराध साथ में नहीं था।

सीरीज़ में "जजों" ने कोकर पर शोर की निर्भरता को खारिज कर दिया था, और स्पष्ट किया था कि वह एक ऐसा मामला है, जहां बलात्कार एक वयस्क महिला पर किया गया है, जबकि मौजूदा मामले में, बलात्कार एक नाबालिग पर किया गया है और इसलिए कोकर तथ्यों पर लागू नहीं होगा।

सीरीज़ यह नहीं बताती कि SCOTUS अंततः उस काल्पनिक मामले में क्या फैसला दिया। हालांकि भारत की सुप्रीम कोर्ट (SCI) में अभ्यासरत एक वकील के रूप में, मैं निरे अंचभे के साथ देख सकता हूं, (और ईर्ष्या के साथ भी!), एलन शोर "जस्टिस" के खिलाफ आम आदमी और संविधान को निराश करने के कैसे नाटकीय बहस करता है।

बहसों में वह कहता है, "मेरी दलील यह है कि आप लोग कौन हैं? आपने इस अदालत को नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए समर्पित एक सरकारी शाखा होने के बजाय भेदभाव की रक्षक, सरकार की अभिभावक, पैसो वालों के हितों और बड़े व्यवसायों का गुलाम और आज, हलेलुय में बदल दिया है। आप एक मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति को मारना चाहते हैं।"

बस यही नहीं है। वह "चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स" को घुड़कता है, "जस्टिस एंटोनिन स्कैलिया" को डांटता है और "जस्टिस क्लेयर थॉमस" को भला-बुरा कहता है।

उसका साथी डेनी क्रेन भी बहुत पीछे नहीं है और वह खुली कोर्ट में कई सिनेमाई आज़ादी लेता है, (जस्टिस रुथ बेडर गिन्सबर्ग के साथ) चुलबुलापन और इश्कबाज़ी करता है। हालांकि SCOTUS के "जस्टिस" एलन शोर और डेनी क्रेन की बेवकूफियों के बावजूद उन्हें अदालत से बाहर जाने देते हैं। अगर एलन शोर ने भारत की सुप्रीम कोर्ट में यह इस स्टंट करने की कोशिश की होती, तो बहुत हद तक यह संभव है कि उसे तिहाड़ जेल में रातें बितानी पड़ जातीं।

बोस्टन लीगल में एलन शोर

दिलचस्प बात यह है कि इस एपीसोड को 22 अप्रैल 2008 को प्रसारित किया गया था और इससे ठीक छह दिन पहले, वास्तविक SCOTUS ने ऐसे ही एक मामलें में दलीलें सुनी थी और फैसला सुरक्षित रखा था। 'कैनेडी बनाम लुइसियाना' - 554 यूएस 407 (2008) मामले में कुछ महीने बाद फैसला सुनाया गया, जिसमें SCOTUS ने कोकर में निर्धारित अनुपात को संशोधित/ बड़ा कर दिया और चाइल्ड रेप में ( बिना किसी अन्य हिंसक अपराध की स्थिति में) अनिवार्य मौत की सजा के कानून को भी खत्म कर दिया।

SCOTUS अमेरिकी संविधान के आठवें संशोधन पर भरोसा किया था, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ "अत्यधिक" या "क्रूर" दंडों पर रोक लगाई गई थी। इसने पांचवें संशोधन और चौदहवें संशोधन (विधिसम्मत प्रक्रिया) पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया है कि किसी दोषी को मौत की सजा का कानून, यद्यप‌ि उसने बच्चे पर बलात्कार किया है, लेकिन न तो हत्या करता है और न ही पीड़ित को मारने का इरादा रखता है, असंवैधानिक है।

यह भारत में ऐसे मामलों में कानून की स्थिति स्‍पष्ट करता है।

निर्भया मामले में हुए आंदोलनों के बाद आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के जर‌िए में धारा 376 आईपीसी (बलात्कार से संबंध‌ित) में काफी संशोधन किया गया था। धारा 376A को सम्मिलित किया गया था, जिसमें अगर रेप के कारण पीड़‌ित की स्‍थायी रूप से 'वेजिटेट‌िव स्टेट' में पहुंच जाता है तो, कठोर कारावास की सजा का प्रावाधान किया गया है, जो‌ कि 20 वर्ष से कम अवधि की नहीं हो।

2018 में एक अन्‍य संशोधन में धारा 376AB को डाला गया, जिसमें 12 साल से कम की बच्‍ची पर बलात्कार करने पर कठोर सश्रम कारावास, जिसकी अवधि 20 साल से कम नहीं होगी, या आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है। POCSO एक्ट की धारा 6 में भी मौत की सजा का प्रावाधान करने के लिए संशोधन किया गया।

भारत में बलात्कार कानून के किए गए हालिया संशोधन और बलात्कार के संभावित अपराधियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान कोकर और कैनेडी में SCOTUS फैसलों के लिए अलग है। SCOTUS तेजी से रेप के मामलों में मृत्युदंड के सीमित प्रयोग की ओर बढ़ गया है। वास्तव में एनमंड बनाम फ्लोर‌िडा- 458 U.S 782 (1982) में, SCOTUS ने लूटपाट और हत्या के मामले में मदद और उकसाने के दोषी को मृत्युदंड नहीं दिया था, वारदात के दौरान हत्या हुई थी, लेकिन मारने का इरादा या प्रयास नहीं था।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट

इसमें कोई संदेह नहीं कि जब निर्भया मामले की जानकारी सामने आई थी, राष्ट्र की सामूहिक चेतना को गहरा झटका लगा था। निर्भया पहली नहीं थी और दुर्भाग्य से वह इस बर्बर अपराध का शिकार होने वाली भारत की आखिरी बेटी भी नहीं थी। लेकिन क्या मौत की सजा रामबाण है? निर्भया के तत्काल बाद गठित जस्टिस जेएस वर्मा समिति ने ऐसा नहीं सोचा था। 23 जनवरी 2013 की अपनी रिपोर्ट में, यह रेप के लिए सजा के रूप में मृत्युदंड का समर्थन नहीं करती है।

यह आलेख बलात्कार के अपराध में मृत्युदंड के पक्ष में या व‌िरोध में निर्णय लेने की कोशिश नहीं करता है। ऐसा करने की यह जगह या समय नहीं है। बलात्कार के मामलों के लिए, मौत की सजा के खिलाफ और मौत की सजा के पक्ष में, मजबूत तर्क हैं, जिन पर एक अलग आलेख लिखा जा सकता है। आज या कल भारत की सुप्रीम कोर्ट पर सवाल पर विचार करेगी। और उस दिन, किसे पता है, एलन शोर की आत्मा एक निर्भ‌ीक वकील की आत्मा पर हावी हो जाए, और अभेद्य दीवारों में घुस आए, और सुप्रीम कोर्ट के अभेद्य मन में छेद कर दे।

लेखक के व्यक्तिगत व‌िचार हैं।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं, और प्रैक्टिस करते हैं।)

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