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कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी: महामारी के दौर का एक ऐतिहासिक फैसला

LiveLaw News Network
31 March 2020 4:15 AM GMT
कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी: महामारी के दौर का एक ऐतिहासिक फैसला
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नदीम कोट्टाल‌ा‌थ

जब भी महामारियों फैलती हैं, ऐसी प्लेसिबो और नकली दवाएं की बाढ़ आ जाती है, जिनका दावा होता है कि वो बीमारी का इलाज कर सकती हैं। कई ऐसे लोग होते हैं, जिनकी कोश‌िश रहती है कि ऐसी बीमारियों के इलाज में स्‍‌थाप‌ित औषधीय प्रणाली की व‌िफलता का फायदा उठाकर समाज के सीधे-सादे लोगों को जादुई इलाज का लालच देकर तुरंत पैसे कमा लें।

इंग्लैंड में फैली इन्फ्लूएंजा महामारी के दिनों में एक कंपनी ने ऐसी ही को‌शिश की थी, जिसके बाद अनुबंध कानून और उपभोक्ता अधिकारों के मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय, कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी (1892) , का जन्म हुआ।

यह घटना उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक की है। पूरी दुनिया में इन्फ्लुएंजा फैला था। उस समय 10 लाख लोग वायरस का श‌िकार हुए थे। लंदन में स्थित एक फार्मास्युटिकल कंपनी कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी ने महामारी के प्रकोप से पैदा हुई मेडिकल इमर्जेंसी को भुनाने के लिहाज से एक स्मोक बॉल लांच किया।

कंपनी का दावा ‌था कि यह उत्पाद इन्फ्लूएंजा का इलाज कर सकता है। स्मोक बॉल कार्बोलिक एसिड से भरा एक इन्हेलर था।

दावा किया गया कि जो भी व्यक्ति स्मोक बॉल का उपयोग करता है, उसे इन्फ्लूएंजा नहीं होगा। कंपनी ने अखबारों में विज्ञापन दिया कि अगर किसी व्यक्ति को दो हफ्ते तक दिन में तीन बार स्मोक बॉल का इस्तेमाल करने के बाद भी फ्लू होता है तो उसे £100 का इनाम दिया जाएगा, और इस मद में एलायंस बैंक में £1000 जमा किए गए।

लंदन की एक महिला लुइसा एलिजाबेथ ने विज्ञापन देखा ओर एक स्मोक बॉल खरीदी। उन्होंने कंपनी के निर्देशों के अनुसार ही इस्तेमाल किया। फिर भी उन्हें इन्फ्लूएंजा हो गया। जिसके बाद उन्होंने मुआवजे का दावा किया, हालांकि कंपनी ने मुआवजे देने से इनकार कर दिया। लुइसा एलिजाबेथ ने कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर किया।

कोर्ट में कंपनी का प्रतिनिधित्व लंदन के बैरिस्टर एचएच अस्‍क्व‌िथ ने किया। उन्होंने अपनी दलीलों से अनुबंध कानून की पेचीदगियों को समझाया। उन्होंने तर्क दिया कि कंपनी की ओर से किसी प्रस्ताव के अभाव में और श्रीमती एलिजाबेथ द्वारा उसे स्वीकार किए जाने के बाद, दोनों पक्षों के बीच कोई वैध अनुबंध नहीं था।

उन्होंने तर्क दिया कि कंपनी का विज्ञापन एक दांव था, कंपनी का श्रीमती एलिजाबेथ के साथ किसी संविदात्मक संबंध का इरादा नहीं था।

हालांकि कोर्ट ने अस्‍क्‍विथ के तर्कों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि कंपनी का विज्ञापन वैध प्रस्ताव ‌था और श्रीमती एलिजाबेथ ने, ‌विज्ञापन के परीणामस्वरूप, स्मोक बॉल खरीदकर उक्त प्रस्ताव को स्वीकार किया था।

कोर्ट ने कहा कि कंपनी ने बैंक में £ 1000 की राशि जमाकर अनुबंधात्मक संबंध में प्रवेश करने के इरादे का संकेत भी दिया था। ऐतिहास‌िक फैसले में कोर्ट ने श्रीमती एलिजाबेथ को मुआवजा देने का आदेशा दिया था।

अपीलीय न्यायलय के तीन जजों- लॉर्ड जस्टिस लिंडले, लॉर्ड जस्टिस बोवेन और लॉर्ड जस्टिस एएल स्मिथ के फैसले के प्रमुख बिंदु निम्न हैं-

