3 साल की हिरासत के बाद PMLA में ज़मानत मिली, कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा - लंबे समय तक हिरासत के मामलों में अनुच्छेद 21, दोहरी शर्तों पर भारी पड़ सकता है
Shahadat
18 March 2026 8:14 AM IST

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में आरोपी को ज़मानत दी। कोर्ट ने माना कि तीन साल से ज़्यादा समय तक ट्रायल से पहले हिरासत में रखना, अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही यह मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) की धारा 45 के तहत तय सख्त 'दोहरी शर्तों' में ढील देने का उचित आधार बन सकता है।
जस्टिस सुव्रा घोष ने टिप्पणी की कि कोई भी दंडात्मक कानून कितना भी सख्त क्यों न हो, एक संवैधानिक अदालत को हमेशा संविधानवाद और कानून के शासन के पक्ष में ही झुकना चाहिए, और स्वतंत्रता इसका एक अभिन्न अंग है।
कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता 9 फरवरी, 2023 से ही हिरासत में है। कोर्ट ने कहा कि बिना ट्रायल शुरू हुए या खत्म हुए, इतने लंबे समय तक हिरासत में रखना, किसी भी हाल में 'दंडात्मक हिरासत' (सज़ा के तौर पर हिरासत) नहीं बनने दिया जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 21 सबसे ऊपर और पवित्र है। उचित मामलों में यह PMLA की धारा 45 के तहत तय 'दोहरी शर्तों' जैसी कानूनी पाबंदियों की सख्ती पर भी भारी पड़ सकता है।
कोर्ट ने आगे पाया कि निकट भविष्य में ट्रायल खत्म होने की संभावना बहुत कम है। खासकर इसलिए, क्योंकि 'मूल अपराध' (Predicate Offence) का मामला खुद अभी लंबित है। हाईकोर्ट में चल रही अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के चलते उस पर आगे कार्रवाई होने की संभावना भी कम है। यह देखते हुए कि इस मामले में 30 से ज़्यादा गवाह और भारी मात्रा में दस्तावेज़ी सबूत शामिल हैं, यह उम्मीद थी कि ट्रायल में काफी समय लगेगा।
हिरासत की औचित्यता पर बात करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला मुख्य रूप से उन दस्तावेज़ी सबूतों पर आधारित है, जिन्हें पहले ही ज़ब्त करके प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हिरासत में रखा जा चुका है। इससे सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना काफी कम हो जाती है। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ज़्यादातर गवाह सरकारी अधिकारी हैं, जिससे उन पर किसी तरह का अनुचित प्रभाव डालने की संभावना भी न के बराबर है।
कोर्ट ने दोहराया कि PMLA की धारा 50 के तहत आरोपी के हिरासत में रहते हुए दर्ज किए गए बयानों को 'मुख्य सबूत' (Substantive Evidence) के तौर पर नहीं माना जा सकता। इन बयानों का इस्तेमाल केवल अन्य सबूतों की पुष्टि या समर्थन के लिए ही किया जा सकता है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता को 'मूल अपराध' के मामले में पहले ही ज़मानत मिल चुकी है, उसके खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। अब हिरासत में लेकर उससे आगे की पूछताछ करने की कोई ज़रूरत नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने इस स्थापित कानूनी स्थिति को स्वीकार किया कि आर्थिक अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं और उन्हें गंभीरता से ही देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद, कोर्ट ने इस पहलू और याचिकाकर्ता के 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार' के बीच संतुलन बनाया। ऐसा करते समय कोर्ट ने विशेष रूप से याचिकाकर्ता के लंबे समय से हिरासत में रहने की अवधि को ध्यान में रखा। कोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि इसी मामले में एक अन्य सह-आरोपी को, जिसकी स्थिति याचिकाकर्ता जैसी ही थी, पहले ही ज़मानत दी जा चुकी है।
इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने यह माना कि याचिकाकर्ता को और अधिक हिरासत में रखना उचित नहीं था और उसकी ज़मानत याचिका को कुछ कड़ी शर्तों के साथ मंज़ूर कर लिया। इन शर्तों में ₹10 लाख का बॉन्ड जमा करना, पासपोर्ट जमा करना, यात्रा पर प्रतिबंध, ट्रायल कोर्ट के समक्ष नियमित रूप से पेश होना और सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करने या गवाहों को प्रभावित न करने के निर्देश शामिल थे। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल ज़मानत याचिका के निपटारे तक ही सीमित थीं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
Case: Prasenjit Das v/s Enforcement Directorate

