नागरिकता आवेदन पर फैसला आने तक बांग्लादेशी महिला को निर्वासित न करें: कलकत्ता हाईकोर्ट

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    कलकत्ता हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि विदेशी अधिनियम के तहत दोषी ठहराई गई बांग्लादेशी महिला ओइशे बिस्वास को भारतीय नागरिकता के आवेदन पर फैसला होने तक बांग्लादेश निर्वासित नहीं किया जाए। महिला ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019 के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है, जिस पर अभी निर्णय होना बाकी है।

    जस्टिस जय सेनगुप्ता ने यह निर्देश महिला की अपील को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज करने के साथ दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM), बनगांव के आदेश के खिलाफ अपील हाईकोर्ट के बजाय संबंधित सेशंस कोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी।

    सजा पूरी होने पर उचित होल्डिंग सेंटर में रखने का निर्देश

    हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि महिला को 21 अक्टूबर, 2026 को सजा पूरी होने पर या रिमिशन के कारण पहले रिहाई की पात्र होने पर सुधार गृह से रिहा किया जाए। इसके बाद उसे उचित सुविधाओं वाले ऐसे होल्डिंग सेंटर में रखा जाए, जहां सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध हों।

    कोर्ट ने कहा कि नागरिकता आवेदन पर निर्णय होने तक महिला को बांग्लादेश निर्वासित नहीं किया जा सकता। यह सुरक्षा तब भी जारी रहेगी, जब महिला संबंधित सेशंस कोर्ट में अपनी अपील दायर करती है।

    जस्टिस सेनगुप्ता ने कहा कि भले ही अपील हाईकोर्ट में सुनवाई योग्य नहीं थी, लेकिन मामला लंबे समय से लंबित था और महिला की सजा पूरी होने की तारीख नजदीक थी। इसलिए कोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आवश्यक निर्देश जारी किए।

    विदेशी अधिनियम के तहत दो साल की सजा

    ओइशे बिस्वास ने बनगांव, उत्तर 24 परगना के ACJM द्वारा 4 जनवरी, 2025 को पारित फैसले को चुनौती दी थी। मजिस्ट्रेट ने उन्हें विदेशी अधिनियम की धारा 14 के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल के कारावास और ₹10,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना नहीं देने पर छह महीने की अतिरिक्त साधारण कैद का प्रावधान किया गया था।

    महिला की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि वह 2011 में बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के डर से भारत आई थीं। बाद में उन्होंने भारत में विवाह किया और यहीं रहने लगीं। उनके वकील ने दावा किया कि वह नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019, नागरिकता अधिनियम, 1955 और इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एक्जेम्प्शन) ऑर्डर, 2025 के प्रावधानों के दायरे में आती हैं। उनका नागरिकता आवेदन अभी लंबित है।

    राज्य सरकार ने भी कहा कि महिला संबंधित कानूनी प्रावधानों और 2025 के छूट आदेश के दायरे में आती दिखाई देती हैं। केंद्र सरकार ने कहा कि इन प्रावधानों से महिला को लाभ मिल सकता है, लेकिन नागरिकता आवेदन की स्थिति के संबंध में अतिरिक्त जानकारी की आवश्यकता होगी।

    हाईकोर्ट ने अपील को सुनवाई योग्य नहीं माना

    हाईकोर्ट ने पाया कि ACJM के फैसले के खिलाफ अपील संबंधित सेशंस कोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी, न कि हाईकोर्ट में। कोर्ट ने इस बात पर भी असंतोष जताया कि किसी भी पक्ष के वकील ने पहले इस प्रक्रियागत त्रुटि की ओर ध्यान नहीं दिलाया।

    कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए महिला को संबंधित सेशंस कोर्ट में उचित अपील दायर करने की स्वतंत्रता दी। उसने निर्देश दिया कि यदि अपील दायर की जाती है, तो सेशंस कोर्ट कानून के अनुसार और यथाशीघ्र उसका निपटारा करे तथा हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित न हो।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नागरिकता आवेदन पर फैसला होने तक महिला को बांग्लादेश निर्वासित नहीं किया जाएगा, भले ही वह सेशंस कोर्ट में अपील दायर करे।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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