-प्रस्ताव लागू करने के लिहाज से अस्पष्ट नहीं था।

-कंपनी ने बैंक में £ 1000 जमा कर संविदात्मक संबंध बनाने के अपने इरादे का संकेत दिया था।

-कंपनी पेशकश पूरी दुनिया के लिए थी, हालांकि अनुबंध उसी व्‍यक्ति के साथ होना था, जिसने उत्पाद खरीदा था।

-प्रस्ताव की स्वीकृति की सूचना देना आवश्यक नहीं था; उत्पाद का प्रदर्शन और आचरण स्वीकृति की सूचना देने के बराबर है।

-वादी ‌को उत्पाद का उपयोग करने पर असुविधा हुई, जबकि कंपनी को अतिरिक्त बिक्री का लाभ मिला।

लॉर्ड बोवेन ने कहा,

"अगर मैं किसी व्यक्ति से कहता हूं, यदि आप एक सप्ताह के लिए इस दवा का उपयोग करें हैं तो मैं आपको 5l दे दूंगा, और वह इसका उपयोग करता है तो यह वादे के लिए पर्याप्त विचार है।"

लॉर्ड बोवेन ने अपने फैसले में आगे कहा, "अगर मैं विज्ञापन देता हूं कि मेरा कुत्ता खो गया है, और जो भी कुत्ते को खोज कर लाता है, उसे पैसे दिए जाएंगे, तो क्या पुलिस या अन्य वे सभी व्यक्ति, जिनका काम खोए हुए कुत्तों को खोजना है, वो मुझसे नहीं कहेंगे कि उन्होंने मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है? क्यों? निश्चित रूप से, जैसे ही वो कुत्ते को खोज लेंगे, विज्ञापन की शर्त पूरी हो जाएगा। सार यह है कि कुत्ते को खोजा जाना चाहिए और ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक नहीं है, जैसा कि मुझे लगता है, अनुबंध को बाध्यकारी बनाने के लिए स्वीकृति की कोई अधिसूचना दी जानी चाहिए।

यह इस बात का अनुसरण है कि शर्त को पूरा करना, अधिसूचना के बिना, पर्याप्त स्वीकृति है। एक व्यक्ति जो विज्ञापन में कोई शर्त रखता है, उसे आम समझ के अनुसार ही समझा जाएगा। इसलिए, वह अपने प्रस्ताव में निहित रूप से संकेत देता है कि उसे प्रस्ताव की स्वीकृति आवश्यकता नहीं है।"

लॉर्ड स्‍मिथ ने कहा कि विज्ञापन में एक प्रस्ताव दिया गया था, जिस पर अमल किया जाना था। जब अमल किया गया है, तब शर्तों के अनुसार भुगतान किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा यदि दुनिया के लिए कोई प्रस्ताव है, जिसमें कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रदर्शन की अधिसूचना की आवश्यकता नहीं है, तो प्रस्ताव में निर्दिष्ट शर्त का प्रदर्शन की स्वीकृति माना जाएगा। कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि विज्ञापन में दिया गया प्रस्ताव एक 'दांव' था।

इस फैसले ने एक मिसाल कायम की थी कि एकतरफा पेशकश भी बाध्यकारी अनुबंध का कारण बन सकती है। अभी भी दुनिया भर में कानून के विद्यार्थ‌ियों को अनुबंध कानून की अनिवार्यता को समझाने के लिए एक संदर्भ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इस फैसले से न केवल उपभोक्ता आंदोलन के इतिहास का पता लगाया जा सकता है, बल्‍कि इस मामले ने पहली बार उत्पाद के न्यूनतम गुणवत्ता मानक के लिए निर्माताओं की देयता भी तय की थी। यह मामला इतिहास में अनुबंध कानून के न्यायशास्त्र में योगदान के लिए जाना जाता है। साथ ही यह मामला उस वकील के लिए भी, जाना जाता है, जिसने कंपनी का प्रतिनिधित्व किया था।

दरअसल, मामले के तुरंत बाद, एचएच अस्क्विथ ने वकालत छोड़कर राजनीतिज्ञ बन गए थे। बाद में वह यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बने और आठ साल तक ब्रिटिश साम्राज्य का नेतृत्व किया।

(लेखक कालीकट, केरल में वकील हैं)

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