स्तंभ
क्या एक जज का प्रधानमंत्री की सराहना करना नैतिक है?
अनुराग भास्करसुप्रीम कोर्ट की मेजबानी में 22-23 फरवरी को एक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया, जिसका विषय था- 'न्यायपालिका व बदलती दुनिया'। भारतीय और विदेशी जजों के बीच विचारों का संवाद सहज बनाना कान्फ्रेंस का उद्देश्य था। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में की गई जस्टिस अरुण मिश्रा की एक टिप्पणी ने बीस से अधिक देशों (यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया सहित) के जजों को न्यायिक नैतिकता और औचित्य के विषयों पर विचार करने को मजबूर किया होगा, जबकि यह सम्मेलन का एजेंडा नहीं...
सलाम बॉम्बे : सामूहिक हिंसा के दौर में चाइल्ड इन नीड ऑफ़ केयर एंड प्रोटेक्शन की कहानी
"क्यों एक व्यक्ति जिसने एक अमानवीय जघन्य अपराध किया है, उसे एक वयस्क व्यक्ति से कम सजा दी जाये, मात्र इसलिए कि वह अभी तक 18 साल का नहीं हुआ है?" यह सवाल मैंने पहली बार लॉ स्कूल के दौरान जेजे एक्ट (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट) पर एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में एक पब्लिक प्रासिक्यूटर द्वारा सुना। तब से यह सवाल मैंने बार-बार सुना है। क्यों 18 साल से कम उम्र के बाल अपराधियों को वयस्कों की तरह न माना जाए और उसी मुताबिक़ सजा न दी जाए? ये आवाज बार-बार उठी है और इसीलिए सरकार ने भी जेजे एक्ट की मूल भावना को...
चिन्मयानन्द जमानत : रेप मिथकों और पूर्वग्रहों पर आधारित बेल ऑर्डर
इलाहबाद हाईकोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानन्द को 3 फरवरी को जमानत दे दी। चिन्मयानन्द पर 23 वर्षीय LLM छात्रा के बलात्कार का आरोप है। पीड़िता उस विश्विद्यालय से LLM कर रही थी जहां चिन्मयानन्द डायरेक्टर है। गौरतलब है कि डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज, शाहजांहपुर ने इस मामले में चिन्मयानन्द की जमानत अर्जी खारिज कर दी थी।मेरा यह मत है कि हाईकोर्ट का ऑर्डर कानूनी रूप से अरक्षणीय है यह जमानत ऑर्डर, एक जमानत ऑर्डर के स्कोप और जमानत देते वक़्त कौन-कौन से कारक आवश्यक है- इस बात की अनदेखी करता है।...
मोहन जोशी हाज़िर हो : उम्मीदों और कोर्ट तारीखों के बीच एक आम आदमी की कहानी
न्याय में देरी, न्याय से वंचित किये जाने के समान है (Justice delayed is justice denied)- यह बात हम सब शायद इतनी बार सुन चुके हैं कि अब इसे दोहराना निरर्थक, प्रभावहीन और बिलकुल रेगुलर सा लगता है. लेकिन इस उद्धरण से यह बात साफ़ होती है कि 'समय' और 'न्याय' का निश्चित तौर पर गहरा ताल्लुक है। अगर न्याय समय पर निश्चित नहीं किया जाये तो वह कहां तक न्याय है- यह सोचने का विषय है। यह बात हममें से किसी के लिए नई नहीं है कि हमारा सिस्टम लंबित फाइलों और विलम्बित न्याय से संघर्ष कर रहा है। हालांकि नेशनल...
वकील इस तरह बनाएं मुवक्किल के साथ अपने संबंध बेहतर, कुछ सुझाव
वकालत करने वाला हर शख्स इस बात को समझता है कि एक वकील को अपने मुवक्किल के प्रति विश्वास एवं वफादारी का प्रदर्शन करना चाहिए। इस तरह का संबंध यह सुनिश्चित करता है कि वकील हर समय अपने मुवक्किल के हितों को निरंतर आगे बढाता रहे। वकीलों को हितों के टकराव से बचने की कोशिश करनी चाहिए अन्यथा मुवक्किल को न्याय दिलाने में खलल पड़ सकता है। किसी भी परिस्थिति में मुवक्किल के हित को वकील द्वारा कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। एक मुवक्किल के लिए न्याय तक पहुंच का मतलब अनिवार्य रूप से एक वकील तक पहुंच से भी है।...
