मोदी और अडानी ने 'भारत को चुरा लिया है': कलकत्ता हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया साइट्स से वीडियो हटाने का आदेश दिया
Shahadat
27 Oct 2026 9:34 AM IST

कलकत्ता हाईकोर्ट ने "हाउ मोदी एंड अडानी स्टोल इंडिया: द फ्रेंडशिप फाइल्स" (How Modi and Adani Stole India: The Friendship Files) नाम के एक यूट्यूब वीडियो के प्रसार पर रोक लगाई। कोर्ट ने माना कि यह मामला मानहानि (Defamation) के उन खास मामलों की श्रेणी में आता है, जिनमें सुनवाई से पहले ही रोक (Pre-Trial Injunction) लगाना जरूरी है।
कोर्ट ने यूट्यूब, X (ट्विटर) और इंस्टाग्राम को निर्देश दिया कि वे याचिका में दिए गए खास URL से इस वीडियो को हटा दें या उस तक पहुंच (Access) बंद कर दें। साथ ही इन प्लेटफॉर्म्स को वीडियो के रीपोस्ट, कोट पोस्ट, शेयर और ऐसी अन्य गतिविधियों को भी रोकने के लिए कहा गया, जिनके जरिए यह वीडियो लोगों तक पहुंच सकता है।
26 अक्टूबर को एक अंतरिम आदेश (Ad-Interim Injunction) जारी करते हुए जस्टिस आर्यक दत्त ने कहा कि इस वीडियो में अडानी ग्रुप के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें आतंकी फंडिंग से जुड़े नशीले पदार्थों की तस्करी में मिलीभगत, पुलिस हिंसा को बढ़ावा देना और एक किसान के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराने जैसे आरोप शामिल हैं। कोर्ट ने गौर किया कि सामने रखे गए किसी भी दस्तावेज या सबूत में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे किसी सरकारी प्राधिकरण ने इन आरोपों की पुष्टि की हो।
कोर्ट ने प्रतिवादियों (Respondents) को इस वीडियो, इसके क्लिप, अंश, छोटे संस्करण या इससे मिलते-जुलते किसी भी रूप को प्रकाशित करने, दोबारा प्रकाशित करने, अपलोड करने, शेयर करने या किसी अन्य तरीके से फैलाने से रोक दिया। यह रोक 31 जनवरी 2027 तक, या अगले आदेश तक (जो भी पहले हो), लागू रहेगी।
कोर्ट ने कहा,
"यह वीडियो कोई समाचार रिपोर्ट या किसी कार्यवाही का विवरण नहीं है। यह एक नाटकीय कहानी (Dramatized Narrative) है, जिसके शीर्षक में सीधे तौर पर 'चोरी' का आरोप लगाया गया। इसमें दी गई जानकारी और दृश्यों को इस तरह पेश किया गया है जैसे वे पूरी तरह सच हों।"
यह मुकदमा अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने दायर किया। इसमें यूट्यूब चैनल "बी-क्यूबड (ब्रेकिंग बाउंड्रीज़ विद सबीर भाटिया)" और X अकाउंट "@सबीर" के निर्माता और संचालक सबीर भाटिया को प्रतिवादी बनाया गया। इसके अलावा, यूट्यूब, X, इंस्टाग्राम और दो अज्ञात व्यक्तियों को भी इसमें शामिल किया गया है, जिन पर इस कंटेंट को अपलोड करने और फैलाने का आरोप है।
कंपनी के अनुसार, लगभग 36 मिनट का यह वीडियो 9 अक्टूबर 2026 को एक अन्य यूट्यूब चैनल "शैडो सिटीजन्स" (Shadow Citizens) के साथ मिलकर अपलोड किया गया। इसे भाटिया के X अकाउंट पर भी पोस्ट किया गया। कंपनी ने दावा किया कि उसी दिन तक, वीडियो को यूट्यूब पर 46,134 बार और X (ट्विटर) पर लगभग 40,000 बार देखा गया।
अडानी एंटरप्राइजेज ने बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत सरकार की शिकायत के बाद भारत में यूट्यूब पर मौजूद मूल वीडियो तक पहुंच बंद कर दी गई। हालांकि, कंपनी का आरोप है कि वीडियो को दोबारा अपलोड करके, रीपोस्ट करके और इंस्टाग्राम रील्स के जरिए फैलाया जाता रहा। कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि मूल वीडियो को हटाए जाने के बाद, 22 अक्टूबर को भाटिया ने इसे X पर फिर से पोस्ट किया।
कंपनी का कहना है कि वीडियो में दिए गए बयान झूठे हैं और इसके सामने आने के बाद निवेशकों और अन्य लोगों की ओर से उनसे पूछताछ की गई। कंपनी ने तर्क दिया कि अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अहम हिस्सा है।
अडानी एंटरप्राइजेज की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अनिर्बान रे ने कहा कि कंपनी सरकार की नीतियों, व्यापार के केंद्रीकरण या अपनी व्यावसायिक गतिविधियों की रचनात्मक आलोचना को रोकना नहीं चाहती है। कंपनी ने जो राहत मांगी है, वह केवल इसी खास वीडियो, इसके अन्य रूपों और इसमें लगाए गए कथित मानहानिकारक आरोपों तक ही सीमित है।
कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) और इससे संबंधित मध्यस्थ नियमों (Intermediary Rules) के तहत अदालत के आदेश पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने या उस तक पहुंच (Access) को बंद करने की आवश्यकता है।
अदालत की टिप्पणियां
जस्टिस दत्त ने माना कि जनहित से जुड़े मानहानि के मामलों में मुकदमे के फैसले से पहले रोक (Pre-Trial Injunctions) लगाने का आदेश बहुत सावधानी से दिया जाना चाहिए। 'ब्लूमबर्ग टेलीविजन प्रोडक्शन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि 'प्रथम दृष्टया मामला' (Prima Facie Case), 'सुविधा का संतुलन' (Balance of Convenience) और 'ना ठीक होने वाला नुकसान' (Irreparable Injury) जैसे पैमानों के अलावा, अदालतों को जनता के 'जानने के अधिकार' और ऐसे प्रतिबंधों के 'डराने वाले प्रभाव' (Chilling Effect) पर भी विचार करना चाहिए।
अदालत ने कहा कि इस तरह के प्रतिबंध केवल बहुत ही खास मामलों में लगाए जाने चाहिए, जहां कंटेंट प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण या पूरी तरह से झूठा लगे। साथ ही राहत देने के कारणों को भी दर्ज किया जाना चाहिए।
अंतरिम सुरक्षा के लिए प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए अदालत ने कहा कि वीडियो में गंभीर आरोपों को तथ्यों के रूप में पेश किया गया। साथ ही, सरकार की शिकायत के बाद भारत में इस वीडियो को पहले ही हटा दिया गया। अदालत ने इस आरोप पर भी ध्यान दिया कि बाद में भाटिया ने इस वीडियो को फिर से पोस्ट किया, जो प्रथम दृष्टया यह दिखाता है कि इसमें 'अच्छी नीयत' (Good Faith) की कमी थी।
अदालत ने आगे कहा कि 'सुविधा का संतुलन' अडानी एंटरप्राइजेज के पक्ष में है, क्योंकि ऑनलाइन इसे बार-बार प्रकाशित करने से कंपनी की प्रतिष्ठा को ऐसा नुकसान पहुंच सकता है, जिसकी भरपाई केवल पैसों से नहीं की जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया,
"यह रोक केवल एक विशेष वीडियो, उसके क्लिप्स और उससे मिलते-जुलते कंटेंट तक ही सीमित है।"
अदालत ने यह भी जोड़ा कि सबूतों के साथ की गई रचनात्मक आलोचना और सच्ची रिपोर्टिंग पर कोई रोक नहीं होगी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए निर्देश
अदालत ने प्रतिवादियों (Respondents) को निर्देश दिया कि वे अपने स्वामित्व या नियंत्रण वाले अकाउंट्स, चैनलों और पेजों से उस वीडियो और उससे जुड़े मानहानिकारक कंटेंट को हटा दें।
प्लेटफॉर्म्स को यह भी निर्देश दिया गया कि वे पहचाने गए अकाउंट्स और यूआरएल (URLs) से जुड़ी सब्सक्राइबर की जानकारी, रजिस्ट्रेशन विवरण, वीडियो अपलोड करने के समय के आईपी लॉग (IP logs) और एक्सेस लॉग को सुरक्षित रखें। जिन अकाउंट्स के मालिकों की पहचान याचिका से नहीं हो सकी, उनके बारे में बुनियादी जानकारी सीलबंद लिफाफे में देनी होगी। इसके लिए आदेश मिलने के दो सप्ताह के भीतर एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करना होगा। इसके अलावा, इन प्लेटफॉर्म्स को उन चिह्नित URL या उस वीडियो पर विज्ञापन चलाने, विज्ञापन दिखाने, या उनसे होने वाली कमाई (रेवेन्यू) को साझा करने से रोक दिया गया, जिनमें कथित तौर पर मानहानि करने वाले बयान शामिल थे। उन्हें इस कंटेंट से होने वाली विज्ञापन कमाई का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया कि वे अज्ञात प्रतिवादियों में से एक की पहचान के बारे में अडानी एंटरप्राइजेज को सूचित करें, ताकि कंपनी अपनी शिकायत में संशोधन कर सके और संबंधित दस्तावेज उस व्यक्ति तक पहुंचा सके।
प्रतिवादियों को नोटिस मिलने के चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब (हलफनामा) दाखिल करने का निर्देश दिया गया, और अडानी एंटरप्राइजेज को उसके बाद दो सप्ताह के भीतर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी गई। मामले को जनवरी 2027 की मासिक सूची में नियमित बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां प्रथम दृष्टया (Prima Facie) हैं। साथ ही इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी समूह या सरकारी नीतियों के बारे में रचनात्मक आलोचना या निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर कोई रोक है। यह रोक केवल उस विवादित वीडियो, उसकी प्रतियों, या उसमें दिए गए कथित मानहानिपूर्ण बयानों तक ही सीमित है।

