POSH Act | एक बार आरोप साबित न होने पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सहकर्मियों का वीडियो बनाने के मामले में राहत दी

Shahadat

21 Jan 2026 10:02 AM IST

  • POSH Act | एक बार आरोप साबित न होने पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सहकर्मियों का वीडियो बनाने के मामले में राहत दी

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (NABARD) के एक कर्मचारी को राहत दी, जिसने सेंट्रल कंप्लेंट्स कमेटी (CCC) द्वारा उस पर लगाए गए 'फटकार' की सज़ा को चुनौती दी थी। उस पर आरोप था कि उसने अपनी महिला सहकर्मियों का 'वीडियो रिकॉर्डिंग' किया, जो अक्सर 'एक साथ बैठकर, हंसकर, गपशप करके और गाना गाकर' काम के घंटों में 'परेशानी' पैदा करती थीं।

    जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की डिवीज़न बेंच ने कहा कि CCC ने 30 जून, 2020 को अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता - डॉ. मोहिंदर कुमार का आचरण वर्कप्लेस पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत 'यौन उत्पीड़न' नहीं था, फिर भी उसने उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफ़ारिश की।

    इसी सिफ़ारिश पर सक्षम अधिकारी, NABARD के चीफ़ जनरल मैनेजर ने कुमार पर 'फटकार' की सज़ा लगाई, क्योंकि CCC ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 'वीडियो बनाने का उनका आचरण भले ही यौन उत्पीड़न नहीं था, लेकिन यह सही भी नहीं था।'

    खास बात यह है कि सिफ़ारिशों को देखते हुए NABARD के चीफ़ जनरल मैनेजर ने कुमार पर 'अनिवार्य रिटायरमेंट' की बड़ी सज़ा (फटकार के तहत) लगाई थी और बाद में बैंक ने उन्हें रिटायर किया।

    CCC के फ़ैसलों और सक्षम अधिकारी द्वारा दी गई सज़ा को चुनौती देते हुए कुमार ने POSH Act की धारा 13(2) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि जब इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) इस नतीजे पर पहुंचती है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ़ आरोप साबित नहीं हुए हैं तो उसे नियोक्ता को सिफ़ारिश करनी होती है कि उस मामले में किसी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं है।

    मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए जजों ने 12 जनवरी के अपने आदेश में कहा,

    "24 सितंबर, 2020 को सक्षम अथॉरिटी द्वारा लगाए गए सज़ा के आदेश को देखने पर यह साफ़ है कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने 'फटकार' की सज़ा सिर्फ़ CCC की सिफ़ारिश के आधार पर लगाई है। CCC यौन उत्पीड़न की शिकायतों को देखने के लिए खास तौर पर बनाई गई एक कमेटी है, इसलिए जब कमेटी ने यह राय बना ली कि याचिकाकर्ता का व्यवहार 'यौन उत्पीड़न' नहीं था, तो वह याचिकाकर्ता के खिलाफ़ किसी भी कार्रवाई की सिफ़ारिश नहीं कर सकती। उसे बस मामले को बंद कर देना चाहिए था और शिकायत को खारिज कर देना चाहिए।"

    बेंच ने कहा कि इस मामले में CCC ने अपनी शक्तियों से बाहर जाकर काम किया।

    जजों ने कहा,

    "CCC ने सक्षम अथॉरिटी को याचिकाकर्ता के खिलाफ़ उचित कार्रवाई करने की सिफ़ारिश करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। इसी तरह CCC की सिफ़ारिश पर कार्रवाई करते हुए सक्षम अथॉरिटी ने बिना सोचे-समझे या कोई स्वतंत्र जांच किए बिना 'फटकार' की सज़ा लगाकर गलती की, इसलिए मुख्य महाप्रबंधक और सक्षम अथॉरिटी द्वारा 24 सितंबर, 2020 को पारित आदेश को रद्द किया जाना चाहिए।"

    इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने कुमार पर लगाई गई सज़ा रद्द की।

    Case Title: Dr Mohinder Kumar vs The Chairman, NABARD (Writ Petition 1635 of 2021)

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