26 जनवरी - गण के अधिकारों से कर्तव्यों तक
किसी देश का संविधान उसके नागरिकों का गौरव होता है। आप कल्पना करें यदि किसी राष्ट्र का संविधान न हो तो वहां का शासन कितना उच्छृंखल हो सकता है। जब हम भारतीय संविधान की बात करते हैं तो हम केवल वर्तमान संविधान का जिक्र नहीं कर रहे होते बल्कि भारतीय परम्पराओं, उसकी आस्था और व्यवस्थाओं तक की चर्चा करते हैं। संविधान किसी देश का सर्वोच्च विधान या संहिता है। इन दोनों शब्दों को यदि समझ लें तो संविधान को समझना कठिन न होगा। संस्कृत शब्द विधि से विधान बना है, विधि यानी कानून। कुछ नियम जिनके दायरों में रहकर...
म्यांमार के भेदभावपूर्ण नागरिकता कानून और नरसंहार से सबक
मनु सेबेस्टियनइंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने रोहिंग्या नरसंहार के मामले में अफ्रीकी देश द गाम्बिया द्वारा दायर एक अपील पर म्यांमार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। यह फैसला म्यांमार के आधिकारिक रुख के लिए तगड़ा झटका है, जिसने रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान और अस्तित्व को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत ने माना है कि रोहिंग्या जेनोसाइट कन्वेंशन की परिभाषा के तहत "संरक्षित समूह" हैं। कोर्ट ने म्यांमार को रोहिंग्याओं के संरक्षण का उपाय करने के लिए अस्थायी आदेश...
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ख़िलाफ़ चुनौतियां : बुनियादी बहसों से आगे की बात
अभी तक नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के ख़िलाफ़ बहस इन दलीलों के इर्द गिर्द रही है : (a) क्या सिर्फ़ कुछ चुनिंदा आप्रवासियों को नागरिकता देना और जिन व्यक्तियों और समूहों को बाहर रखा गया है उसकी वजह से यह अनुच्छेद 14 के तहत "वाजिब वर्गीकरण" के सिद्धांत का उल्लंघन करता है या नहीं?; (b) क्या किसी समूह को चुनना "निर्धारण के सिद्धांत"को नज़रंदाज़ करता है, और इस वजह से क्या यह असंवैधानिक रूप से मनमाना है?; और (c) नागरिकता के दावे के लिए धार्मिक उत्पीड़न को अन्य किसी भी तरह के उत्पीड़न पर वरीयता...
अनुच्छेद 19 और इंटरनेट : आजादी की हद तय हो
यह सबसे शानदार समय था और सबसे खराब वक्त भीकई बार, यह ज्ञान का युग था, यह मूर्खता का भी युगयह विश्वास का युग था, यह अविश्वास का भी युगयह उजाले का भी मौसम था, और अंधेरे का भीयह उम्मीदों का वसंत था और निराशा की सर्दियांहमारे सामने सब कुछ था और कुछ भी नहीं था,हम सीधे स्वर्ग जा रहे थे, हम दूसरे रास्ते से भी जा रहे थेयह वक्त अपने वर्तमान से काफी दूर थाअब कोलाहलपूर्ण वक्त में जीने के लिए मजबूरअच्छा हो या बुरा, जो भी है अति है।19वीं सदी के ब्रिटिश लेखक चार्ल्स डिकंस के उपन्यास 'ए टेल ऑफ टू सिटीज' की इन...
किसी प्रकरण में पुलिस कब पेश करती है खात्मा रिपोर्ट?
हम देखते हैं कि कई मामलों में पुलिस खात्मा रिपोर्ट पेश करती है। आखिर क्या है यह खात्मा रिपोर्ट और वे कौन सी परिस्थितियां हैं, जब पुलिस खात्मा रिपोर्ट पेश करती है। दंड प्रकिया सहिंता की धारा 154 के अंतर्गत पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध के मामले प्रथम इत्तिला रिपोर्ट (FIR) दर्ज़ करने के अधिकार दिए गए हैं। जब किसी मामले में एफआईआर थाने में दर्ज हो जाती है और मामले के अन्वेषण के दौरान अन्वेषणकर्ता अधिकारी को विवेचन मामले में इतना पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलता है, जितने में मामले में न्यायालय के...
