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सीजेआई बोबडे का एक सालः उन मामलों पर एक नजर, जिनमें महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों का जवाब दिया जाना है

Manu Sebastian
18 Nov 2020 2:03 PM GMT
सीजेआई बोबडे का एक सालः उन मामलों पर एक नजर, जिनमें महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों का जवाब दिया जाना है
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एसए बोबडे ने 18 नवंबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में एक वर्ष पूरा किया, ऐसे में उन प्रमुख मामलों पर एक नजर डालना आवश्यक है, जिनमें संविधान संबंध‌ित महत्वपूर्ण सवालों का जवाब दिया जाना है। उन सभी मसलों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है।

जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द करने, नागरिकता संशोधन अधिनियम की संवैधानिकता और चुनावी बांड की वैधता के ख‌िलाफ दायर या‌चिकाओं जैसे राष्ट्रीय महत्व के कई मसलों को तय करने में तत्परता नहीं दिखाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की काफी आलोचना हो चुकी है।

दिसंबर 2019 में संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम, पहला प्रमुख मुद्दा था, जिसका सामना पद संभालने के बाद ही सीजेआई को करना पड़ा था।

नागरिकता संशोधन अधिनियम और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के बारे में घोषणाओं ने देश भर में बड़े पैमाने पर नागरिक विरोध आंदोलनों को हवा दी, जिसे राज्य सरकारों ने धारा 144, पुलिस क्रैकडाउन, इंटरनेट शटडाउन आदि के जर‌िए से क्रूरता से दबाने का प्रयास किया था।

भारतीय नागरिकता की मूल अवधारणाओं में परिवर्तन और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के बारे में अनिश्चितता और इसके स्पष्ट अग्रदूत राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बारे में चिंताओं के कारण देश में उथल-पुथल की स्थिति पैदा हुई ‌थी। सीएए-एनपीआर-एनआरसी के खिलाफ विभिन्न पक्षों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में 140 से अधिक रिट याचिकाएं दायर की गई हैं।

इनमें से कई नागरिकता से संबंधित मुद्दों पर एक समीचीन और आधिकारिक घोषणा के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रही हैं, जबकि सीजेआई बोबडे ने सबरीमाला समीक्षा के तहत उठे आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के सवालों को प्राथमिकता दी है।

सीजेआई ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सबरीमाला समीक्षा आदेश के संदर्भ में उन पर न्यायिक समीक्षा की सीमा से संबंधित कई प्रश्नों को तय करने और न‌िर्ण‌ित करने के लिए नौ जजों की पीठ का गठन किया है। सीएए याचिकाओं को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग उठने पर सीजेआई ने कहा था'सबरीमाला संदर्भ के बाद'।

मार्च में, COVID-19 महामारी की शुरुआत के साथ, सुप्रीम कोर्ट का नियमित कामकाज का पटरी से उतर गया था। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल मोड में सुनवाई की गई। कोर्ट ने कुछ समय के लिए सीम‌ित स्तर पर काम किया, केवल अत्यावश्यक मामलों को सूचीबद्ध किया गया।

धीरे-धीरे, अदालत और कानूनी समुदाय ने अपरिहार्य प्रारंभिक उहापोह को पार करते हुए वर्चुअल कामकाज में खुद को ढाल लिया। खुद सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया है कि जटिल मुद्दों से जुड़े प्रमुख मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आसानी से हो सकती है।

उदाहरण के लिए, एमएचए के वेतन आदेश की वैधता, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6, फैक्ट्रीज़ अधिनियम के तहत गुजरात के आदेशों की वैधता, यूजीसी की परीक्षा अधिसूचना और यहां तक ​​कि प्रशांत भूषण की अवमानना ​​मामले को संबंधित पक्षों को पूरी तरह से सुनने के बाद मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जर‌िए निर्णय लिया गया है।

यहां तक ​​कि 5-जजों की बेंच, जिसने पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए इन-सर्विस कोटे से संबंधित मामले में निर्णय दिया, ने पूरी तरह से वीसी के माध्यम से सुनवाई की। हाल ही में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी फ्रैंकलिन टेम्पलटन के मामले में फैसला देकर दिखाया कि वीसी सुनवाई के माध्यम से जटिल मुद्दों, कई याचिकाकर्ताओं और ढेर सारे रिकॉर्डों से जुड़े मामले को भी तय किया जा सकता है।

