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बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन: क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया किसी बार एसोसिएशन के मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है?

LiveLaw News Network
18 May 2020 4:25 PM GMT
बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन: क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया किसी बार एसोसिएशन के मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है?

अनुराग भास्कर

पृष्ठभूमि

हाल ही में, एक अभूतपूर्व कदम के तहत, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अपने सचिव को निलंबित करने के फैसले को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। जवाब में, एससीबीए ने बीसीआई को लिखा कि "बीसीआई के पास एससीबीए सहित देश में किसी भी बार एसोसिएशन को नियंत्रित करने की शक्ति या अधिकार नहीं है।"

जिसके बाद, बीसीआई ने एससीबीए अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया और पूछा कि क्यों न उनके खिलाफ, प्रस्ताव पर कार्रवाई करने से इनकार करने के कारण, अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

यह पूरा प्रकरण बीसीआई के अधिकार और अधिकार क्षेत्र के बारे में व्यापक सवाल उठाता है। सोचना होगा कि- क्या बीसीआई बार एसोसिएशन (इस मामले में, एससीबीए) के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है?

बीसीआई की शक्तियां

बीसीआई अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है। अधिनियम की धारा 7 के तहत, इसे कई कार्यों के निर्वहन की जिम्‍मेदारी दी गई है, जैसे "पेशेवर आचरण के मानक और शिष्टाचार तय करना", अधिवक्ताओं के अधिकारों, विशेषाधिकारों और रुचियों की सुरक्षा करना, कानून सुधार को बढ़ावा देना और समर्थन करना, राज्य बार काउंसिल पर नियंत्रण और सामान्य पर्यवेक्षण आदि।" उक्त कानून बार एसोसिएशनों पर इकाई के रूप में पर्यवेक्षण का अधिकार प्रदान नहीं करता है।

बार एसोसिएशंस का एकमात्र संदर्भ अधिनियम की धारा 6 में पाया जा सकता है, जहां स्टेट बार काउंसिल के कार्यों का विवरण है। इसमें कहा गया है कि राज्य बार काउंसिल का एक कार्य "कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन के उद्देश्य से बार एसोसिएशनों के विकास को बढ़ावा देना" है। यह एक सहायक कार्य है न कि नियामक या पर्यवेक्षी भूमिका है। प्रथम दृष्टया अध्ययन से संकेत मिलता है कि ये दो प्रावधान (धारा 6 और 7) बीसीआई या स्टेट बार काउंसिल को बार एसोसिएशन के आंतरिक मामलों में पर्यवेक्षी प्राधिकार प्रदान नहीं करते हैं।

धारा 36 के तहत, बीसीआई एक "अधिवक्ता" के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है, जो "पेशेवर या अन्य कदाचार" का दोषी हो। इस संबंध में बीसीआई द्वारा तैयार "रूल्स ऑन प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स", एक अधिवक्ता के व्यावसायिक आचरण को नियंत्रित करता है। लेकिन क्या यह प्रावधान एससीबीए या किसी अन्य बार एसोसिएशन के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए बीसीआई को सक्षम बनाता है?

क्या बीसीआई, एससीबीए के फैसले को अधिक्रमित कर सकती है?

एससीबीए वकीलों का एक निजी संगठन है, जिसे सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्‍ट, 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत किया गया है। इसके अपने नियम और विनियम / उपनियम हैं। एससीबीए में उत्पन्न कोई भी विवाद उन्हीं नियमों, विनियमों और सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट से शासित होंगे। एससीबीए के सदस्य के खिलाफ की गई शिकायत के निस्तारण के लिए 'रूल्स एंड रेगुलेशन ऑफ एससीबीए' सिस्टम प्रदान करते हैं।

नियम 35 में यह प्रावधान है कि एससीबीए गलत आचरण को दोषी पाए गए किसी सदस्य को किसी विशेष अवधि के लिए निष्कासित या निलंबित कर सकती है। एससीबीए के "निजी कार्य" में बीसीआई अधिक्रमण नहीं कर सकती है, , क्योंकि एससीबीए एक अलग इकाई है, जो सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट और अधिवक्ता अधिनियम द्वारा शासित है।

यदि किसी सदस्य को बार एसोसिएशन ने निष्कासित किया है तो बीसीआई के पास उसे बहाल करने का अधिकार नहीं है। जैसा कि वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने कहा है कि "ऐसे मामलों में दीवानी अदालतों का क्षेत्राधिकार भी सीमित है, अर्थात जब तक कि बार एसोसिएशन के फैसले प्राकृतिक सिद्धांतों के उल्लंघन न कर रह हों, या अधिकार क्षेत्र के बिना दिए गए हों, उन्हें को दीवानी न्यायालय में भी चुनौती नहीं दी जा सकती है।

2018 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक खंडपीठ के फैसले में भी इस पर सहमति व्यक्त की गई थी, जहां यह कहा गया था कि अधिवक्ता अधिनियम स्टेट बार काउंसिल को एक बार एसोसिएशन की चुनाव प्रक्रिया,चुनाव या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की शक्ति प्रदान नहीं करता है।

बीसीआई या स्टेट बार काउंसिल कब हस्तक्षेप कर सकती है?

अधिवक्ता अध‌िनियम के तहत, यह सुनिश्चित करना बीसीआई और स्टेट बार काउंसिल का कर्तव्य है कि अधिवक्ता गैर-पेशेवर और अनुचित तरीके से व्यवहार न करें। हालांकि बार एसोसिएशन अलग-अलग इकाइयां हैं, लेकिन ऐसे एसोसिएशन के सदस्य अधिवक्ता "व्यावसायिक मानकों के नियम" द्वारा शासित होते हैं।

बीसीआई और स्टेट बार काउंसिल के पास ऐसे अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है, जो ग्राहकों, अदालतों और विपक्षी वकील के खिलाफ किसी भी अनैतिक पेशेवर व्यवहार में संलग्न हैं।

उदाहरण के लिए, यदि कुछ अधिवक्ता, बार एसोसिएशन की आड़ में, ऐसे प्रस्ताव पारित करें जैसे कि हड़ताल करना या अदालत के काम का बहिष्कार या किसी ग्राहक का बचाव नहीं करना, तो ऐसा आचरण "व्यावसायिक आचरण के नियमों" के विपरीत होगा। ऐसी स्थिति में बीसीआई और स्टेट बार काउंसिल को अपनी शक्तियों के तहत बार एसोसिएशन के ऐसे सदस्यों या पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अधिकृत किया जाएगा। यह बीसीआई का विशिष्ट कार्य है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने अक्सर जोर दिया है।

निष्कर्ष

बीसीआई निश्चित रूप से बार एसोसिएशन के सदस्यों के आचरण सकता है निगाह रख सकती है, यदि वह ग्राहकों, अदालतों और अन्य अधिवक्ताओं के प्रति पेशेवर नैतिकता के विपरीत है। हालांकि, वह बार एसोसिएशन के आंतरिक प्रशासनिक विवादों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

(अनुराग भास्कर जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल, सोनीपत में व्याख्याता हैं। वह हार्वर्ड लॉ स्कूल के सेंटर ऑन द लीगल प्रोफेशन से भी संबद्ध हैं। वह लाइव लॉ में एक कॉट्र‌िब्यूटिंग एडिटर भी हैं। उनका ट्व‌िटर हैंडल @anurag_bhaskar_ है।)

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