जानिए मृत्यु वारंट क्या होता है एवं इसके निष्पादन पर क्या है कानून?
दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार (7 जनवरी, 2020) को निर्भया बलात्कार-हत्या मामले में चार दोषियों को फांसी की सजा के लिए 22 जनवरी को सुबह 7 बजे डेथ वारंट जारी किया है। चार दोषियों - मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय सिंह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आदेश की सूचना दी गई। पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सतीश अरोड़ा उनके खिलाफ डेथ वारंट के निष्पादन की याचिका पर विचार कर रहे थे। इससे पहले दिसंबर 2018 में, निर्भया के माता-पिता ने दोषियों को मिले मृत्युदंड को निष्पादित...
सिविल वाद कैसे दर्ज करें, नए अधिवक्ताओं के लिए विशेष
नवीन पंजीकृत हुए अधिवक्ताओं के लिए सिविल प्रकृति के वादों को न्यायालय में संस्थित करना कठिनाई भरा काम हो सकता है। नवीन अधिवक्ता वाद की प्रकृति के अनुरूप यह तय नहीं कर पाते हैं कि वाद किस प्रकृति का है तथा इस वाद को कौन से न्यायालय में दर्ज करना है। जब वाद की प्रकृति मालूम हो जाती है तो वाद को दर्ज करने के संबंध में कठिनाई होती है। इस आलेख के माध्यम से नवीन अधिवक्ता अपने मुकदमे दर्ज करने में सहायता प्राप्त कर सकते हैं। किसी सिविल वाद को दर्ज करवाने में निम्न चरण हो सकते हैं। इन चरणों का अनुसरण...
जानिए संयुक्त राष्ट्र के 6 प्रमुख अंगों के बारे में ख़ास बातें (भाग 1)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए विनाश का सामना फिर से दुनिया को कभी न करना पड़े इसके लिए संयुक्त राष्ट्र (United Nations) को अस्तित्व में लाया गया था। हम यह भी जानते हैं कि किसी भी अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन ने वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र जितनी मान्यता एवं सम्मान प्राप्त नहीं किया है। संयुक्त राष्ट्र के विषय में जितना साहित्य मौजूद है, उतना किसी अन्य संगठन को लेकर मौजूद नहीं है। यह संगठन, अपने अस्तित्व में आने के बाद से, पिछले 70 वर्षों की अधिकांश वैश्विक चुनौतियों और संकटों को सुलझाने में...
जानिए संयुक्त राष्ट्र (UN) के बारे में खास बातें और महत्वपूर्ण सवालों के जवाब
हम सभी ने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के बारे में सुना है। हालाँकि इसका मुख्य कार्य क्या है इसको लेकर हम सभी की उत्सुकता बनी रहती है। यह तो हम समझते हैं कि यह संगठन वैश्विक स्तर पर सभी राष्ट्रों (हम अपनी सुविधा के लिए इन्हें 'देश' कह सकते हैं) के बीच सामान्य मूल्यों को स्थापित करता है, जिससे हर राष्ट्र एक यूनिफार्म तरीके से कुछ मूल्यों को अपना सके और इन मूल्यों का अपनाया जाना सभी राष्ट्रों के हित में होता है। सामान्य अर्थों में हम यह कह सकते हैं कि इसका एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि वैश्विक...
जानिए एनआरसी और एनपीआर में क्या संबंध है?
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़न (एनआरसी) और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) में क्या संबंध है? हाल ही में केंद्र सरकार ने अप्रैल 2020 में होने वाले एनपीआर के लिए चार हज़ार करोड़ रुपए का बजट मंज़ूर किया और गृहमंत्री अमित शाह और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर दोनों ने कहा कि एनसीआर और एनपीआर में आपस में कोई संबंध नहीं है। लेकिन ये बयान न केवल संसद में आए उन नौ अवसरों के विपरित है, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने सदन में कहा कि एनपीआर, एनआरसी की दिशा में पहला कदम है, बल्कि कानून में जो लिखा है, उसके भी खिलाफ...
