'विरोध करने वाले छात्र एंटी-नेशनल नहीं, सरकार को उनका भरोसा फिर से जीतना चाहिए': पुणे MPSC विरोध पर बॉम्बे हाईकोर्ट
Shahadat
7 Oct 2026 6:00 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (7 अक्टूबर) को कहा, "पुणे राज्य का एजुकेशन हब है और पढ़ाई के लिए इस शहर में आने वाले छात्र अपनी पढ़ाई में सचमुच दिलचस्पी रखते हैं। वे अपनी मांगों के लिए सड़कों पर नहीं उतरना चाहते, लेकिन अगर वे विरोध कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि उनकी कुछ गंभीर शिकायतें हैं। ऐसे छात्रों को देश-विरोधी नहीं कहा जा सकता।"
कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से कहा कि वह सिस्टम में छात्रों का भरोसा फिर से कायम करने के लिए सही कदम उठाए।
चीफ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की डिवीजन बेंच ने विरोध कर रहे छात्रों से अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की अपील की। साथ ही कहा कि अगर वे विरोध जारी रखना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए पहले इजाज़त लेनी होगी और विरोध के लिए कोई दूसरी जगह ढूंढनी होगी, क्योंकि यह सब सार्वजनिक सड़कों पर नहीं हो सकता।
जजों ने गौर किया कि विरोध कर रहे छात्र MPSC के कामकाज को लेकर चिंतित हैं, जिसे 70,000 से ज़्यादा खाली पद भरने हैं; छात्रों का यह भी आरोप है कि परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है और पेपर लीक हो जाते हैं, वगैरह।
महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल डॉ. मिलिंद साठे ने जजों को बताया कि छात्रों की 4 मांगें हैं।
साठे ने जजों से कहा,
"पहली मांग MPSC चेयरमैन के इस्तीफे की है। दूसरी मांग है कि फीस 100 रुपये हो (मान ली गई है) और सभी परीक्षाएं ऑफलाइन हों (मान ली गई है)। पहली मांग के लिए हमने सही फैसला लेने के लिए गवर्नर को एक रिप्रेजेंटेशन भेजा है।"
इस पर बेंच ने कहा कि पुणे भारत में शिक्षा के सबसे बड़े केंद्रों में से एक है।
जजों ने कहा,
"अगर छात्र विरोध कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि उनकी शिकायतें गंभीर हैं। खाली पदों की संख्या बहुत ज़्यादा है। छात्रों का कहना है कि परीक्षाएं तय प्रक्रिया के अनुसार नहीं होती हैं... जो परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं, वे निष्पक्ष और सही होनी चाहिए... खासकर पुणे में, जो सिर्फ शिक्षा का केंद्र है और ज़्यादातर छात्र पढ़ाई में सचमुच दिलचस्पी रखते हैं। वे अपनी मांगों के लिए सड़कों पर नहीं आना चाहते। सरकार को उनका भरोसा फिर से जीतने के लिए ईमानदारी से कदम उठाने चाहिए।"
AG ने जवाब दिया कि कुछ छात्र नेताओं ने 30 सितंबर को मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि मामला अब कोर्ट में है और वह स्थिति को ठीक से संभालेगा। इसलिए जजों ने विरोध कर रहे छात्रों से अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने का आग्रह किया।
बेंच ने राज्य को नोटिस जारी करते हुए कहा,