इसलिए, अदालत ने प्रदर्शित किया है कि गंभीर संवैधानिक सवालों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए शारीरिक कार्यप्रणाली आवश्यक नहीं है।

इस पृष्ठभूमि में, हम महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर एक नजर डालते हैं, जिन्हें न्यायालय द्वारा सुना जाना है।

जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करना

जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति को राष्ट्रपति के आदेश के जर‌िए तब रद्द किया गया, जब जम्मू और कश्मीर राष्ट्रपति शासन के अधीन था और राज्य के अधिकांश नेता नजरबंद थे, जिससे अनुच्छेद 370 और जम्मू और कश्मीर और यूनियन ऑफ इंडिया के बीच इंस्ट्रयूमेंट ऑफ एक्सेसन के आधार पर संबंध की प्रकृति की व्याख्या से संबंधित गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठे। सुप्रीम कोर्ट में जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने की संवैधानिकता और राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाने और विभाजन पर सवाल उठाते हुए कई याचिकाएं दायर की गई हैं। सितंबर 2019 में, मामलों की सुनवाई के लिए जस्टिस एन वी रमना की अध्यक्षता में 5-जजों की पीठ का गठन किया गया। बेंच ने दिसंबर 2019 में प्रारंभिक बिंदु पर सुनवाई शुरू कर दी कि क्या मामलों को प्रेम नाथ कौल बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य [1959 AIR A49] और संपत प्रकाश बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य [1970 AIR 1118] में फैसलों के में बीच संभावित संघर्ष के मद्देनजर 7 जजों की पीठ को संदर्भित करने की आवश्यकता है।

2 मार्च, 2020 को, 5-जजों की बेंच ने बड़ी बेंच को संदर्भ‌ित करने की याचिका को खारिज कर दिया कि ओर कहा कि फैसले के बीच कोई संघर्ष नहीं है। उसके बाद इस मामले की सुनवाई नहीं की गई है।

चुनावी बांड

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन याचिकाओं पर निर्णय देने से इंकार करने के की कई ओर से आलोचना हो रही है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि बेनामी चुनावी बॉन्ड ने बेहिसाब धन के चैनलाइजेशन के माध्यम से सत्तारूढ़ पार्टी को भारी अवैध लाभ पहुंचाया है।

वित्त अधिनियम 2017 के प्रावधानों को, जिन्होंने बेनामी चुनावी बांड के लिए मार्ग प्रशस्त किया, के खिलाफ 2017 में याचिकाएं दायर की गईं थीं। वित्त अधिनियम 2017 ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, कंपनी अधिनियम, आयकर अधिनियम, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, और विदेशी योगदान विनियम अधिनियम में संशोधन पेश किए थे, जिससे चुनावी बांड के लिए रास्‍ता बना था।

हालांकि, यह मामला मार्च 2019 तक आगे आ पाया, तब तक अधिकांश चुनावी बांड खरीदे जा चुके थे।

उल्लेखनीय है, भारत के चुनाव आयोग ने पहले ही बांड की बेनामी प्रकृति के बारे में अपनी चिंताओं को व्यक्त करते हुए मामले में जवाबी हलफनामा दायर किया है। ईसीआई ने इसे "जहां तक ​​दान की पारदर्शिता का संबंध है, एक प्रतिगामी कदम बताया है" और इसे वापस लेने का आह्वान किया है।

केंद्र का दावा है कि ये योजनाएं राजनीतिक फंडिंग में और अधिक पारदर्शिता लाएंगी। इस योजना की बेनामी प्रकृति का उद्देश्य दानदाता की गोपनीयता की रक्षा करना था।

सीजेआई बोबडे के पदभार ग्रहण करने के बाद, कुछ मीडिया रिपोर्टों के आलोक में कि भारतीय रिजर्व बैंक और ईसीआई द्वारा उठाई गए गंभीर चिंताओं को अनदेखा करते हुए सरकार द्वारा चुनावी बांड लागू करने में जल्दबाजी की गई है, याचिकाकर्ताओं ने मामले की जल्द सुनवाई के लिए एक आवेदन दायर किया था।