सीएए विरोधी प्रदर्शन: जानिए प्रदर्शनों को दबाने के लिए बल प्रयोग करने की कानूनी वैधता
शाश्वत अवस्थी एवं अनुष्का सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसम्बर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के छात्रों के विरुद्ध पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई की जांच अदालत की निगरानी में कराये जाने की अर्जी संबंधित उच्च न्यायालयों के समक्ष दायर करने का याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया। शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप न करने का मुख्य कारण स्थापित तथ्यों की अनुपस्थिति में उसकी अनिच्छा (तथ्य का पता लगाना अनिवार्य तौर पर...
क्या पुलिस विश्वविद्यालय/कॉलेज परिसर में बिना अनुमति के प्रवेश कर सकती है?
इस बात को लेकर हर कहीं बहस छिड़ी हुई है कि क्या पुलिस को किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने से पहले कॉलेज/विश्वविद्यालय प्रशासन या किसी अन्य प्राधिकरण से अनुमति लेने की आवश्यकता होती है? दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी एवं उत्तर प्रदेश के अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस द्वारा प्रवेश किये जाने के बाद यह सवाल सोशल मीडिया से लेकर आम चर्चा में छाया हुआ है। जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में प्रवेश करने को लेकर पुलिस ने यह कहा है कि वे स्थिति को नियंत्रित करने के...
न्यायाधीशों का आकलन कौन करे?
अवनी बंसल हाल ही में सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ द्वारा दिये गये हालिया फैसलों को लेकर व्यक्त किये जा रहे मतों से हमारे तकनीकी, मानसिक और संभवतया रूहानी इनबॉक्स छलकने लगे हैं। अब सबकी निगाहें नये मुख्य न्यायाधीश- न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे पर टिकी हुई हैं। वास्तविक विषय-वस्तु पर आने से पहले, मैंने एक जज के नाम से पहले 'जस्टिस' (न्यायमूर्ति) शब्द जुड़ा पाया है, जैसा मेरे नाम के पहले तो कतई नहीं है। जस्टिस गोगोई की विरासत पर विचार करते हुए और बाबरी...
वकील और जज काला कोट और बैंड क्योंं पहनते हैं? एडवोकेट और लॉयर में क्या है अंतर
आपने अदालत के आसपास या अदालतों के भीतर वकीलों को काला कोर्ट और गले में टाई नुमा बैंड के साथ देखा होगा और वकीलों को बहुत सारे नामों के साथ भी सुना होगा। आप इस बात से अनभिज्ञ हो सकते हैं कि आख़िर इन नामों में क्या अंतर है और इस वेशभूषा के पीछे क्या कारण है? किसी भी प्रोफ़ेशन में एक तयशुदा वेशभूषा हो सकती है। इस ही तरह वकीलों की भी एक तयशुदा वेशभूषा है और यह वेशभूषा वकीलों के लिए अनिवार्य भी है। इस वेशभूषा के लाभ भी हैं, जिससे अदालतों में वकील दूर से ही आम जनता के बीच पहचान में आ जाते हैं। ...
लॉ ऑन रील्स - आक्रोश : न्याय व्यवस्था की विफलता पर करारा कमेंट
हमारे लॉ स्कूलों में एनालिटिकल पोज़िटिविस्ट सोच से प्रेरित होकर कानून मात्र केस लॉ और संसद द्वारा पारित अधिनियमों द्वारा पढ़ाया जाता है, लेकिन यह कानून और उसकी कार्यप्रणाली के सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य को नहीं दर्शाता है। अमेरिका के क्रिटिकल लीगल स्टडीज़ मूवमेंट ने यह दर्शाया है कि कानून मूल्य उदासीन (वैल्यू न्यूट्रल) नहीं है। कानून भी समाज के ढांचों में बंधा अपने पूर्वाग्रहों के साथ काम करता है। उदाहरण के तौर पर कानून की महिलावादी व्याख्या को अगर देखा जाये तो कुछ का मानना है कि कानून भी पितृसत्ता...



















