भारतीय जब विदेश में सड़क सुरक्षा नियमों का पालन कर सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं? सड़क दुर्घटना मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का सवाल
Shahadat
9 April 2026 7:41 PM IST

जब विदेश यात्रा पर जाने वाले भारतीय वहाँ के ट्रैफिक से जुड़े नियमों और कानूनों का पालन कर सकते हैं तो वे यहां भारत में सड़क नियमों का पालन क्यों नहीं कर सकते? बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक सड़क दुर्घटना मुआवज़ा मामले का निपटारा करते हुए यह सवाल उठाया। इस मामले में पार्किंसन बीमारी से पीड़ित एक पुजारी की मौत ठाणे म्युनिसिपल ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (TMTC) की बस की टक्कर लगने से हो गई।
सिंगल बेंच जज जितेंद्र जैन ने इस बात पर नाराज़गी ज़ाहिर की कि भारतीय लोग सड़क पार करते समय सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करते। यहां तक कि वाहन चालक भी ट्रैफिक नियमों का पालन करने में नाकाम रहते हैं।
जस्टिस जैन ने 8 अप्रैल के अपने आदेश में कहा,
"इस देश के पैदल चलने वालों को नियमों और कानूनों का पालन करने में सावधानी बरतनी चाहिए। आम तौर पर यह देखा जाता है कि लोग सिग्नलों को नज़रअंदाज़ करके सड़क पार करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप दुर्घटना में मौत या चोट लगती है। अब समय आ गया है कि हम एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर सड़क पार करते समय नियमों और कानूनों का पालन करें और सिग्नलों का अनुसरण करें। सिर्फ़ इसलिए कि किसी भी तरफ़ से कोई वाहन नहीं आ रहा है, लोगों को सड़क पार नहीं करनी चाहिए, जबकि सिग्नल साफ़ तौर पर यह दिखा रहे हों कि उन्हें सड़क पार नहीं करनी है।"
जज ने आगे इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह भी ज़रूरी है कि वाहन चालक सिग्नल न तोड़ें। हालांकि, सिग्नल तोड़ने की प्रवृत्ति में कुछ कमी आई। फिर भी, और विशेष रूप से दोपहिया वाहन चलाने वाले लोग सिग्नल के नियमों और कानूनों का पालन नहीं करते हैं। कई बार इसका नतीजा यह होता है कि न सिर्फ़ दोपहिया वाहन चलाने वालों को, बल्कि सड़क पर चल रहे अन्य निर्दोष लोगों को भी चोट लगती है या उनकी जान चली जाती है।
इसलिए जज ने कहा कि ट्रैफिक पुलिस, जो वैसे तो सराहनीय काम कर रही है, उसे दोपहिया वाहन चलाने वाले उन लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करनी चाहिए जो सिग्नल के नियमों का उल्लंघन करते हैं।
अपने 6-पृष्ठों के आदेश में जज जैन ने कहा कि अब समय आ गया कि भारतीय अपने अंदर नागरिक बोध (Civic Sense) विकसित करें—एक ऐसा बोध जिसका पालन हमें बिना किसी के ज़ोर-ज़बरदस्ती के अपनी मर्ज़ी से करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें विकसित देशों से सीखना चाहिए कि वहाँ वाहन चलाने वाले लोग और सड़क पार करने वाले लोग किस तरह का व्यवहार करते हैं।
जस्टिस जैन ने कहा,
"हम भारतीय भी जब विदेश यात्रा पर जाते हैं तो वहां के नियमों और कानूनों का पालन करते हैं - चाहे हम सड़क पार कर रहे हों या गाड़ी चला रहे हों। मुझे कोई ऐसा कारण नज़र नहीं आता कि जब हम अपने देश लौटते हैं और यहां रहते हैं तो हमें अपने देश के नियमों और कानूनों का पालन क्यों नहीं करना चाहिए। इन नियमों का पालन न करने का कोई भी औचित्य नहीं हो सकता।"
