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सुप्रीम कोर्ट के नए जजों की सूची में जस्टिस कुरैशी का न होना परेशान करने वाले सवाल उठाता है

Manu Sebastian
30 Aug 2021 1:25 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट के नए जजों की सूची में जस्टिस कुरैशी का न होना परेशान करने वाले सवाल उठाता है
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सुप्रीम कोर्ट में जजों की नौ नई नियुक्तियों की मौजूदा सूची में जस्टिस अकील कुरैशी की अनुपस्थिति चर्चा का ज्वलंत विषय बन गई है। जस्टिस कुरैशी से जुड़ा विवाद पहली बार 2018 में सामने आया था। तब वे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुभाष रेड्डी की पदोन्नति के बाद इसके वरिष्ठतम न्यायाधीश के रूप में गुजरात हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनने वाले थे। हालांकि उन्हें बॉम्बे हाईकोर्टमें स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उन्हें पांचवें नंबर का निम्न वरिष्ठता का पद लेना था। गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने स्थानांतरण का जोरदार विरोध किया, जिससे जस्टिस कुरैशी की ईमानदारी और क्षमता की दृढ़ता से पुष्टि हुई, और उनका स्थानांतरण पूर्णतया अनुचित करार दिया गया।

मई 2019 में, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस कुरैशी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की सिफारिश की। हालांकि, केंद्र सरकार ने चुनकर जस्टिस कुरैशी की पदोन्नति की मंजूरी रोक दी, जबकि जिन अन्य नामों की सिफारिश उस सूची में की गई थी, (जस्टिस डीएन पटेल, जस्टिस वी

रामसुब्रमण्यम और जस्टिस आरएस चौहान को क्रमशः दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के रूप में अनुशंसित किया गया था) उन्हें केंद्र सरकार ने अनुमोदित किया था।

इसके चलते गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर केंद्र को जस्टिस कुरैशी की पदोन्नति की सिफारिश पर कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की। जस्टिस कुरैशी की पदोन्नति के मामले की पैरवी के लिए जीएचसीएए के ओर से फली एस नरीमन, अरविंद दातार, दुष्यंत दवे, यतिन ओझा, मिहिर ठाकोर, पर्सी कविता आदि जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक पैनल पेश हुई। हालांकि, केंद्र बिना कोई कारण बताए अपने पैर खींचता रहा। सिफारिश के चार महीने बाद सितंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मिन‌िस्ट्री ऑफ जस्टिस से कुछ बातचीत के बाद अलग प्रस्ताव रखा,, जिसके तहत

जस्टिस कुरैशी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जहां तीन क्षेत्री‌य बेंच और 53 जज ‌थे ) के बजाय त्रिपुरा हाईकोर्ट (4 जज की हाईकोर्ट) में पदोन्नत करने की बात कही गई। संशोधित प्रस्ताव, जो एक तरह के 'निपटान' की तरह लग रहा था, को केंद्र ने स्वीकार कर लिया और तब से जस्टिस कुरैशी त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर हैं। न्यायिक पक्ष में, कोर्ट ने कॉलेजियम की सिफारिशों पर कार्रवाई करने के लिए केंद्र के लिए एक समय सीमा निर्धारित करने के मुद्दे को संबोधित किए बिना जीएचसीएए की याचिका का निपटारा कर दिया ।

चूंकि इन फैसलों के पीछे के कारणों को जनता के सामने प्रकट नहीं किया जाता है, इसलिए किसी को अटकलों पर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक आम समझदारी है कि जस्टिस कुरैशी अपने कुछ निर्णयों के कारण केंद्र सरकार के लिए एक अवांछित व्यक्ति हैं। 2010 में जस्टिस कुरैशी ने भाजपा नेता अमित शाह, जो गुजरात के तत्कालीन कनिष्ठ गृह मंत्री थे, को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ हत्या मामले में दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। जस्टिस कुरैशी ने 2012 में एक फैसले के तहत (सेवानिवृत्त) जस्टिस आरए मेहता की लोकायुक्त के रूप में नियुक्ति को बरकरार रखा ‌था, जो राज्य सरकार के लिए एक झटका था।

2016 में नरोदा पाटिया हत्याकांड मामले में माया कोडनानी (जो गुजरात सरकार में मंत्री थीं) और कुछ अन्य लोगों की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर सुनवाई से उन्हें हटाने का प्रयास किया गया था। जस्टिस कुरैशी से संबंधित एक वरिष्ठ वकील, जो कि अंतिम समय में एक पक्ष की ओर से पेश हुआ था, ज‌‌स्टिस कुरैशी को मामले से अलग करने की मांग की थी।