"यह मामला अब कोर्ट के सामने है... हम छात्रों से क्लास में वापस जाने का अनुरोध करेंगे। हम इसे यूं ही नहीं छोड़ेंगे। भरोसा बहाल होना चाहिए। परीक्षाएं निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। जहां तक कमीशन की बात है, आप (राज्य) जानते हैं कि चेयरमैन को कैसे नियुक्त और हटाया जा सकता है। हम सुनिश्चित करेंगे कि राज्य की ओर से जवाब आए। हम चाहते हैं कि पहले बैकलॉग वैकेंसी भरी जाएं... जो छात्र पढ़ाई में रुचि रखते हैं, उन्हें परीक्षा में बैठने का उचित मौका मिलना चाहिए... वे 70 हजार वैकेंसी के साथ साफ नीयत से आए हैं... उन माता-पिता की हालत देखें जिन्होंने अपने बच्चों को पुणे भेजा है। ये बच्चे मासूम हैं। हम देखेंगे कि राज्य इस मामले से कैसे निपट रहा है। छात्रों से बस यही अनुरोध है कि वे फैकल्टी के साथ जुड़ें। वरना उनका करियर बदल जाएगा। पूरा ओरिएंटेशन बदल जाएगा। उन्हें ऐसी चीजों में शामिल नहीं होना चाहिए। हम एक अभिभावक के तौर पर यह सुनिश्चित करेंगे।"
बेंच ने राज्य से 'लिखित रूप में' जवाब मांगा कि वे भर्ती प्रक्रिया का प्रस्ताव कैसे दे रहे हैं और हर विभाग में वैकेंसी के बारे में हर छोटी-बड़ी जानकारी देने को कहा है।
CJ ने कहा,
"भर्ती प्रक्रिया तेज गति से होनी चाहिए। 3 सप्ताह के भीतर आप सारी जानकारी दें। वरना उन्हें बस इस बात की चिंता है कि परीक्षा निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए।"
इस पर साठे ने जवाब दिया कि अगली सुनवाई की तारीख से पहले हलफनामा दाखिल किया जाएगा। उन्होंने बेंच को बताया कि पुलिस ने छात्रों से निपटने में बहुत संयम बरता है। उन्होंने कहा कि अगर FIR दर्ज की जाती है, तो विरोध कर रहे छात्रों का करियर प्रभावित होगा।
बेंच ने टिप्पणी की,
"वे छात्र हैं, देश-विरोधी नहीं... ऐसा ही होना चाहिए... जैसे ही कोई परीक्षा खत्म होती है। उन्हें लगता है कि प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ हुई है तो छात्रों को विरोध करने का पूरा अधिकार है... आपने पहले ही बताया कि 70,000 पद खाली दिखाए गए... इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए। इस बात पर भी ध्यान दें कि देश के सभी माता-पिता मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं।"
बेंच एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पुणे में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के कारण अन्य नागरिकों को हो रही समस्याओं का ज़िक्र था; इन प्रदर्शनों में छात्रों ने कथित तौर पर मुख्य सड़कें वगैरह जाम की हैं, जिससे नागरिकों को आने-जाने में भारी परेशानी हो रही है।
बेंच ने भरोसा दिलाया,
"आम जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए। जहां तक आपकी चिंता का सवाल है, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि भर्ती प्रक्रिया का ध्यान रखा जाए। और गड़बड़ी की जानकारी भी सामने आएगी कि क्या हुआ है। हम अगली सुनवाई में इन सभी बातों की जांच करेंगे। तब तक, हम सभी प्रदर्शनकारी पक्षों से अनुरोध करते हैं कि वे अपना विरोध वापस लें और पढ़ाई-लिखाई में शामिल हों। अब मामला कोर्ट के सामने है।"
सुनवाई के आखिर में जजों ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने का अनुरोध करते हुए कहा,
"हम सभी पक्षों से अनुरोध करते हैं कि यह एक शांतिप्रिय समाज है। यह एक एजुकेशन हब है। देश में ऐसा कोई संदेश नहीं जाना चाहिए कि यह जगह छात्रों के लिए सही नहीं है, वरना माता-पिता के मन में भी आशंका पैदा होगी... कृपया क्लास में शामिल हों; अगर आप विरोध करना चाहते हैं, तो अनुमति लें और उसके लिए कोई जगह तय करें। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि नागरिकों को कोई परेशानी न हो।"
इसके बाद जजों ने सुनवाई को 3 हफ़्ते के लिए टाल दिया।