जज ने आगे यह भी बताया कि अक्सर बड़े-बुज़ुर्ग और माता-पिता गाड़ी चलाते या सड़क पार करते समय इन नियमों का उल्लंघन करते हैं। जब उनके साथ बच्चे होते हैं तो देश का भविष्य माने जाने वाले ये बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों के व्यवहार को देखते हैं, और उन्हीं गैर-कानूनी हरकतों को अपना लेते हैं।
जज ने टिप्पणी की,
"इसलिए यह बड़े-बुज़ुर्गों और माता-पिता का नैतिक कर्तव्य और दायित्व है कि वे गाड़ी चलाते या सड़क पार करते समय नियमों और कानूनों का पालन करें। ऐसा करने से बच्चे अपने माता-पिता से नियमों का उल्लंघन करना सीखने के बजाय, नियमों का पालन करने जैसी बुनियादी नागरिक समझ सीखेंगे। यह बिल्कुल सही कहा गया है कि बच्चे जो देखते हैं, उसे बहुत जल्दी अपना लेते हैं।"
ये टिप्पणियाँ सतीश जोशी के आश्रितों द्वारा दायर की गई 'प्रथम अपील' (First Appeal) की सुनवाई के दौरान की गईं। सतीश जोशी पार्किंसन रोग से पीड़ित थे और आंशिक रूप से लकवाग्रस्त भी थे। 9 नवंबर, 2012 को जब वे ठाणे के नौपाड़ा स्थित 'आराधना टॉकीज़' के पास सड़क पार करने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक TMTC बस ने उन्हें टक्कर मार दी थी। इस दुर्घटना के चार महीने बाद यानी 16 मार्च, 2013 को उनकी मृत्यु हो गई।
'मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण' (MACT) ने 21 अप्रैल, 2016 को एक आदेश पारित करते हुए मृतक जोशी के आश्रितों (दावेदारों) के पक्ष में 13.23 लाख रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। आश्रितों ने यह तर्क दिया कि अधिकरण ने मृतक की आय को ग़लती से 8,000 रुपये मान लिया था, जबकि उसे 12,000 रुपये माना जाना चाहिए था।
हालांकि, जस्टिस जैन ने उनकी आय 10,000 रुपये मानी, क्योंकि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि पुजारी के तौर पर वे असल में कितनी कमाई करते थे। जज ने आगे ट्रिब्यूनल की इस बात से भी सहमति जताई कि सड़क पार करते समय सिग्नल का इस्तेमाल न करने के लिए जोशी को 50 प्रतिशत लापरवाह माना जाना चाहिए।
जज ने गौर किया कि जोशी पार्किंसन बीमारी के मरीज़ थे और उन्हें लकवा भी था, जिसकी वजह से उनकी चाल एक आम इंसान के मुकाबले धीमी हो जाती थी।
जज ने फैसला सुनाया,
"मेरी राय में मृतक के साथ किसी न किसी को होना चाहिए, खासकर तब जब उन्हें एक व्यस्त सड़क पार करनी थी। वे सड़क पार करने में मदद के लिए किसी राहगीर या आम जनता की मदद ले सकते थे। यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि घटना वाली जगह पर कोई सिग्नल नहीं था। एक पैदल यात्री को सड़क हमेशा सिग्नल वाली जगह से ही और सिग्नल के नियमों का पालन करते हुए ही पार करनी चाहिए। इसलिए कुछ हद तक लापरवाही निश्चित रूप से मृतक की भी थी।"
इसलिए जज ने मुआवज़े की रकम 13.23 लाख रुपये से बढ़ाकर 15.15 लाख रुपये की।
साथ ही यह टिप्पणी भी की,
"मैं इस मामले को इस उम्मीद के साथ खत्म करता हूं कि इस देश के नागरिक इस मुद्दे (सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करने) पर प्रगति करेंगे; वे गाड़ी चलाते समय और सड़क पार करते समय नियमों और कानूनों का पालन करने की नागरिक भावना को अपने अंदर विकसित करेंगे और यह समझेंगे कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं; एक का इस्तेमाल करते समय दूसरे की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।"
Case Title: Vasanti Satish Joshi vs Thane Municipal Transport Corporation (First Appeal 1371 of 2016)