जनवरी 2020 को, जब मामलों को आखिरकार सूचीबद्ध किया गया (अप्रैल 2019 के बाद), सीजेआई बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन्हें दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया।

तब से मामलों को पोस्ट नहीं किया गया है। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने हाल ही में बिहार चुनाव के लिए चुनावी बॉन्ड की अधिसूचना के मद्देनजर तत्काल पोस्टिंग के लिए एक नया आवेदन दायर किया, मामलों को सूचीबद्ध किए जाने का इंतजार है।

आरटीआई संशोधन को चुनौती

जनवरी 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद सूचना का अध‌िकार (संशोधन) अधिनियम 2019 की संवैधानिक वैधता के खिलाफ कांग्रेस सांसद जयराम रमेश द्वारा दायर य‌ाचिका में नोटिस जारी किया था। संशोधन ने सूचना आयुक्तों के निश्चित कार्यकाल को हटा दिया गया था, और उनका भुगतान और भत्ता कार्यकारी नियमों के अधीन कर दिया गया, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा तैयार किया जाएगा। संशोधन से पहले, RTI अधिनियम के तहत सूचना आयुक्तों को कार्यकाल की निश्चित अवधि दी गई थी और चुनाव आयुक्त के बराबर दर्जा और विशेषाधिकार दिए थे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे स्वतंत्र और स्वायत्त रूप से कार्य करते हैं। कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने सूचना आयुक्तों को उपलब्ध सुरक्षा को हटाने और आरटीआई कानून को कमजोर करने की कड़ी आलोचना की थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 31 जनवरी को नोटिस जारी किए जाने के बाद से याचिका को सूचीबद्ध नहीं किया गया है।

आधार अधिनियम को धन विधेयक के रूप में पारित करने की वैधता

13 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने एक पुराने संविधान पीठ के फैसले की शुद्धता पर संदेह जताया, जिसमें कहा गया था कि धन विधेयक के रूप में आधार अधिनियम 2016 को पारित करना वैध था।

आधार अधिनियम 2016 को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि राज्यसभा को दरकिनार करने के लिए कानून को 'धन विधेयक' के रूप में पारित किया गया था, जहां सत्तारूढ़ गठबंधन अल्पमत में था।

आधार मामले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के असहमतिपूर्ण फैसले कें राज्यसभा की चर्चाओं से बचने के लिए धन विधेयक प्रावधानों का दुरुपयोग करने की प्रथा को 'संविधान पर धोखाधड़ी' करार दिया ‌था।

रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इं‌डियन बैंक में, सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने केएस पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में बहुमत के फैसले की व्याख्या की शुद्धता पर संदेह जताया था, जिसमें कहा गया था कि आधार विधेयक अनुच्छेद 110 (1) के अर्थ में एक मनी बिल था।

रोजर मैथ्यू के फैसले ने उल्लेख किया था कि आधार के फैसले में बहुमत के आदेश में अनुच्छेद 110 (1) में केवल 'केवल' शब्द के प्रभाव की चर्चा नहीं की है और जब "मनी बिल" के रूप में पारित किए गए अधिनियमन के कुछ प्रावधान अनुच्छेद 110 (1) (ए) से (जी) के अनुरूप नहीं हैं, तो खोज के नतीजों की जांच नहीं की।

यह देखते हुए, रोजर मैथ्यू में बेंच ने इस मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेजा। इस मामले में एक निर्णय चुनावी बॉन्ड के मुद्दे पर भी प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि वित्त अधिनियम 2017 (जिसने चुनावी बॉन्ड योजना के लिए विधायी नींव रखी थी) को भी धन विधेयक के रूप में पारित किया गया था।

यद्यपि मामला पर्याप्त संवैधानिक महत्व का है, विधायी प्रक्रियाओं की पवित्रता और कानून बनाने में उच्च-सदन की भूमिका को स्पर्श करता है, फिर भी इस पर सीजेआई के कार्यकाल के दौरान कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

आरक्षण से जुड़े सवाल

जनवरी 2019 में पारित संविधान (103 वां) संशोधन अधिनियम, जिसने सरकारी नौकरियों और शैक्षिक सीटों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10% तक आरक्षण दिया ‌था, के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं का एक समूह लंबित है।