जस्टिस कुरैशी ने अलग हटने के मुद्दे पर द‌िए आदेश में कहा, "जब वरिष्ठ अधिवक्ता मामले में अंतिम चरण में पेश होते हैं, तो हमें आश्चर्य होता है कि यह बेहतर नहीं होता कि अगर वकील अदालत से ऐसा करने का अनुरोध करने के बजाय खुद को अलग कर लेते।" उन्होंने इस प्रकरण पर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, "यह बहुत दुखद है। हम कुछ नहीं कहेंगे लेकिन यह संस्था की छवि और लोगों के विश्वास को धूमिल करता है ... ऐसा नहीं होना चाहिए था।"

मई 2018 में उनकी अध्यक्षता वाली एक पीठ ने ओड में गोधरा के बाद हुए दंगों में शामिल 19 आरोपियों की सजा को बरकरार रखा, जहां मार्च 2002 में महिलाओं और बच्चों सहित 23 लोगों को भीड़ ने जिंदा जला दिया था। जस्टिस कुरैशी ने अपने फैसले में कहा," इन घटनाओं को हम अक्सर सांप्रदायिक बताते हैं। पागलपन पूरी तरह से सामान्य इंसानों को पल भर में जानलेवा राक्षसों में बदल देता है, पीड़ितों और उनके अपने परिवार के लिए मौत और विनाश के निशान के अलावा कुछ भी नहीं छोड़ता है।"

देश के दूसरे वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीश

नवीनतम सिफारिशें करते हुए, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाईकोर्ट के सबसे वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीश एएस ओका को चुना लेकिन अगले वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीश एएस कुरैशी को हटा दिया। कुछ रिपोर्टों है कि सितंबर 2019 के बाद से लगभग दो साल तक उच्चतम न्यायालय में नियुक्तियों पर रोक इसलिए रही कि जस्टिस नरीमन का आग्रह रहा कि जस्टिस कुरैशी को पदोन्नत किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि नौ नामों की मौजूदा सूची को जस्टिस नरीमन के सेवानिवृत्त होने के बाद के सप्ताह में पांच सदस्यीय कॉलेजियम ने मंजूरी दी थी।

इस बार, कॉलेजियम का ध्यान वरिष्ठता की तुलना में विविधता पर अधिक था, क्योंकि चार जजों- दो महिलाओं और हाशिए के समुदायों के दो व्यक्तियों को पदोन्नत किया गया है। लेकिन यह अभी भी जस्टिस कुरैशी के निष्कासन की व्याख्या नहीं करता है, क्योंकि एक और रिक्त पद खाली है। यदि कॉलेजियम न्यायाधीशों के साथ खड़ा नहीं होने का विकल्प चुनता है और न्यायिक नियुक्तियों में कार्यकारी की दिशा का पालन करने का विकल्प चुनता है, तो न्यायिक स्वतंत्रता के लिए इससे बड़ा खतरा कुछ और नहीं हो सकता है। इस तरह के उदाहरण एनजेएसी को रद्द करने और न्यायिक स्वतंत्रता के नाम पर न्यायपालिका द्वारा न्यायिक नियुक्तियों की शक्ति अपने पास रखने को अर्थहीन बना देते हैं।

हमेशा संवैधानिक अधिकारों के लिए खड़े रहने वाले मेधावी जज

जस्टिस कुरैशी की योग्यता पर कोई सवाल नहीं रहा है। जज के साथ खड़ा होना किसी जज की ईमानदारी और क्षमता का सबसे मजबूत सबूत होता है। जस्टिस कुरैशी का होम बार, गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन हमेशा उनके पीछे खड़ा रहा है और यहां तक ​​कि सुप्रीम कोर्ट में उनकी पदोन्नति के लिए एक याचिका दायर करने की हद तक चला गया है।

त्रिपुरा हाईकोर्ट में जस्टिस कुरैशी नागरिक स्वतंत्रताओं पर उल्लेखनीय निर्णय दिया है और सोशल मीडिया पोस्ट में सरकार की आलोचना के बाद गिरफ्तार व्यक्तियों को सुरक्षा दी है। आईपीसी की धारा 295ए पर हाल के एक फैसले में उन्होंने कहा कि किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण इरादे के बिना लापरवाही में किया गया धर्म का अपमान दंडनीय अपराध नहीं होगा।

