क्या हमारी संवैधानिक अदालतें नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कर रही हैं?
LiveLaw Network
2 Sept 2026 4:29 PM IST

हाल ही में जंतर-मंतर पर युवा भारतीयों के विरोध-प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस की गैर-ज़रूरी और अन्यायपूर्ण कार्रवाई, जिसके कारण सच का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा, ने देश में सभी का ध्यान खींचा है। इस पर गंभीर और गहरी बहस की ज़रूरत है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसके मौलिक लक्ष्य न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व हैं। इसका संविधान, जिसे संविधान सभा ने 9 दिसंबर 1946 से 25 नवंबर 1949 तक विचार-विमर्श के बाद अंतिम रूप दिया (संविधान के मसौदे पर 114 दिनों से ज़्यादा समय लगा), सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यह लोकतांत्रिक तरीके से देश को चलाने का हर तरीका बताता; इसमें शासन करने के लिए कार्यपालिका, कानून बनाने के लिए विधायिका और उन पर नज़र रखने और नागरिकों के मौलिक व अन्य अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका की व्यवस्था है।
सदियों के विदेशी शासन के बाद भारत आज़ाद हो रहा था। लोगों ने बहुत ज़ुल्म और अन्याय सहे थे। संविधान बनाने वाले इस बात से वाकिफ़ थे कि लंबे संघर्ष के बाद मिली आज़ादी—जिसमें लाखों लोगों ने अपनी जान, आज़ादी और संसाधनों की कुर्बानी दी थी—महज़ एक भ्रम बनकर न रह जाए। वे संविधान के केंद्र में नागरिकों को रखना चाहते थे। वे लोगों की और लोगों द्वारा चुनी गई सरकार को स्थायी रूप से स्थापित करना चाहते थे, न कि सिर्फ़ "लोगों के लिए" सरकार चाहते थे।
उन्होंने मौलिक अधिकारों पर विस्तार से बहस की।
डॉ. अंबेडकर ने ज़ोर देकर कहा,
"मौलिक अधिकारों के दो उद्देश्य हैं। पहला, हर नागरिक उन अधिकारों का दावा करने की स्थिति में हो। दूसरा, वे हर अथॉरिटी (अधिकारी/संस्था) पर बाध्यकारी हों..."।
उन्होंने स्वतंत्रता के लिए तर्क देते हुए कहा,
"हमें यह स्वतंत्रता इसलिए मिल रही है ताकि हम अपनी सामाजिक व्यवस्था में सुधार कर सकें, जो असमानताओं, भेदभाव और ऐसी अन्य चीज़ों से भरी है जो हमारे मौलिक अधिकारों के ख़िलाफ़ हैं।"
सरदार भूपिंदर सिंह मान को डर था कि "अगर कोई बैठक होती है, तो उसे तोड़ने के लिए लाठियों का इस्तेमाल हो सकता है, और लोगों को बिना मुक़दमे के जेल में डाला जा सकता है, उनके संगठनों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है और उन्हें गैर-कानूनी घोषित किया जा सकता है"।
क्या उन्होंने जंतर-मंतर की घटना की कल्पना की थी?
लक्ष्मी नारायण साहू चाहते थे कि "मौलिक अधिकारों को मौलिक और उल्लंघन न किए जा सकने वाला (अपरिवर्तनीय) माना जाए"।
पंडित भार्गव का मानना था,
"हमें ऐसी सरकार चाहिए जो भारत के नागरिकों की आज़ादी का सम्मान करे।"
उन्हें डर था कि 'पब्लिक सेफ़्टी मेज़र्स एक्ट' के तहत पुलिस कमिश्नर बहुत ज़्यादा शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
उन्होंने कहा,
"हमें अपने कड़वे अनुभवों से पता है कि पुलिस कमिश्नर भी इन मामलों को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखते, जैसा कि उनसे उम्मीद की जाती है; वे बस अपने नीचे काम करने वाले अधिकारियों की रिपोर्ट पर वारंट पर साइन कर देते हैं और उन्हें जारी कर देते हैं। ऐसे हालात में बेहतर होगा कि अगर ऐसी शक्तियों का मनमाना इस्तेमाल हो तो उन पर कोई रोक-टोक हो।"
मुंशी ने साफ़ शब्दों में कहा,
"शायद अभी की इमरजेंसी की वजह से हम यह भूल गए हैं कि अगर हम व्यक्तिगत आज़ादी को गुंजाइश नहीं देंगे और उसे अदालतों का संरक्षण नहीं देंगे तो हम एक ऐसी परंपरा बना बैठेंगे, जो आखिरकार देश में बची-खुची थोड़ी-बहुत व्यक्तिगत आज़ादी को भी खत्म कर देगी।"
अधिकारों को लेकर इतने जागरूक होने के कारण संविधान बनाने वालों ने एक स्वतंत्र न्यायपालिका बनाने पर बहुत सोच-विचार किया।
पंडित भार्गव ने कहा,
"लोकतंत्र में अदालतें ही नागरिकों के अधिकारों और आज़ादी की रक्षा के लिए आखिरी सहारा होती हैं।"
उन्होंने कहा,
"मैं चाहता हूँ कि न्यायपालिका को न्याय के रक्षक के तौर पर उसका सही और ऊँचा दर्जा मिले और लोग उसके संरक्षण में अपने अधिकारों और आज़ादी को लेकर सुरक्षित महसूस करें।"
अंबेडकर ने सहमति जताते हुए कहा,
"सदन में इस बात पर कोई मतभेद नहीं हो सकता कि हमारी न्यायपालिका न सिर्फ़ कार्यपालिका से स्वतंत्र होनी चाहिए, बल्कि खुद भी सक्षम होनी चाहिए।"
