दिव्यांग बेटे के बालिग होने के बाद भी पिता की भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी बनी रहती है: कलकत्ता हाईकोर्ट

  • दिव्यांग बेटे के बालिग होने के बाद भी पिता की भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी बनी रहती है: कलकत्ता हाईकोर्ट

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ बालिग बच्चे की देखभाल करने की पिता की ज़िम्मेदारी, बच्चे के बालिग होने पर अपने-आप खत्म नहीं हो जाती।

    जस्टिस उदय कुमार ने यह टिप्पणी पति द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज करते हुए की। पति ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके बालिग बेटे (जो 70% से 75% तक ऑर्थोपेडिक रूप से दिव्यांग है) के भरण-पोषण की कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई।

    कोर्ट ने कहा कि नाबालिग से बालिग होने की स्थिति, साथ ही लगातार बनी हुई दिव्यांगता और खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थता के मामलों को CrPC की धारा 127 के तहत कार्यवाही के ज़रिए सुलझाया जा सकता है। यह धारा परिस्थितियों में बदलाव होने पर भरण-पोषण भत्ते में बदलाव की अनुमति देती है।

    यह मामला 2005 में शुरू हुई भरण-पोषण की कार्यवाही से जुड़ा है, जिसे तुम्पा प्रमाणिक ने अपने पति समित प्रमाणिक के खिलाफ CrPC की धारा 125 के तहत दायर किया। इसमें उन्होंने अपने और अपने नाबालिग बेटे सुदीप्त प्रमाणिक के लिए भरण-पोषण की मांग की।

    बाद में ट्रायल कोर्ट ने पत्नी का व्यक्तिगत दावा खारिज किया, क्योंकि यह पाया गया कि याचिकाकर्ता के साथ उसकी शादी तब हुई थी जब उसकी पहली शादी कायम थी। हालांकि, कोर्ट ने जोड़े के दिव्यांग नाबालिग बेटे के लिए 3,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण भत्ता मंज़ूर किया। पति ने इस आदेश को चुनौती दी थी, जिसे 2016 में हाई कोर्ट की एक बेंच ने खारिज कर दिया था।

    बेटे के बालिग होने के बाद मां ने CrPC की धारा 127 के तहत आवेदन दायर किया। इसमें उन्होंने बेटे की 70% से 75% ऑर्थोपेडिक दिव्यांगता और खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थता का हवाला देते हुए भरण-पोषण में बदलाव और उसे जारी रखने की मांग की।

    पति ने कार्यवाही की वैधता को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि बेटे के बालिग होने के बाद मां का अधिकार (Locus Standi) खत्म हो गया और इसके लिए नई कार्यवाही की ज़रूरत थी। उन्होंने भरण-पोषण की कार्यवाही में संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी हवाला दिया।

    Case: Samit Pramanick v. State of West Bengal & Ors., CRR 534 of 2023

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