OBC-A और OBC-B से EWS श्रेणी में बदलाव की मांग: कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और प्राथमिक शिक्षा बोर्ड से मांगा जवाब

  • OBC-A और OBC-B से EWS श्रेणी में बदलाव की मांग: कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और प्राथमिक शिक्षा बोर्ड से मांगा जवाब

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन अभ्यर्थियों की याचिका पर पश्चिम बंगाल सरकार और पश्चिम बंगाल बोर्ड ऑफ प्राइमरी एजुकेशन (WBBPE) से जवाब मांगा है, जिन्होंने प्राथमिक शिक्षक भर्ती के लिए OBC-A और OBC-B श्रेणियों में आवेदन किया था, लेकिन बाद में EWS (Economically Weaker Section) प्रमाणपत्र प्राप्त करने के बाद अपनी श्रेणी बदलने की अनुमति मांगी।

    जस्टिस अर्जुन रे मुखर्जी की पीठ मोहबुल इस्लाम और अन्य की ओर से दायर रिट याचिका (WPA 31572 of 2026) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में बोर्ड द्वारा 14 अक्टूबर 2026 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसके तहत OBC-A और OBC-B श्रेणियों में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को 14 से 31 अक्टूबर 2026 के बीच अपनी श्रेणी में बदलाव करने का अवसर दिया गया था। अधिसूचना के अनुसार, निर्धारित अवधि में श्रेणी में बदलाव नहीं करने वाले अभ्यर्थियों को स्वतः अनारक्षित (Unreserved) श्रेणी का उम्मीदवार माना जाना था।

    याचिकाकर्ताओं ने अधिसूचना को रद्द करने या उसमें संशोधन कर उन्हें अपनी श्रेणी EWS में बदलने की अनुमति देने का निर्देश देने की मांग की।

    13,421 प्राथमिक शिक्षक पदों पर होनी है भर्ती

    याचिकाकर्ताओं ने 25 सितंबर 2025 और 19 नवंबर 2025 को जारी भर्ती अधिसूचनाओं के तहत सरकारी सहायता प्राप्त और सरकारी प्रायोजित प्राथमिक एवं जूनियर बेसिक स्कूलों में सहायक शिक्षक के पदों के लिए आवेदन किया था। पश्चिम बंगाल प्राइमरी स्कूल टीचर्स रिक्रूटमेंट रूल्स, 2016 के तहत शुरू की गई इस भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से कुल 13,421 रिक्त पदों को भरा जाना है। अभ्यर्थियों ने शुरुआत में OBC-A और OBC-B श्रेणियों के तहत आवेदन किया था।

    OBC आरक्षण से जुड़े घटनाक्रम के बाद EWS प्रमाणपत्र प्राप्त करने का दावा

    याचिकाकर्ताओं के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया के दौरान OBC वर्गीकरण से संबंधित कानूनी स्थिति में बदलाव आया।

    जून 2025 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने OBC वर्गीकरण से संबंधित राज्य सरकार की कुछ अधिसूचनाओं और उनसे जुड़े परिणामी कदमों पर रोक लगा दी थी। हालांकि, राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट के आदेश के प्रभाव पर रोक लगा दी थी।

    इसके बाद 18 मई 2026 को राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने OBC वर्गीकरण से संबंधित पुरानी अधिसूचनाओं को वापस लेते हुए नई अधिसूचना जारी की। इसमें राज्य की सेवाओं और पदों में 7 प्रतिशत आरक्षण के लिए पात्र 66 OBC वर्गों की सूची प्रकाशित की गई।

    बाद में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती देने वाली अपनी विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट से 14 जुलाई 2026 को वापस ले ली।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट सुदीप्त दासगुप्ता ने दलील दी कि 18 मई 2026 के घटनाक्रम के बाद याचिकाकर्ताओं ने सक्षम अधिकारियों के समक्ष EWS प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था। उनकी सकल वार्षिक आय पर विचार करने के बाद संबंधित अधिकारियों ने उन्हें EWS श्रेणी का प्रमाणपत्र जारी किया।

    उन्होंने तर्क दिया कि जब याचिकाकर्ता अब OBC-A या OBC-B श्रेणी का दावा नहीं कर सकते, तो उन्हें अनारक्षित श्रेणी में रखने के बजाय EWS श्रेणी में अपनी श्रेणी बदलने की अनुमति दी जानी चाहिए।

    बोर्ड ने याचिका का विरोध किया

    WBBPE की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सुबीर सान्याल ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि बोर्ड ने 18 मई 2026 के राज्य सरकार के नीतिगत फैसले के अनुरूप कार्रवाई की है।

    उन्होंने कहा कि 14 अक्टूबर की अधिसूचना उन अभ्यर्थियों को अपनी श्रेणी बदलने का अवसर देने के लिए जारी की गई थी, जिन्होंने पहले OBC-A और OBC-B श्रेणियों के तहत आवेदन किया था, ताकि उन्हें भविष्य में किसी प्रकार का नुकसान न उठाना पड़े।

    उन्होंने यह भी दलील दी कि इस स्तर पर याचिकाकर्ताओं की मांग स्वीकार करना रिट याचिका में मांगी गई अंतिम राहत देने के समान होगा। उन्होंने मामले में जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय मांगा।

    हाईकोर्ट ने उठाए दो अहम सवाल

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुख्य रूप से दो सवालों पर विचार करना आवश्यक है। पहला, क्या चयन प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान परिस्थितियों में आए बदलाव को देखते हुए याचिकाकर्ताओं को अनारक्षित श्रेणी के बजाय EWS अभ्यर्थी के रूप में मान्यता पाने का अधिकार है?

    दूसरा, क्या बोर्ड की यह जिम्मेदारी है कि वह ऐसे अभ्यर्थियों को अपनी श्रेणी बदलने की अनुमति दे?

    कोर्ट ने कहा कि इन सवालों पर हलफनामों के बिना फैसला नहीं किया जा सकता।

    इसलिए हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को पूजा अवकाश समाप्त होने के बाद तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ताओं को इसके बाद एक सप्ताह के भीतर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी गई।

    कोर्ट ने एडवोकेट चित्ता प्रिया घोष के माध्यम से पेश अभ्यर्थियों को भी पक्षकार बनाए जाने के लिए उचित आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस बीच की जाने वाली सभी कार्रवाई रिट याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगी। मामले को निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद नियमित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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