Right To Be Forgotten: FIR रद्द होने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑनलाइन कोर्ट रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता का नाम छिपाने का निर्देश दिया

Shahadat

14 July 2026 9:58 AM IST

  • Right To Be Forgotten: FIR रद्द होने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑनलाइन कोर्ट रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता का नाम छिपाने का निर्देश दिया

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह उस याचिकाकर्ता की पहचान छिपाएं (मास्क करें), जिसने अपने "भूल जाने के अधिकार" (right to be forgotten) का इस्तेमाल किया था। कोर्ट ने माना कि जब किसी व्यक्ति के कथित अपराध में शामिल होने से जुड़ी कानूनी कार्यवाही रद्द कर दी जाती है तो इंटरनेट पर उस जानकारी को बनाए रखने से कोई जनहित नहीं सधता।

    कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि निजता का अधिकार (Right to Privacy), जो संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अहम हिस्सा है, उसमें 'भूल जाने का अधिकार' भी शामिल है।

    नागपुर बेंच में जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की डिवीजन बेंच ने कहा,

    "निजता के अधिकार की अवधारणा में 'भूल जाने का अधिकार' भी शामिल है। इंटरनेट के दौर में किसी भी अपराध से बरी हुए व्यक्तियों या जिनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई, उनसे जुड़ी जानकारी का मामला 'आनुपातिकता' (Proportionality) और 'निष्पक्षता' (Fairness) के बुनियादी सिद्धांतों से जुड़ा है। हालांकि जानकारी तक पहुंच लोकतंत्र का एक मौलिक पहलू है, लेकिन इसे जनता के सूचना के अधिकार और व्यक्ति के निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत से अलग नहीं किया जा सकता। यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जब कार्यवाही रद्द होने के बाद इंटरनेट पर जानकारी को बनाए रखने से कोई जनहित नहीं सधता।"

    बेंच ने यह आदेश एक व्यक्ति की याचिका पर दिया, जिस पर अक्टूबर 2017 में दर्ज एक FIR में मामला दर्ज किया गया। हालांकि, शिकायतकर्ता और आरोपी याचिकाकर्ता के बीच विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के बाद नवंबर 2018 में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उक्त FIR को रद्द कर दिया।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया,

    "सात साल से भी पहले कानूनी रूप से पूरी तरह बरी होने के बावजूद, ज़िला अदालत के फैसले के बिना संपादित (Unredacted) डिजिटल रिकॉर्ड ऑनलाइन आसानी से उपलब्ध हैं और बाहरी सर्च इंजन द्वारा इंडेक्स किए गए। यह 'एल्गोरिदम-आधारित स्थायित्व' (Algorithmic Permanence) नियमित पेशेवर और शैक्षिक बैकग्राउंड जांच के दौरान सामने आता है, जिससे याचिकाकर्ता के करियर की प्रगति पर बुरा असर पड़ता है और उसके परिवार व नाबालिग बेटी को गंभीर सामाजिक बदनामी का सामना करना पड़ता है।"

    इसलिए उन्होंने बेंच से अपने मौलिक अधिकार, यानी निजता के अधिकार (भूल दिए जाने का अधिकार) को लागू करने की अपील की। ​​इसके तहत उन्होंने हाई कोर्ट और डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के डिजिटल पोर्टल से अपनी निजी पहचान वाली जानकारी को छिपाने (मास्किंग) और इन रिकॉर्ड्स को सर्च इंजन की इंडेक्सिंग से हटाने (डीलिंकिंग) की मांग की।

    जजों ने कहा,

    "खास तौर पर, उनका कहना है कि कोर्ट की वेबसाइट से फैसले को डीलिंक किया जाना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि याचिकाकर्ता यह नहीं कह रहे हैं—और न ही वे ऐसा कह सकते हैं—कि कोर्ट के रिकॉर्ड्स को नष्ट कर दिया जाए। उनकी मांग सिर्फ़ कोर्ट सिस्टम की वेबसाइट पर केस की जानकारी और फैसले की उपलब्धता तक सीमित है, यानी ऐसी जानकारी जो आम जनता के लिए उपलब्ध है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पार्टियों के बीच विवाद अब आपसी सहमति से सुलझ गया है और याचिकाकर्ता की मांग सिर्फ़ डिजिटल रिकॉर्ड तक सीमित है—यानी कोर्ट सिस्टम की वेबसाइट पर मौजूद फैसले और आदेशों से याचिकाकर्ता की जानकारी को छिपाना (मास्क करना)—इस मांग को स्वीकार किया जाना चाहिए।"

    इसलिए बेंच ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वे सभी रिकॉर्ड्स में याचिकाकर्ता का नाम छिपा दें और उसकी जगह शुरुआती अक्षर 'ABC' लिख दें।

    इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने याचिका का निपटारा किया।

    Case Title: ABC vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 470 of 2026)

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