EWS कोटा, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लिए निर्धारित 50% सीलिंग सीमा से ऊपर है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आर्थिक स्थिति जैसी उतार-चढ़ाव वाली स्थिति को आरक्षण का मानदंड नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि सकारात्मक कार्रवाई का इरादा सामाजिक और सामुदायिक स्थिति के कारण उत्पन्न पिछड़ेपन को मिटाना है। मौजूदा आरक्षण के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को 10% तक कोटा प्रदान करने के लिए जगह बनाना, इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50% कैप का उल्लंघन करते हैं।

इस साल 5 अगस्त को - आदेशों को सुरक्षित रखने के एक साल बाद - सीजेआई बोबडे की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने ईडब्ल्यूएस कोटे से संबंधित मामले को बड़ी पीठ को संद‌र्भित कर दिया। जुलाई 2019 के संदर्भ पर आदेश सुरक्षित रखे गए थे।

एक अन्य मामले में एक अन्य पीठ ने मराठा कोटा मामले की वैधता को बड़ी पीठ को संदर्भित किया था।

दिल्ली-एलजी बनाम जीएनसीटी

फरवरी 2019 में, सुप्रीम कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने, दिल्ली में प्रशासनिक सेवाओं को कौन नियंत्रित करे- केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त लेफ्टिनेंट जनरल या दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की निर्वाचित सरकार-के मसले पर एक विभा‌जित फैसला सुनाया था।

पीठासीन जज, जस्टिस सिकरी ने कहा कि संयुक्त सचिव से ऊपर के अधिकारियों के स्थानांतरण और नियुक्त‌ि की शक्ति दिल्ली के लेफ्टिनेंट जनरल की शक्तियों के अधीन है; अन्य अधिकारी दिल्ली सरकार के नियंत्रण में हैं। दूसरी ओर, जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि "सेवाएं" पूरी तरह से दिल्ली सरकार के दायरे से बाहर हैं।

विभाजित फैसले के मद्देनजर, इस मामले को बड़ी बेंच को भेजा गया था।

संदर्भ को CJI बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा निपटाया जा रहा है। मामला आखिरी बार 18 फरवरी, 2020 को सूचीबद्ध किया गया था।

ट्रिपल तलाक के अपराधीकरण के लिए चुनौती

अगस्त 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच पर नोटिस जारी किया, जो 'ट्रिपल तलाक' देने को अपराध बनाता है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 'ट्रिपल तलाक' को दंडित करना, जब कि इस प्रथा को पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया है, मनमाना और अनुचित है। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि यह प्रावधान धार्मिक आधार पर भेदभावपूर्ण है, क्योंकि किसी अन्य धर्म से संबंधित व्यक्ति द्वारा पत्नी के साथ की गई निर्दयता को दंडित नहीं किया जाता है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, कानून मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय को आतंकित करने और निशाना बनाने का एक प्रयास है।

नोटिस जारी होने के बाद मामले ने अदालत में कोई कार्रवाई नहीं की है।

UAPA संशोधन को चुनौती

सितंबर 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए संशोधन अधिनियम 2019 को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर नोटिस जारी किया था, जो केंद्र सरकार को एक व्यक्ति को "आतंकवादी" के रूप में अधिसूचित करने का अधिकार देता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एक व्यक्ति को आतंकवादी के रूप में अध‌िसूचित करना मनमाना है, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, और केंद्र सरकार को "अनियंत्रित और अबाधित विवेकाधीन शक्तियों" प्रदान करता है।

किसान अधिनियम

हाल ही में बनाए गए तीन किसान कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई है।

पिछले महीने, सीजेआई बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (कृषि और संवर्धन) अधिनियम, 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम पर किसानों (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020 के के खिलाफ दायर याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था।

सीजेआई बोबडे (जो 24 अप्रैल, 2021 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं) के कार्यकाल के बचे हुए पांच महीनों में इन मामलों पर अंतिम निर्णय की उम्मीद करना बेमानी है। फिर भी, उम्‍मीद है कि सीजेआई कम से कम इनमें से कुछ मामलों में सुनवाई को प्राथमिकता देने के लिए उपाय करेंगे।

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