त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी कुछ उल्लेखनीय कार्रवाइयों इस प्रकार हैं- उन्होंने एक नाबालिग लड़की की तस्करी के बारे में रिपोर्टों का स्वत: संज्ञान लिया, एक वीडियो के सार्वजनिक रूप से लीक होने पर एक जोड़े की आत्महत्या की घटना की एसआईटी जांच आदेश स्वत: संज्ञान लेकर दिया, राज्य में COVID प्रबंधन की निगरानी और वैक्सीन वितरण की निगरानी ; एक विवाह कार्यक्रम को रोकने के लिए एक जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए अधिकार के दुरुपयोग की घटना में हस्तक्षेप किया; COVID के दौरान अनाथालयों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए ; जिला न्यायपालिका में रिक्त पदों को भरने के निर्देश दिए।

असहमति के फैसले में उन्होंने जो फैसले दिए हैं, उनमें गुजरात हाईकोर्ट में गूलरोख गुप्ता मामले दिया गया निर्णय धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देने के कारण उल्लेखनीय है। मामला यह था कि क्या कोई पारसी महिला किसी गैर-पारसी पुरुष से शादी करने पर पारसी नहीं रह जाएगी। मामले में बहुमत का मानना ​​था कि एक गैर-पारसी के विवाह का मतलब होगा कि महिला ने पारसी धर्म को त्याग दिया है, जबकि जस्टिस कुरैशी ने असहमति जताई। उन्होंने कहा था, "एक धर्मनिरपेक्ष राज्य और संवैधानिक दर्शन में, जिसे हमने अपनाया है, यह कल्पना करना असंभव होगा कि विभिन्न धर्मों से संबंध‌ित दो व्यक्तियों को वैध विवाह की अनुमति नहीं दी जाएगी, जब तक कि उनमें से कम से कम एक अपने धर्म को त्यागने और धर्मांतरण स्वीकार करने के लिए तैयार न हो।" यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष है।

ईमानदार जजों को मनोबल गिराने वाला संदेश

जस्टिस कुरैशी 7 मार्च, 2022 को हाईकोर्ट के जज के रूप में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इससे पहले, 4 जनवरी, 2022 को जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की सेवानिवृत्ति के साथ, सुप्रीम कोर्ट में एक और पद खाली होने वाला है।

हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में अपनी सेवानिवृत्ति से पहले जस्टिस कुरैशी को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने से इनकार करने से, जिसके वे विधिवत हकदार हैं, एक दुखद संदेश जाएगा कि जो न्यायाधीश अपने संवैधानिक कर्तव्यों के अनुसार कार्यपालिका पर नियंत्रण रखते हैं, उन्हें दरकिनार कर दिया जाएगा।

न्यायाधीशों को कार्यपालिका के अतिरेक से बचाने में कॉलेजियम के विफल होने का यह पहला उदाहरण नहीं है। 2017 में, जस्टिस जयंत पटेल को उनकी उचित पदोन्नति से इनकार करने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। कयास लगाए जा रहे थे कि जस्टिस पटेल विवादास्पद इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की सीबीआई जांच का निर्देश देने की कीमत चुका रहे हैं। उनकी निगरानी के दौरान ही सीबीआई ने आईबी और गुजरात पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को नामजद करते हुए मामले में चार्जशीट दाखिल की थी। उनके स्थानांतरण की बार के कई वरिष्ठ सदस्यों द्वारा व्यापक रूप से निंदा की गई थी, जिसके खिलाफ कई बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पारित किए थे। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने टिप्पणी की थी कि जस्टिस पटेल को सरकार के दबाव में नहीं झुकने के लिए परेशान किया गया था।

समापन से पहले, एनजेएसी के फैसले के एक उद्धरण का उल्लेख करना उचित होगा-

"न्यायपालिका से इस देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की अपेक्षा, शासन के अन्य अंगों से इसे पूरी तरह से अछूता और स्वतंत्र रखकर ही सुनिश्चित की जा सकती है।"

(मनु सेबेस्टियन लाइवलॉ के प्रबंध संपादक हैं। उनसे manu@livelaw.in पर संपर्क किया जा सकता है । उनका ट्व‌िटर का पता @manuvichar है।)

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