उन्हें चीफ जस्टिस के पद को लेकर चिंता थी; उन्होंने कहा कि वे बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं, लेकिन "आखिरकार चीफ जस्टिस भी एक इंसान ही होते हैं, जिनमें वे सभी कमियां, भावनाएं और पूर्वाग्रह होते हैं जो हम आम लोगों में होते हैं।"
पंडित नेहरू चाहते थे,
"भविष्य में जज ज़्यादातर बार (वकीलों के समुदाय) से ही आएं... यह ज़रूरी है कि ये जज न सिर्फ़ बेहतरीन हों, बल्कि देश में उन्हें बेहतरीन माना भी जाए और वे बेहद ईमानदार हों; ज़रूरत पड़ने पर वे कार्यपालिका सरकार और उनके रास्ते में आने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ़ खड़े हो सकें।"
जजों पर कार्यपालिका के प्रभाव की आशंका जताते हुए के.टी. शाह ने कहा,
"कानून के अनुसार, मेरा मानना है कि जजों को न्यायिक पदों से कार्यपालिका के पदों पर जाने से रोका जाना चाहिए... ताकि... वे अप्रत्यक्ष रूप से भी प्रभावित न हों, और शायद अनजाने में ही, सत्ता में बैठे लोगों से सही समय पर सराहना पाने की उम्मीद में अपने फैसले न बदलें।"
कामथ ने कहा,
"अगर न्यायपालिका नागरिकों को दिए गए इन अधिकारों की रक्षा और सुरक्षा के लिए नहीं है तो हम अपने संविधान की पवित्रता को कैसे बनाए रखेंगे?"
नज़ीरुद्दीन अहमद का मानना था,
"न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब बस इतना है कि आपके बनाए नियमों के दायरे में अदालतों को दी गई शक्तियों का इस्तेमाल बिना किसी कार्यकारी हस्तक्षेप के किया जा सके - यानी जब कोई मजिस्ट्रेट न्यायिक कामकाज करे, तो वह किसी भी प्रभाव से मुक्त हो। सबसे बुरी बात जो वह कर सकता है, वह है लोगों को वास्तविक न्याय देने से इनकार करना। अगर कोई चीज़ है, जो लोगों के दिलों में उत्साह भरेगी और हमारी आज़ादी को एक ठोस उपलब्धि बनाएगी, तो वह है न्यायपालिका में भरोसा। जिस पल आप किसी व्यक्ति को यह सोचने देते हैं कि उसे न्यायपालिका पर भरोसा नहीं है, सरकार की स्थिरता कमज़ोर हो जाएगी।"
न्यायपालिका को हर स्तर पर आत्म-मंथन करने की ज़रूरत है कि वह लोगों के बीच कितना भरोसा जगाती है।
हमारे महान संविधान निर्माताओं के इन विचारों को याद करने का मकसद इस बात पर ज़ोर देना है कि जजों के लिए हर स्तर पर नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करना और उन्हें बनाए रखना कितना ज़रूरी है। चाहे अग्रिम या नियमित ज़मानत देना हो, बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) के मामलों की सुनवाई करनी हो या पुलिस की बर्बरता के खिलाफ चुनौतियों पर सुनवाई करनी हो, उन्हें हर किसी को मिले संवैधानिक संरक्षण के प्रति जागरूक रहना चाहिए और पूरी निष्ठा से इसकी रक्षा करनी चाहिए। आज, संवैधानिक अदालतों और राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोगों की नज़र के सामने बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। सैकड़ों लोग अदालतों में न्याय पाए बिना ही फर्जी मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं। 'लव जिहाद' के नाम पर घर और कारोबार तोड़े जा रहे हैं। दलितों और अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर मुसलमानों और ईसाइयों पर हमले बिना किसी रोक-टोक के जारी हैं। आरोपियों को सबके सामने पीटा जाता है और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। देश की अंतरात्मा इन उल्लंघनों के सख्त खिलाफ है। हम तेज़ी से कानून-विहीन देश बनते जा रहे हैं। कानून का शासन दबाव में है, या शायद विफल हो रहा है। जजों को नागरिकों के पक्ष में और सर्वशक्तिमान राज्य के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। आज़ादी का मतलब है पूर्ण आज़ादी। यह सब तब हो रहा है, जब न्यायपालिका में हर स्तर पर बहुत सारे बेहतरीन और काबिल जज हैं। तो फिर उनमें से ज़्यादातर लोग आम लोगों के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठाते? क्या यह ट्रांसफर और दूसरी सज़ाओं का डर है, जो पिछले दशक में कई बेहतरीन जजों ने झेला है? या फिर यह बहुत ताकतवर एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) का डर है? वजह चाहे जो भी हो, बस यही उम्मीद और प्रार्थना की जा सकती है कि जज आम नागरिकों की मुश्किलों को समझेंगे और उनके मानवाधिकारों, बुनियादी, कानूनी, संवैधानिक और मौलिक अधिकारों की रक्षा करके उनकी मदद के लिए आगे आएंगे।
लेखक- दुष्यंत दवे सीनियर एडवोकेट हैं, जो चार दशकों से ज़्यादा समय से वकालत कर रहे हैं और 2015, 2016 और 2021 में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट रहे हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।


